हर कुछ वक्त के बाद, भारतीय सार्वजनिक विमर्श में एक पुरानी स्क्रिप्ट वापस आ जाती है, जिसमें हर संस्थागत कार्रवाई को सांप्रदायिक चोट बना दिया जाता है, हर जांच को “सभी मुसलमानों” पर हमला बताया जाता है. इस हफ्ते, यह स्क्रिप्ट जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी ने दोहराई, जिन्होंने दिल्ली आतंकी हमले के बाद अल-फलाह यूनिवर्सिटी की जांच को भारतीय मुसलमानों के खिलाफ अन्याय बताया.
जैसे जवाबदेही मतलब अत्याचार हो गई हो, जैसे संस्थाएं सिर्फ धार्मिक भावनाओं को सहलाने के लिए बनी हों. और फिर, लगभग नाटकीय अंदाज़ में, वो लंदन और न्यूयॉर्क का उदाहरण ले आते हैं, “वहां मुसलमान मेयर बन जाते हैं, यहां तो वाइस-चांसलर भी नहीं बन सकते.” यह तर्क रैली के माइक पर ताकतवर लगता है, लेकिन हकीकत या ईमानदारी की एक बुनियादी कसौटी पर ही ढह जाता है.
खेल से लेकर अदालतों तक
भारतीय मुसलमानों ने क्या हासिल किया है और इस देश को कितनी गहराई से गढ़ा है, इसके लिए किसी लिस्ट की ज़रूरत नहीं. विज्ञान से खेल, सिनेमा से नौकरशाही, सेना से लेकर अदालतों तक, यह समुदाय भारत के राष्ट्रीय जीवन के हर महत्वपूर्ण क्षेत्र में जुड़ा हुआ है. भारत में मुस्लिम राष्ट्रपति, राज्यपाल, मुख्यमंत्री और यहां तक कि चीफ जस्टिस भी रहे हैं.
ये इतने सामान्य और सार्वजनिक तथ्य हैं कि मदनी का “ममदानी” जैसा विदेशी उदाहरण अपने आप ही बेमानी हो जाता है, लेकिन यही पैटर्न है—सत्ता-धारी आवाज़ें हमेशा पूरी कौम को एक चोटिल कहानी में समेट देती हैं, क्योंकि यही कहानी उनकी अपनी नेतृत्व-स्थिति को बचाती है. जो ‘पीड़ित’ छवि वे बनाते हैं, वह गरीब मुसलमान, हाशिये पर खड़ा मुसलमान या बेआवाज़ मुसलमान के लिए नहीं होती, वह उन खास लोगों के लिए होती है जिनकी प्रासंगिकता तब खतरे में पड़ जाती है जब बातचीत असली मुद्दों, असली सुधार और असली जवाबदेही की ओर बढ़ने लगती है.
अगर मदनी साहब मुस्लिमों की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं, मुस्लिम महिलाओं की रोज़मर्रा की परेशानियों, हमारे जीवन पर मंडराते रूढ़िवादी स्टीरियोटाइप्स, या बढ़ती हेट स्पीच पर बात करते, तो बात समझ में आती, लेकिन नहीं उनका रोष फिर उन्हीं लोगों के इर्द-गिर्द घूमता है, जैसे सपा के नेता आज़म खान जो सालों सत्ता में रहे और अब जांच का सामना कर रहे हैं और मेरे लिए यह वही पुराना चक्र है.
एक परिचित समीकरण: अभिजात वर्ग की असहजता को समुदाय की पीड़ित छवि की तरह पेश करना. मैं बड़े होते हुए यही लाइन बार-बार सुनती रही, कि जब भी ताकतवर मुस्लिम पुरुषों से सवाल होते हैं, समझो “मुसलमानों पर खतरा” है. बाद में जाकर समझ आया कि यह नैरेटिव आम मुसलमानों, खासकर पसमांदा लोगों को कितना नुकसान पहुंचाती है. हमारे मुद्दे कभी केंद्र में नहीं आते, हमारी गरीबी, हमारी कम प्रतिनिधित्व की समस्या, हमारी रोज़मर्रा की लड़ाइयां, सब गुम हो जाती हैं क्योंकि जैसे ही ताकतवर मुस्लिमों पर जवाबदेही आती है, पीड़ित कार्ड निकाल लिया जाता है और हमें कहा जाता है कि हम उनकी सत्ता को बचाने के लिए एकजुट हो जाएं, मानो हमारी इज्ज़त उनकी इज्ज़त से बंधी हो.
मेरा सवाल मदनी-साहब से बिल्कुल सीधा है: जिस प्रतिनिधित्व की उन्हें अचानक इतनी चिंता होने लगी है, क्या उन्होंने कभी यही सवाल इस देश की हर मुस्लिम संस्था पर हावी अशराफ अभिजात वर्ग से पूछा? क्या उन्होंने कभी मांग की कि भारतीय मुसलमानों के लगभग 80 फीसदी होने के बावजूद पसमांदा मुसलमानों की कोई सार्थक प्रतिनिधित्व क्यों नहीं है? अगर नहीं, तो वह किस आधार पर “सभी मुसलमानों” की ओर से बोलने का दावा करते हैं? क्या उन्हें समझ है कि जब तक हाशिये पर खड़ा मुसलमान को स्वीकार नहीं किया जाएगा, प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाएगा और अपनी समस्याएं खुद बताने का अधिकार नहीं दिया जाएगा, तब तक “मुस्लिम मुद्दों” का असली हल कभी सामने नहीं आएगा?
असल में, इस तरह का भाषण मुस्लिम युवाओं को किसी भी सरकारी नीति से ज्यादा नुकसान पहुंचाता है. यह चुपचाप यह खयाल बो देता है कि मुख्यधारा कभी उनकी नहीं हो सकती कि चाहे वह कितनी भी मेहनत कर लें, दरवाज़े हमेशा बंद ही रहेंगे. यह आकांक्षाओं को मार देता है, भेदभाव के मौका पाने से पहले ही और जो युवा पहले ही गरीबी, सीमित अवसरों और सामाजिक कलंक से जूझ रहे हैं, उनके लिए यह गढ़ी गई निराशा एक दूसरी जेल बन जाती है.
धीरे-धीरे खत्म होता भरोसा
मदनी जिस चीज़ को “सुरक्षा” कहते हैं, वह असल में आत्मविश्वास को धीरे-धीरे खत्म करना है, एक पूरी पीढ़ी को यह सिखाना कि नौकरियों, यूनिवर्सिटियों या सार्वजनिक जीवन के सपने देखने का कोई फायदा नहीं, क्योंकि दुनिया पहले से ही उनके खिलाफ खड़ी है. यह नेतृत्व नहीं है; यह आने वाली पीढ़ियों के साथ किया जा रहा एक मौन धोखा है.
इस सबमें दूसरी त्रासदी है—मदनी की प्राथमिकताएं.
उन्हें एक यूनिवर्सिटी की जांच ज्यादा परेशान करती है, बजाय उस कहीं ज्यादा डरावनी हकीकत के कि हमारे ही कुछ बच्चे कट्टरपंथ की ओर धकेले जा रहे हैं. यह बात हम सबको झकझोर देनी चाहिए. अगर संस्थान जांच नहीं करेंगे, अगर समुदाय खुद के भीतर झांक कर अपनी गलतियां नहीं देखेगा, तो इसकी कीमत बार-बार वही साधारण भारतीय मुसलमान चुकाएगा, जो आतंकवाद और उसके बाद आने वाले गुस्से, दोनों के बीच फंस जाता है. असली नेतृत्व को इसी बात की चिंता करनी चाहिए, न कि ताकतवर लोगों को बचाने की या हर कानूनी जांच को “हमले” की तरह पेश करने की.
हां, मदनी यह तर्क दे सकते थे कि निष्पक्षता होनी चाहिए, उचित प्रक्रिया का पालन हो, राज्य जल्दबाज़ी या राजनीतिक दबाव में न आए क्योंकि सरकार की दोहरी जिम्मेदारी है: पीड़ितों को न्याय देना और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करना और साथ ही यह सुनिश्चित करना कि वह वही शिकायत-आधारित नैरेटिव न बढ़ाएं जिन पर आतंकी समूह अपना समर्थन खड़ा करते हैं. यह एक वैध और सोच-समझकर उठाई गई चिंता होती, लेकिन वे वहां नहीं गए. उनका गुस्सा केवल अभिजात वर्ग के हितों की सुरक्षा पर केंद्रित दिखता है, न कि उस समुदाय की सुरक्षा या इज्ज़त पर, जिसकी ओर से बोलने का वे दावा करते हैं.
हम इस दोहराई हुई बेबसी से बेहतर के हकदार हैं. हमारे बच्चों को ऐसे भविष्य से ज्यादा चाहिए, जिसे वे लोग लिख रहे हैं जो अपनी निजी सत्ता को ही समुदाय का अस्तित्व समझ बैठे हैं. भारतीय मुसलमानों का भविष्य उन लोगों के हाथों से नहीं बनेगा जो पुराने डर और विरासत में मिली शिकायतों को पकड़े बैठे हैं, यह उन आवाज़ों से बनेगा जो ईमानदारी की हिम्मत करती हैं, जो दिखावे से ज्यादा जवाबदेही चुनती हैं और जो आखिरकार समुदाय के भीतर से सुधार की हिम्मत जुटाती हैं.
(आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
यह भी पढ़ें: एक पसमांदा मुस्लिम महिला होने के नाते, मुझे दुख है भारत को तलाक-ए-हसन पर सवाल उठाने में 70 साल लगे
