अमेरिका-इज़रायल और ईरान के बीच युद्ध सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय मामला नहीं है, जो घर से बहुत दूर कहीं चल रहा हो. यह सीमाओं को सैनिकों के जरिए नहीं, बल्कि विचारों, भावनाओं और नैरेटिव के जरिए पार करता है और उन समाजों में भी बातचीत और राजनीतिक सोच को प्रभावित करता है, जो युद्ध के मैदान से बहुत दूर हैं.
इस बात पर पहले ही बहुत कुछ लिखा जा चुका है कि भारत के दक्षिणपंथ के कुछ हिस्से इज़रायल का समर्थन क्यों करते हैं और यह अक्सर इस्लाम को लेकर उनकी अपनी सोच से जुड़ा होता है. मैंने भी पहले लिखा है कि भारतीय शिया मुसलमानों को आयतुल्ला अली खामेनेई के लिए शांति से मातम मनाने का अधिकार है, भले ही वे एक बेहद विवादित शख्सियत हों. मैंने भारतीय दक्षिणपंथ की इस बात के लिए भी आलोचना की है कि वह पूरे समुदाय को खलनायक की तरह पेश करता है.
लेकिन जिस बात को हम उसी ईमानदारी से बहुत कम देखते हैं, वह दूसरी तरफ है—आखिर भारतीय मुसलमानों के कुछ हिस्से, जिनमें कुछ बौद्धिक आवाज़ें भी शामिल हैं, ईरान के समर्थन में क्यों बोलते हैं. इस प्रतिक्रिया को क्या चीज़ आकार देती है? क्या यह सिर्फ धार्मिक एकजुटता है, राजनीतिक स्थिति है, या इससे भी गहरी कोई चीज है, जो पहचान और वैश्विक जुड़ाव की भावना से जुड़ी है?
कई मुस्लिम समुदाय, चाहे शिया हों या सुन्नी, अक्सर इस पर धार्मिक नज़रिए से प्रतिक्रिया देते हैं और सच कहूं तो, यह नज़रिया धीरे-धीरे कबीलाई सोच में बदल जाता है, जो उम्माह जैसी धारणाओं या धार्मिक नेताओं के संदेशों से बनती है.
ईरान के मामले में, खासकर शिया मुसलमानों के बीच, सहानुभूति की एक परत इतिहास से भी जुड़ी है. खामेनेई को सिर्फ एक राजनीतिक नेता के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाता है जिसने पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती दी, जिसने शिया पहचान को एक निष्क्रिय चीज से बदलकर राजनीतिक रूप से मुखर बनाया.
आप इसे अलग-अलग जगहों पर अलग तरीके से होते देख सकते हैं. भारत में शिया समुदायों ने ज्यादातर अपनी बात शांतिपूर्ण मातम और प्रदर्शन के जरिए रखी है, लेकिन पाकिस्तान में, यही भावनाएं ज्यादा तीखे और कई बार हिंसक प्रदर्शनों में भी दिखी हैं, जहां अपने ही राज्य पर अमेरिका के साथ मिला होने के आरोप लगाए गए.
मैं इन भावनाओं को समझ सकती हूं. ये धार्मिक पहचान और कबीलाई सोच से बनती हैं, लेकिन जो बात मुझे बेचैन करती है, वह यह है कि बौद्धिक आवाज़ें भी अक्सर इसी कबीलाई ढांचे से बाहर नहीं निकल पातीं. आप उनसे ज्यादा परतदार, ज्यादा संतुलित नजरिए की उम्मीद करते हैं. लेकिन कई बार तर्क पहचान की सीमा के भीतर ही बंद रह जाता है.
मैंने ऐसे तर्क सुने हैं कि ईरान भारत का दोस्त रहा है, इसलिए भारत को ईरान के साथ खड़ा होना चाहिए, लेकिन फिर इज़रायल का क्या? इज़रायल ने भी भारत का कई अहम मौकों पर साथ दिया है, खासकर रक्षा, खुफिया और तकनीक के क्षेत्र में. अगर विदेश नीति को चुनिंदा यादों या पहचान के आधार पर पक्ष चुनने तक सीमित कर दिया जाए, तो वह विश्लेषण नहीं रह जाती, बल्कि सिर्फ एक पक्ष के साथ खड़ा होना बन जाती है.
और शायद यही वह रेखा है, जिसे पार करने में कई भारतीय मुस्लिम बुद्धिजीवी अब भी संघर्ष कर रहे हैं.
एक आसान तर्क
दूसरा तर्क जो मैं बार-बार सुनती हूं, वह इज़रायल द्वारा किए गए मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर है और यह चिंता बिल्कुल जायज है. आम लोगों की तकलीफ, जानों का नुकसान और जवाबदेही से जुड़े सवाल उठने ही चाहिए, चाहे जिम्मेदार कोई भी हो. लेकिन फिर एक सवाल अपने आप उठता है: जब खामेनेई के तहत ईरानी शासन मानवाधिकार उल्लंघन करता है, तब यही आवाज़ें कहां होती हैं?
मैं त्रासदियों की तुलना करने या दुख को कम-ज्यादा बताने की कोशिश नहीं कर रही हूं. बात वह नहीं है, लेकिन एक सत्तावादी नेता का जश्न मनाना या उसे महिमामंडित करना और दूसरी तरफ किसी दूसरे पक्ष की मिलती-जुलती या अलग तरह की हिंसा के लिए निंदा करना—यह वह बात नहीं है, जिसकी उम्मीद किसी बुद्धिजीवी या खुद को उदारवादी कहने वाले लोगों से की जाती है. मानवाधिकार ऐसा नज़रिया है, जिसे चुनकर लागू नहीं किया जा सकता.
जिस एक तर्क से मैं सच में सहमत होती हूं, वह इससे भी आसान है, कि युद्ध ऐसी चीज़ नहीं है, जिस पर खुशी मनाई जाए. इसकी कीमत बहुत भारी होती है और अपने मूल में यह अब भी आक्रामकता ही है. हम इसके लिए चाहे जो भाषा इस्तेमाल करें—रणनीति, सुरक्षा, रोकथाम—हकीकत वही रहती है.
साथ ही, ईरान में मानवाधिकार उल्लंघनों को सैन्य हमले को सही ठहराने के आधार के रूप में इस्तेमाल करना एक खतरनाक दरवाजा खोल देता है क्योंकि अगर यही तर्क बन जाए, तो फिर कोई भी देश किसी दूसरे देश की आंतरिक विफलताओं का हवाला देकर उस पर हमला करने का हक जताने लगेगा. फिर उसका अंत कहां होगा?
संकीर्ण पहचानों से आगे
मैं कुछ प्रमुख भारतीय मुस्लिम आवाजों के इंटरव्यू और भाषणों में बार-बार पैन-इस्लामिज्म, यानी एकजुट उम्माह की बात सुनती हूं और यहीं पर वे खुद को सामने ला देते हैं. इस तरह की सोच का इंसानियत से बहुत कम और पहचान से बहुत ज्यादा लेना-देना है.
दिलचस्प बात यह है कि अगर हम आज की भू-राजनीतिक सच्चाई को देखें, तो एकजुट उम्माह की बात व्यवहार में कहीं दिखती भी नहीं है. मुस्लिम बहुल देश खुद अपने हितों, गठबंधनों और राजनीति के आधार पर बंटे हुए हैं. फिर भी, इस विचार की भावनात्मक ताकत अब भी प्रतिक्रियाओं को आकार देती है.
यह सिर्फ दूर कहीं चल रहे युद्ध की बात नहीं है; यह यह भी दिखाता है कि हम कैसे सोचते हैं और हमारी नैतिक समझ को कौन-सी चीज़ें आकार देती हैं. किसी एक पक्ष को चुन लेना आसान है, पहचानों के साथ खड़ा होना आसान है, दुनिया को “हम बनाम वे” के नजरिए से देखना आसान है. यह स्वाभाविक भी लगता है, और कई बार सुकून देने वाला भी.
लेकिन इसी समय हम कुछ बहुत ज़रूरी चीज़ खो भी देते हैं.
जब बुद्धिजीवी, यानी वे आवाज़ें जिनसे उम्मीद की जाती है कि वे तुरंत उभरी भावनाओं से ऊपर उठेंगी, वही कबीलाई रेखाएं दोहराने लगती हैं, तब ईमानदार सोच की जगह छोटी होने लगती है. अगर युद्ध, मानवाधिकार और न्याय पर हमारी राय इस बात के हिसाब से बदलती है कि मामला किससे जुड़ा है, तो फिर वे सच में सिद्धांत नहीं हैं.
भारत, अपनी सारी विविधता के साथ, हमेशा से इन संकीर्ण पहचानों से आगे सोचने का मौका रखता आया है. दुनिया की घटनाओं को धार्मिक एकजुटता या राजनीतिक सुविधा के नजरिए से नहीं, बल्कि एक ज्यादा जमीन से जुड़े, मानवीय नज़रिए से देखने की ज़रूरत है और यह सिलसिला आगे भी जारी रहना चाहिए.
आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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