आज हर कोई भारत के जेन-ज़ी की बात कर रहा है और उनका विश्लेषण कर रहा है, लेकिन मिलेनियल्स और उनकी परेशानियों को लोग भूल गए हैं.
मैं एक मिलेनियल हूं और मैं आपको बता दूं: हम बहुत ज़्यादा हैं. हम दो सदियों के बीच बड़े हुए और तब से ज़िंदगी के शुरू होने का इंतज़ार कर रहे हैं, जबकि हम इसका बड़ा हिस्सा जी भी चुके हैं. हम स्थिरता का इंतज़ार कर रहे हैं, भरोसे का इंतज़ार कर रहे हैं, किसी ऐसी चीज़ का इंतज़ार कर रहे हैं जो ज़िंदगी को आगे बढ़ा दे. हम वादों और हकीकत के बीच एक लंबे ठहराव में अटके हुए हैं. हम एक ऐसे बीच के हाल में फंसे हैं, जैसा दांते ने कभी नरक के दरवाज़ों के पहले वाले कमरों की कल्पना की थी.
बचपन आसान था. रविवार की सुबह दूरदर्शन पर रंगोली देखना, स्टील के टिफिन में रखे ठंडे आलू के पराठे खाना, बिजली जाने पर गर्मी की दोपहर में दादा-दादी के साथ अंताक्षरी खेलना और फुर्सत में लैंडलाइन नंबर याद करना. हमारे माता-पिता साफ-साफ कहते थे: “पढ़ लो, नौकरी मिल जाएगी; नौकरी मिल जाएगी, ज़िंदगी सेट हो जाएगी.”
बीच में अटके बच्चे
हमें बताया गया था कि ज़िंदगी एक सीधी लाइन है, लेकिन कहीं ऑर्कुट की स्क्रैप्स और इंस्टाग्राम की टाइमलाइन के बीच, सीटी केबल के रुक-रुक कर आने वाले टीवी सिग्नल और अनलिमिटेड डेटा के बीच, ज़मीन हमारे पैरों के नीचे से खिसक गई. हमें कहा गया कि भारत में, खासकर उदारीकरण के बाद, आगे बढ़ने के मौके बहुत तेज़ी से बढ़े हैं. कहा गया कि हम कुछ भी बन सकते हैं, लेकिन किसी ने यह नहीं बताया कि सीढ़ियां बहुत भरी होंगी और बीच में खड़े होकर न तो ऊपर का साफ नज़ारा दिखेगा, न नीचे का.
हम अपने माता-पिता की तरह जड़ नहीं हैं, जो एक शहर, एक नौकरी, एक शादी और एक ही तरह की ज़िंदगी में टिके रहे और हम उन लोगों की तरह बेफिक्र भी नहीं हैं जो हमारे बाद आए—जो खुद को बार-बार बदल लेते हैं, नौकरी छोड़ने से नहीं डरते, दिशा बदलने से नहीं डरते और बिना परिभाषा के भी ठीक रहते हैं. हम बीच में अटके बच्चे हैं—इतने परंपरागत कि आज़ाद महसूस नहीं कर पाते और इतने आधुनिक कि कहीं अपना घर जैसा नहीं लगता.
हमारी बीस की उम्र ईमेल लिखना सीखते हुए बीती, जो बाहर से आत्मविश्वासी लगें, जबकि अंदर हम कांप रहे होते थे. “Per my last mail”, “Just circling back” जैसे वाक्य. हम सपनों और स्टील के ट्रंक लेकर शहर बदलते रहे. पहली सैलरी अवास्तविक लगी—एक एसएमएस में आया नंबर, जो जल्दी ही ईएमआई और परिवार की ज़िम्मेदारियों में चला गया. हमने अपने लिए नए जूते खरीदने से पहले घर पैसे भेजना सीखा और अपराधबोध को दूसरी भाषा की तरह सीख लिया. कांच की दीवारों वाले खुले दफ्तरों में मुस्कुराना सीखा और रात में चुपके से रिज़्यूमे अपडेट करना भी और सोशल मीडिया की हर स्क्रॉल हमें याद दिलाती रही: किसी और ने सब समझ लिया है. कोई और शादी कर चुका है, प्रमोशन पा चुका है, विदेश जा चुका है, और खुश दिख रहा है.
परिवार की बैठकों में हम सवाल बन गए. ज़िंदगी में क्या कर रहे हो? शादी कब करोगे? हमारे जवाब लंबे और संभल-संभल कर दिए जाने लगे. हम योजनाओं और बदलावों की बात करते रहे. अंदर ही अंदर, उस मंज़िल तक न पहुंच पाने की चुप शर्म ढोते रहे, जिसे किसी ने ठीक से बताया ही नहीं था.
प्यार भी बीच का हो गया. आधी रात के बाद तक चलने वाली चैट्स में, व्हाट्सऐप के ब्लू टिक के साथ, जो छोटे-छोटे बिजली जैसे दिल की धड़कन लगती थीं. हमने शहरों के पार, जातियों के पार, उम्मीदों के पार और देशों के पार प्यार किया. कई बार हम “लोग क्या कहेंगे” की दहलीज़ पर ही रुक गए. कुछ ने नियमों से लड़ाई की. कुछ ने समझौता कर लिया. कुछ आज भी किसी गाने के रेडियो पर बजते ही किसी नाम को याद कर लेते हैं, देर रात कैब से घर लौटते वक्त.
ठीक होना, भागदौड़, बनते जाना
हम वह पीढ़ी हैं जिसने बिना नक्शे के मैच्योर होना सीखा. हम ऐसी तरह से थके हुए हैं जिसे नींद भी ठीक नहीं कर पाती. ढलने से थक गए हैं. मज़बूत बने रहने से थक गए हैं. यह सुन-सुन कर थक गए हैं कि हम कितने खुशकिस्मत हैं—खुशकिस्मत कि हमारे पास विकल्प हैं, खुशकिस्मत कि हमारे पास आज़ादी है—जबकि ऑप्शन खुद एक ऐसी भूलभुलैया लगते हैं, जिनमें बाहर निकलने का कोई बोर्ड नहीं. हम खुद को प्रोजेक्ट बनाते-बनाते थक गए हैं—लगातार खुद को बेहतर बनाना, ठीक करना, भागना, कुछ बनते जाना. हमारे माता-पिता हमारी थकान नहीं समझते. वे याद दिलाते हैं कि हम न कुएं खोद रहे हैं, न युद्ध झेल रहे हैं, लेकिन हम थके हुए हैं—हड्डियों तक.
फिर भी. हमारे भीतर कुछ बहुत सॉफ्ट है. हम विरोधाभासों को साथ रखना जानते हैं. हम एक धीमी दुनिया को याद करते हैं और एक ज़्यादा इंसाफ वाली दुनिया का सपना देखते हैं. हम तुलना से पहले की दुनिया को याद करते हैं. हम बीच के हैं, क्योंकि हमें ऐसा होना पड़ा.
सीधे शब्दों में कहें तो हम पुल वाली पीढ़ी हैं—अपने माता-पिता के स्थायित्व के विश्वास और अपनी लटकी हुई हकीकत के बीच खड़े. हम धीरे-धीरे सीख रहे हैं कि शायद ज़िंदगी कभी पूरी तरह “सेटल” नहीं होगी और शायद ऐसा होना ज़रूरी भी नहीं. कि शादी के बिना भी प्यार हो सकता है और पद के बिना भी अहमियत हो सकती है. कभी-कभी, देर रात, जब शहर पुराने डायल-अप मॉडेम की तरह गुनगुनाता है और हमारे फोन की ब्लू लाइट हम पर पड़ती है, हम उस इंसान का शोक मनाते हैं जो हम एक आसान दुनिया में हो सकते थे और फिर अगली सुबह उठते हैं और फिर कोशिश करते हैं—नौकरियों के लिए आवेदन भेजते हैं, शादियों में जाते हैं, घर फोन करते हैं और फिर भी प्यार करते रहते हैं.
हम सांसों के बीच का ठहराव हैं और दीये जलने से पहले की सांझ हैं. हम धीरे-धीरे, दर्द के साथ, यह सीख रहे हैं कि अधूरा होना ठीक है कि ज़िंदगी साफ-सुथरी नहीं होती और बिना हर पड़ाव टिक किए भी मतलब हो सकता है. शायद एक दिन यह इंतज़ार समझ में आएगा. शायद पीछे मुड़कर देखें तो लगेगा कि यह बीच का समय मंज़िल तक न पहुंच पाने की नाकामी नहीं था, बल्कि इंसानियत और सहानुभूति की गहरी सीख थी और शायद एक दिन इतिहास हमें—मिलेनियल्स को—मेहरबानी से याद करेगा.
(प्रणव जैन एक आईपीएस (पी) अधिकारी और कॉलमिस्ट हैं. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: विकास का नया रास्ता: भारत के आर्थिक मॉडल में संस्कृति की एंट्री
