एक युवा महिला के रूप में, मैंने जॉर्ज ऑर्वेल की 1984 पढ़ी थी, जिसमें एक ऐसी दुनिया की कल्पना की गई थी जहां तकनीक हर जगह मौजूद हो और हर चीज़ में दखल देने वाली हो. इंसान लगातार तकनीक की निगरानी में था. यह भविष्य अब दूर नहीं है, जैसा कि हमने पिछले हफ्ते नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में एक ही छत के नीचे दिखाई गई सभी नई तकनीकों के साथ देखा.
ऑर्वेल के “Big Brother is watching you” वाले विचार का मतलब यह भी हो सकता है कि पूरी दुनिया की नजर हम पर थी, क्योंकि यह पहली बार था कि इस स्तर का एक ग्लोबल एआई कार्यक्रम ग्लोबल साउथ, यानी एक विकासशील देश में आयोजित किया गया; इससे पहले के तीन कार्यक्रम 2023 में यूके में, 2024 में कोरिया में और 2025 में पैरिस में हुए थे. यह हमारे लिए बहुत गर्व और राष्ट्रीय महत्व की बात थी कि हम दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच पाए और उसे बनाए रख पाए. इस कार्यक्रम में 5 लाख से ज्यादा लोग आए और कई और लोग ऑनलाइन जुड़े क्योंकि सत्र इंटरनेट पर उपलब्ध कराए गए थे. 88 देशों ने एआई पर नई दिल्ली समझौते पर हस्ताक्षर किए और सभी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस बात को स्वीकार किया कि तकनीक को लोकतांत्रिक बनाना जरूरी है ताकि बदलाव लाया जा सके.
गलगोटिया गेट की शर्मनाक घटना और शोर-शराबे, और राहुल गांधी के बनियान बॉयज़ के तमाशे के धुंध से आगे बढ़ते हुए, यह दुनिया के सबसे बड़े एआई शिखर सम्मेलन की सफलताओं और कमियों पर शांत होकर सोचने का समय है. आइए मुख्य बातों का विश्लेषण करें.
थ्री P
एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने प्लेनेट (पृथ्वी), पीपल (लोग) और प्रोग्रेस (प्रगति) के तीन सूत्रों का ढांचा पेश किया था. भारत के लिए यह विचार नया नहीं है, क्योंकि हमारी प्राचीन सोच मानती है कि पृथ्वी एक साझा विरासत है, कोई वस्तु नहीं. इसलिए एआई को शोषण का नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने वाला एक साधन बनना चाहिए.
वसुधैव कुटुम्बकम की भावना भारत के संसाधन साझा करने के दृष्टिकोण का मार्गदर्शन करती है, जो प्राकृतिक संसाधनों की तरह एआई पर भी लागू होता है और इससे पूरे समाज का तकनीकी बदलाव हो सकता है. यह समावेशिता रोज़मर्रा की ज़िंदगी में पहले से दिख रही है: अब नुक्कड़ वाला सब्जीवाला भी यूपीआई से पैसे स्वीकार करता है. सीमा से जुड़े दूर-दराज हिमालय के इलाकों में, जहां इंटरनेट कनेक्टिविटी कमजोर हो सकती है, वहां भी यूपीआई काम करता है. मैं अपने स्मार्टफोन से खरीदारी कर सकती थी. यही असली समावेशिता है.
भारत का दृष्टिकोण तकनीकी बदलाव के केंद्र में प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि लोगों को रखता है और यही असली प्रगति का संतुलन है. जैसा कि पीएम मोदी ने कहा, “यह माना जाता है कि यह शिखर सम्मेलन मानव-केंद्रित, संवेदनशील वैश्विक एआई इकोसिस्टम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.”
इसलिए, असली प्रगति तब होगी जब तेजी से हो रहे नवाचार में मूल्य सबसे पहले आगे बढ़ें; जहां एआई समृद्धि बढ़ाए, लेकिन धर्म, समावेशिता और भरोसे से जुड़ा रहे.
वैश्विक कॉर्पोरेट नेता और भारत का टेक इकोसिस्टम देश को एआई के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर देख रहे हैं, जहां विशाल मानव संसाधन और डेटा का उपयोग करके भारत डीपटेक और एआई का लीडर बन सकता है.
उद्योग जगत की आवाजें, जैसे Tata Sons के चेयरमैन नटराजन चंद्रशेखरन ने एआई समिट में कहा कि एआई स्वास्थ्य, कृषि, वित्त और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों के लिए बदलाव लाने वाला अवसर है और उन्होंने कौशल और रोजगार सृजन पर जोर दिया.
इसी समय, सरकार और उद्योग की पहल एआई निवेश और शासन को आगे बढ़ा रही हैं, जैसे इंडिया एआई इमपैक्ट समिट और अन्य इकोसिस्टम बनाने के प्रयास. ये सभी मिलकर दिखाते हैं कि सरकार की रणनीतिक प्राथमिकता एआई क्षमताओं और स्वदेशी नवाचार को बढ़ाना है.
जीवन से भी बड़ा
एआई जिस गति से आगे बढ़ रहा है, वह एक केन्द्रापसारक बल (centrifugal force) की तरह है, जो अपने साथ बदलाव की तेज़ हवाएं ला रहा है. खुद पीएम मोदी ने भी अपने पूर्ण सत्र के भाषण में इसे एक विघ्नकर्ता कहा. उन्होंने कहा, “आज, हम फिर ऐसे ही एक अवसर का सामना कर रहे हैं. हमें मिलकर इस विघटन को मानवता के सबसे बड़े अवसर में बदलना होगा.”
हम भारतीय सबसे बड़े विघ्नकर्ता हैं. हम दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं और लगभग 1.4 अरब लोगों के साथ दूसरी सबसे बड़ी आबादी हैं—जिसका मतलब है कि एआई के लिए उपभोक्ताओं की बहुत बड़ी संख्या. स्टडीज़ दिखाती हैं कि भारत में इस समय दुनिया में सबसे तेज़ एआई अपनाने की दरों में से एक है, जहां 65 प्रतिशत से ज्यादा लोगों ने एआई का इस्तेमाल करके देखा है, जो वैश्विक औसत 31 प्रतिशत से दोगुना है.
करीब 77 प्रतिशत भारतीय नॉलेज वर्कर्स अपने काम की जगह पर एआई का यूज़ करते हैं, जिससे रोज एक से तीन घंटे का काम बचता है. भारतीय मुख्य रूप से एआई का इस्तेमाल ट्रांसलेशन, सवालों के जवाब देने, स्कूल के काम में मदद और काम की दक्षता बढ़ाने के लिए करते हैं. हाल ही में हुए टी20 विश्व कप के दौरान, मुझे खुशी हुई कि ऑपनएआई के चैटजीपीटी का विज्ञापन हिंदी में किया जा रहा था और मुझे पता है कि अन्य स्थानीय भाषाओं के उपयोगकर्ताओं के लिए भी विज्ञापन हैं. वास्तव में, चैटजीपीटी को भारत में सीमित समय के लिए सब्सक्रिप्शन-फ्री मॉडल के रूप में दिया गया, ताकि ज्यादा उपयोग से LLMs को भारतीय संदर्भ में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए ट्रेन किया जा सके.
इस संदर्भ में, Sarvam एआई और BharatGen जैसे स्वदेशी मॉडलों का उभरना आम लोगों के लिए खुशी की बात ही हो सकती है.
फॉर्च्यून बिज़नेस इनसाइट के अनुसार, “भारत के एआई मार्केट का आकार 2024 में 9.51 अरब डॉलर था और यह मार्केट 2025 में 13.05 अरब डॉलर से बढ़कर 2032 तक 130.63 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जिसमें अनुमानित अवधि के दौरान 39.00 प्रतिशत की CAGR होगी.” ये आंकड़े खुद ही सब कुछ बताते हैं. भारत उभरती एआई तकनीकों के लिए एक बहुत बड़ा मार्केट है और इसका बड़ा पैमाना इसे वैश्विक एआई कंपनियों के लिए एक आकर्षक बाजार बनाता है.
इस स्पीड को दिखाते हुए, शिखर सम्मेलन में 500 से ज्यादा एआई लीडर्स, 100 से ज्यादा संस्थापकों और मुख्य कार्यकारी अधिकारियों, 150 शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं, और लगभग 400 मुख्य तकनीकी अधिकारियों ने भाग लिया.
भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है: कम लागत वाले इंटरनेट, बड़े स्तर पर 4G/5G अपनाने और डिजिटल भुगतान ढांचे की वजह से. इन कारणों के साथ, डिजिटल अर्थव्यवस्था के कुल अर्थव्यवस्था से ज्यादा तेजी से बढ़ने की उम्मीद है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अनुसार, वैश्विक अर्थव्यवस्था का 70 प्रतिशत हिस्सा डिजिटल होगा.
रिपोर्ट के अनुसार, भारत 2028 तक 1 ट्रिलियन डॉलर की डिजिटल अर्थव्यवस्था बन सकता है और केवल डिजिटल भुगतान 2026 में 10 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकते हैं.
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प्रबंधन, सुरक्षा और संरक्षा
एआई की (बदलाव लाने वाली) क्षमता को ध्यान में रखते हुए, यह भी समझदारी है कि एआई कंपनियों को भारत के 1.4 अरब लोगों के डेटा तक जो पहुंच है, उस पर विचार किया जाए और इस बात पर भी कि इतना बड़ा डेटा भंडार अगर गलत हाथों में चला जाए तो कितना खतरा हो सकता है. भारत एक ऐसी सभ्यता है जिसने हमेशा ज्ञान को एक पवित्र भरोसा माना है और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का डेटा कहां रखा गया है, यह एक तकनीकी, नैतिक और कानूनी महत्व का सवाल है.
आधार के विपरीत, जिसे भारत की अपनी संस्थाओं ने विकसित किया था, ज्यादातर बैसिक LLMs अमेरिकी (OpenAI का ChatGPT), फ्रांसीसी (Claude AI) और चीन की कंपनियों के मालिकाना हक में हैं. जब हमारे नागरिकों की निजी डिजिटल जिंदगी—जैसे उनका स्वास्थ्य, आदतें, भाषा और आजीविका—विदेशी एआई सिस्टम द्वारा, जो हमारे नियामक नियंत्रण से बाहर हैं, प्रोसेस और उससे कमाई की जाती है, तो संप्रभुता का मतलब नया हो जाता है. हमने यह फेसबुक और एक्स के मामले में देखा है.
एआई में नेतृत्व के लिए स्वदेशी LLMs और तकनीकी ढांचे की ज़रूरत है. डेटा, जमीन और पानी की तरह, अब एक राष्ट्रीय संसाधन है, जिसे सुरक्षित रखना, नियंत्रित करना और जनता के हित में यूज़ करना ज़रूरी है. हालांकि, भारत की चुनौती यह नहीं है कि वह ग्लोबल इनोवेशन से पीछे हट जाए, बल्कि उसके साथ बराबरी की शर्तों पर जुड़ना है, यह सुनिश्चित करते हुए कि भारतीय जीवन से ट्रेन किया गया एआई आखिरकार भारतीय लोगों के लिए, भारतीय लोगों द्वारा, और भारतीय लोगों का हो.
भारत को अपना खुद का एआई स्टैक बनाना चाहिए, और इसके लिए स्पष्ट guardrails (सुरक्षा नियम) की ज़रूरत है—संप्रभुता, localisation और accountability पर. इसके लिए सार्वजनिक डिजिटल ढांचे और डिजिटल निगरानी का समर्थन चाहिए, ताकि भारत नवाचार में दुनिया के साथ एक रणनीतिक भागीदार के रूप में जुड़ सके. जैसा कि ऑर्वेल की 1984 ने चेतावनी दी थी कि एक ऐसी दुनिया होगी जहां शक्ति उन लोगों के पास होगी जो जानकारी को नियंत्रित करते हैं, एआई के युग में यह सवाल उठता है: हमारे जीवन को परिभाषित करने वाले डेटा का मालिक कौन है?
मैंने एक dystopian (डरावनी भविष्य की) सीरीज़ अपलोड (2020) एक ओटीटी चैनल पर देखी थी. इसमें एक ऐसी दुनिया दिखाई गई थी जहां चेतना (consciousness) भी कंपनियों द्वारा होस्ट, कीमत तय और नियंत्रित की जाती है. यह हमें याद दिलाती है कि जब डिजिटल जिंदगी का टकराव व्यापार से होता है, तो स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता बिग डेटा के सामने कमज़ोर हो सकती है.
इस पृष्ठभूमि में, भारत ने अपना आत्मनिर्भर एआई प्लेटफॉर्म Sarvam एआई डेवलप किया ह और शुरुआती रिपोर्ट अच्छी हैं. “भारत के लिए खास तौर पर एआई सिस्टम बनाने के विजन के साथ, Sarvam एआई एक ऐसा संगठन है जो बुनियादी घटकों का निर्माण करके और उन्हें भारत की अनोखी भाषा, एंटरप्राइज और शासन की ज़रूरतों पर लागू करके भारत के लिए एआई डेवलप कर रहा है.” संगठन अपने मिशन का वर्णन करता है. यह फुल-स्टैक एआई प्लेटफॉर्म पूरी तरह भारत में डिजाइन, विकसित और लागू किया गया है, जो सच में मेक इन इंडिया पहल है.
ब्रैनरॉट या सुपर ह्यूमन इंटेलिजेंस?
अमेरिकन अकादमी फॉर योगा इन मेडिसिन के कुछ विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि चैटजीपीटी जैसे एआई टूल्स पर ज्यादा निर्भरता “हमारे दिमाग को छोटा कर रही है”. पहले लिखना आसानी से और ज्यादा होता था, लेकिन अब यह एक कठिन काम लगता है. जैसे वर्ड प्रोसेसर आने से स्पेलिंग की क्षमता कम हो गई थी, वैसे ही चैटजीपीटी हमारी सोचने की क्षमता को कमजोर कर रहा है.
इंस्टाग्राम पर एक रील घूम रही है, जिसमें छात्रों का एक समूह 67 + 33 का हिसाब नहीं लगा पाता. cognitive experts के कुछ शुरुआती शोध ने दिखाया है कि एआई पर निर्भरता से सोचने की कोशिश कम हुई है और सोचने की क्षमता में गिरावट आई है. पैसिव थिंकिंग का खतरा ज्यादा है और धारणाओं को चुनौती देने में रुचि कम हो रही है.
न्यूरोलॉजिस्ट्स के अनुसार, यह एक ऐसा खतरा है जिसके बारे में हमें बहुत ज्यादा जागरूक रहना चाहिए. सबूत दिखाते हैं कि स्क्रीन पर ज्यादा निर्भरता के कारण अटेंशन स्पैन कम हुआ है और एडीएचडी और ऑटिज़्म जैसे न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर्स बढ़े हैं; इसमें एआई जुड़ने से यह और ज्यादा बढ़ सकता है.
अमेरिकन अकादमी फॉर योगा इन न्यूरोसाइंस, टेनेसी के न्यूज़लेटर के एक एडिटोरियल में कहा गया, “सुविधा कॉग्निटिव स्टैमिना को कमजोर कर सकती है, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. अगर समझदारी से यूज़ किया जाए, तो एआई सोच को बढ़ा सकता है, क्योंकि यह यूजर्स को तेज़ी से विचार खोजने, बेहतर सवाल पूछने और ज्यादा प्रभावी तरीके से सीखने में मदद करता है. दिमाग टूल्स से छोटा नहीं होता; यह उपयोग न करने से छोटा होता है.”
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बनियान बॉयज़ की अराजकता
मैं सिर्फ विपक्ष के नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए प्रतीकात्मक कपड़े उतारने का ज़िक्र करूंगी. न तो वह आधुनिक समय के द्रौपदी हैं और न ही भारत मंडपम अंधे राजा धृतराष्ट्र का दरबार था. वैश्विक महत्व के एक अंतरराष्ट्रीय समिट के दौरान इस तरह का अनुचित काम करना, कम से कम कहें तो, शर्मनाक था.
हमारी राजनीतिक विचारधारा अलग हो सकती है, लेकिन जब देश एआई के भविष्य में नेतृत्व करने के अपने प्रयास में केंद्र में होता है, तब राजनीतिक मतभेदों को अलग रखकर पूरे भारतीय लोगों के हित और आकांक्षाओं को आगे बढ़ाना चाहिए. वैश्विक यादों में, समिट को उसके इरादों के साथ-साथ उसकी तस्वीरों के लिए भी याद रखा जाता है. ‘राजनीतिक लापरवाही’ से जुड़े अनौपचारिक और गैर-गंभीर दृश्य ने हमारे देश को मज़ाक और मीम बना दिया है. ऐसे समय में जब धारणा नीति से तेज़ चलती है, ऐसी तस्वीरें भारत की तकनीकी महत्वाकांक्षा की गंभीरता को कमजोर कर सकती हैं. राहुल गांधी के नेतृत्व वाला विपक्ष यह समझे कि विपक्ष का काम सिर्फ विरोध करना नहीं बल्कि शासन का एक वैकल्पिक तरीका देना भी है, और मैं कहूंगी कि वे इसमें बुरी तरह असफल हो रहे हैं.
हम सावधानी भरे आशावाद के साथ कह सकते हैं कि एआई इम्पैक्ट समिट 2026 एक बड़ी सफलता रहा है. मुकेश अंबानी ने एआई में क्रांति लाने के लिए, जैसे उन्होंने मोबाइल डेटा में किया था, 10 साल में 10 लाख करोड़ रुपये निवेश करने की पेशकश की है. पीएम मोदी ने जेवर में सेमीकंडक्टर के लिए HCL-Foxconn जॉइंट वेंचर की आधारशिला रखी.
भारत का डिजिटल इन्फ्लेक्शन प्वाईंट सिर्फ एक चर्चा का शब्द नहीं है. यह एक वास्तविक और मापने योग्य बदलाव को दिखाता है, जिसमें डिजिटल तकनीक आर्थिक ढांचे और उत्पादकता को गहराई से प्रभावित कर रही है, सार्वजनिक और निजी क्षेत्र मिलकर स्कैलेबल और अंतर-संचालनीय अवसंरचना बना रहे हैं और इनोवेशन ग्लोबल नेतृत्व के अवसर पैदा कर रहा है—खासकर एआई और डीपटेक में.
हर दिन की ज़िंदगी, शासन और भुगतान से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा तक, डिजिटल रूप से सक्षम होती जा रही है.
असल में, भारत की डिजिटल यात्रा अब सिर्फ सीधी रेखा में बढ़ोतरी नहीं है; यह एक ऐसे चरण में पहुंच रही है जहां डिजिटल राष्ट्रीय विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए बुनियादी बन रहा है.
मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.
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