इस साल का अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस भी पहले की तरह ही रहा. इसमें भाषण, कार्यक्रम, फोटो खिंचवाना, बैनर और गुब्बारे—यानी गुलाबी रंग की बातें, सब शामिल थीं. इस साल का विषय था “Rights. Justice. Action. For ALL Women and Girls”.
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया भर में महिलाओं के पास पुरुषों की तुलना में सिर्फ 64 प्रतिशत कानूनी अधिकार हैं और अगर इसी गति से प्रगति होती रही, तो कानूनी सुरक्षा में यह अंतर खत्म होने में 286 साल और लगेंगे. यह एक चिंताजनक आंकड़ा है.
आज भी महिलाओं और लड़कियों के लिए समान न्याय का रास्ता आसान नहीं है. इस रास्ते में कई सामाजिक नियम बाधा बनते हैं, कानूनों में भेदभाव होता है और लैंगिक समानता के खिलाफ लगातार विरोध भी देखने को मिलता है.
हर पीढ़ी की महिलाओं को एक अलग भारत मिलता है. आज की महिलाओं को जहां कई चुनौतियां विरासत में मिली हैं, वहीं उन्हें पहले से कहीं ज्यादा अवसर भी मिल रहे हैं. कक्षाओं और कोडिंग लैब से लेकर स्टार्टअप हब, खेल मैदान और अंतरिक्ष में जाने वाले उपग्रहों तक, भारतीय महिलाएं ऐसी भूमिकाओं में आगे बढ़ रही हैं जो देश को बदल रही हैं.
इसका एक उदाहरण ऑपरेशन सिंदूर है, जिसमें कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह के जरिए नारी शक्ति दिखाई दी. वहीं भारत के राष्ट्रपति पद पर द्रौपदी मुर्मू हैं, जो संथाल समुदाय से आती हैं.
महिलाओं को न्याय दिलाने के क्षेत्र में भारत की प्रगति कई क्षेत्रों में दिखाई देती है. देश जेंडर बजटिंग की शुरुआत कर रहा है, कानूनी सुरक्षा बढ़ा रहा है और गांव स्तर पर चुनी हुई महिला नेताओं का दुनिया का सबसे बड़ा नेटवर्क बना रहा है.
भारत अपने विकास के ढांचे में लैंगिक समानता को शामिल कर रहा है. साथ ही उभरती अर्थव्यवस्थाओं में महिलाओं के सशक्तिकरण को आगे बढ़ाने में भी भारत खुद को एक नेता के रूप में स्थापित कर रहा है. इसके लिए महिलाओं के लिए डिजिटल पहुंच बढ़ाई जा रही है और नई उद्योगों में उनकी भागीदारी मजबूत की जा रही है.
महिलाओं के नेतृत्व वाला विकास
भारत धीरे-धीरे ऐसे मॉडल की ओर बढ़ रहा है जहां विकास सिर्फ महिलाओं तक पहुंचाया नहीं जाता, बल्कि अब इसे महिलाएं ही ज्यादा डिजाइन कर रही हैं और आगे बढ़ा रही हैं. भारतीय महिलाएं फैसले लेने वालीं, नए विचार लाने वालीं और समुदाय की नेता बन रही हैं.
भारत में पंचायती राज संस्थाओं में 14 लाख से ज्यादा चुनी हुई महिला प्रतिनिधि हैं. इससे देश में दुनिया के सबसे बड़े महिला नेताओं के नेटवर्क में से एक बना है. यह बड़ी उपलब्धि 73वें और 74वें संविधान संशोधन के जरिए संभव हुई, जिनमें स्थानीय शासन में महिलाओं के लिए आरक्षण तय किया गया. इससे महिलाओं को कानूनी रूप से निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया. इस तरह संस्थागत न्याय राजनीतिक भागीदारी बढ़ने से मजबूत हुआ है.
वित्त वर्ष 2026 के लिए जेंडर बजट बढ़कर रिकॉर्ड 5.01 लाख करोड़ रुपये हो गया है. यह पिछले साल के 4.49 लाख करोड़ रुपये से 11.36 प्रतिशत ज्यादा है. अब यह कुल केंद्रीय बजट का 9.37 प्रतिशत है, जो वित्त वर्ष 2025 में 8.86 प्रतिशत था. इसमें 53 मंत्रालय शामिल हैं, जो महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण से जुड़े कार्यक्रम चला रहे हैं. सरकार स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा और आर्थिक भागीदारी में महिलाओं की जरूरतों पर खास ध्यान दे रही है.
महिलाओं की भागीदारी के मामले में भारत एविएशन क्षेत्र में भी आगे है. देश में कुल पायलटों में लगभग 15 प्रतिशत महिलाएं हैं, जो दुनिया के औसत 5 प्रतिशत से तीन गुना ज्यादा है. महिलाएं अब उन पेशों में भी आगे बढ़ रही हैं जिन्हें पहले पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था. भारत के टेक्नोलॉजी क्षेत्र में भी लगभग एक-तिहाई कर्मचारी महिलाएं हैं, जिससे यह महिलाओं की भागीदारी वाले देशों में शामिल है.
सरकार ने महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई माइक्रोफाइनेंस योजनाएं शुरू की हैं. दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत 10 करोड़ से ज्यादा महिलाओं को लाभ मिला है. यह योजना महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों के जरिए संगठित करती है. यह दुनिया के सबसे बड़े महिला-नेतृत्व वाले सामुदायिक प्लेटफॉर्म में से एक है, जिसमें 98 प्रतिशत ऋण वापसी दर है.
लखपति दीदी और ड्रोन दीदी जैसी योजनाएं भी शुरू की गई हैं. इनका उद्देश्य सिर्फ ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाना ही नहीं, बल्कि उन्हें नई तकनीक की जानकारी देना और कौशल बढ़ाना भी है.
सरकार की वूमनिया ई-कॉमर्स पोर्टल योजना से महिला उद्यमी सीधे सरकारी खरीदारों को सामान बेच सकती हैं. प्रधानमंत्री जन धन योजना, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना और स्टैंड-अप इंडिया जैसी वित्तीय योजनाएं भी महिलाओं को विकसित भारत की यात्रा में बराबर का भागीदार बना रही हैं.
महिलाएं काम में जो कौशल लाती हैं, वह पुरुषों से अलग होते हुए भी एक-दूसरे को पूरा करने वाले होते हैं. महिलाएं अक्सर भावनात्मक समझ, सहयोग और धैर्य जैसे गुणों में मजबूत होती हैं. आज के जटिल और ज्ञान आधारित आर्थिक माहौल में ये कौशल बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं.
महिलाओं के लिए कौशल विकास और लगातार सीखने के अवसर बढ़ाना ज़रूरी होगा, खासकर डिजिटल तकनीक, नेतृत्व और नए उद्योगों के क्षेत्रों में. इससे संयुक्त राष्ट्र के “सभी महिलाओं के लिए अधिकार, न्याय और कार्रवाई” वाले लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी.
जब महिलाओं को अपने अलग कौशल, अनुभव और सोच का इस्तेमाल करने का अवसर मिलता है, तो संस्थाएं समाज की ज़रूरतों को बेहतर तरीके से समझ पाती हैं. इन ताकतों का उपयोग करना सिर्फ समानता का सवाल नहीं है, बल्कि मजबूत और न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाने की रणनीतिक ज़रूरत भी है, ताकि लैंगिक न्याय का बड़ा लक्ष्य हासिल किया जा सके.
प्राचीन जड़ें
भारत का संविधान सभी नागरिकों को कानून के सामने समानता देता है, लेकिन महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान भी करता है. इससे यह सुनिश्चित होता है कि महिलाओं को एक विशेष वर्ग के रूप में माना जाए और उन्हें अपने पक्ष में विशेष अधिकार मिलें.
जब दुनिया महिलाओं और लड़कियों के लिए न्याय के विषय पर विचार कर रही है, तब भारत की विकास यात्रा एक मजबूत सच को दिखाती है, जिसकी जड़ें हमारे शास्त्रों और संस्कृति में मिलती हैं:
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः |
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः || (मनुस्मृति 3.56)
(जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां देवता भी प्रसन्न होते हैं;
और जहां उनका सम्मान नहीं होता, वहां सभी काम व्यर्थ हो जाते हैं.)
यह प्राचीन संस्कृत वाक्य हमें याद दिलाता है कि महिलाओं का सम्मान भारत की संस्कृति में लंबे समय से शामिल रहा है.
21वीं सदी में इसका मतलब यह समझा जा सकता है कि जहां महिलाओं को शिक्षा, कौशल विकास, तकनीक तक पहुंच, राजनीति में प्रतिनिधित्व और सुरक्षित सार्वजनिक स्थान मिलते हैं, वहां समाज और संस्कृति आगे बढ़ते हैं और फलते-फूलते हैं.
मुझे गर्व है कि मैं ऐसी सरकार से जुड़ा हूं जो महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास पर ध्यान देती है.
मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.
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