हर साल जनवरी में स्विट्ज़रलैंड का पहाड़ी शहर दावोस ग्लोबल इन्फ्वलुएंस के एक खास वर्ग का हब बन जाता है—सीईओ, वित्त मंत्री, तकनीकी प्रमुख, उद्यमी और थिंक-टैंक से जुड़े लोग यहां इकट्ठा होते हैं ताकि विचारों का आदान-प्रदान करें, सौदे तय करें और ग्लोबल अर्थव्यवस्था से जुड़ी धारणाओं को आकार दें.
लोग दावोस इसलिए आते हैं क्योंकि यह सिर्फ एक सम्मेलन नहीं है. यह रिश्तों का एक सहेजा हुआ मार्केट है, जहां पूंजी नीति से मिलती है, संकेत देने वाले भाषण सुर्खियों में बदल जाते हैं और अनौपचारिक बातचीत औपचारिक नतीजे पैदा करती है, लेकिन अगले दशक के लिए एक स्वाभाविक सवाल है: जब इससे कहीं ज्यादा समृद्ध और विविध वैश्विक बातचीत कहीं और से भी बुलाई जा सकती है, तो यह मार्केट सिर्फ एक पहाड़ी स्थल तक ही क्यों सीमित रहे? और खास तौर पर, दुनिया को इसकी मेज़बानी के लिए भारत की ओर क्यों देखना चाहिए?
आज भारत पहुंच और प्रभाव—दोनों का ऐसा मेल पेश करता है, जो बहुत कम देश कर पाते हैं. भारत दुनिया का सबसे अहम बड़ा लोकतंत्र है, तेज़ी से बढ़ता बाज़ार है और ऐसे विचारों का हब है जो ग्लोबल नॉर्थ और ग्लोबल साउथ—दोनों के लिए मायने रखते हैं. इसके अलावा, भारत आधुनिक बुनियादी ढांचे को जीवंत सांस्कृतिक विविधता के साथ जोड़ता है. उसने आधार और यूपीआई जैसे डिजिटल पब्लिक गुड्स तैयार किए हैं, जो पूरे समाज में लेनदेन की लागत घटाते हैं. वह मैन्युफैक्चरिंग और इनोवेशन को बढ़ाने के लिए नेशनल प्रोग्राम चलाता है और उसका निजी क्षेत्र बड़े पैमाने और गतिशीलता का उदाहरण है.
ये कोई सैद्धांतिक संपत्तियां नहीं हैं; ये वे व्यावहारिक तत्व हैं जो किसी ग्लोबल इकोनोमिक मंच को उपयोगी बनाते हैं और बड़े स्तर पर दोहराने लायक भी. भारत में होने वाला कोई मंच दावोस की प्रांतीय नकल नहीं होगा; बल्कि यह एक पूरक मंच होगा, जहां मानवता के बहुसंख्यक वर्ग के नजरिये से विकास, समावेशन और सततता पर बहस होगी.
ग्लोबल लीडर्स के भारत आने के साफ कारण हैं. पहला, भारत सिर्फ एक मार्केट नहीं, बल्कि एक क्रॉसरोड्स भी है. यह एशियाई सप्लाई चेन, समुद्री मार्गों और दक्षिण व दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका और पश्चिम एशिया तक फैली विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की श्रृंखला के बीच रणनीतिक रूप से स्थित है. इसलिए सप्लाई चेन मज़बूत करना चाहने वाली कंपनियों और ग्लोबल साउथ के साथ रिश्ते गढ़ने वाले नीति-निर्माताओं—दोनों के लिए भारत एक ऐसी लैब है, जहां नए विचारों की धार को परखा जा सकता है.
दूसरा, ऐसे आयोजन के पैमाने और जटिलता से निपटने का अनुभव भी भारत के पास है. प्रवासी भारतीय सम्मेलन से लेकर कुंभ जैसे विशाल तीर्थ आयोजनों के लॉजिस्टिक प्रबंधन तक, भारत ने जटिल आयोजनों को संभालने की स्पष्ट क्षमता दिखाई है. जी20 शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता के सफल आयोजन ने इस क्षमता को अंतरराष्ट्रीय मंच पर और आगे बढ़ाया है.
आर्थिक और सामाजिक लाभ
इस तरह भारत-केंद्रित एक खास मंच अलग तरह की सामग्री और एक अलग ‘नैतिक अर्थव्यवस्था’ भी पेश कर सकेगा: “दावोस में वैश्वीकरण का आकर्षण उसकी एलीट नेटवर्किंग है; भारत वह जगह बन सकता है जहां वैश्विक पूंजी का शीर्ष वर्ग विकास के नतीजों, विकास तकनीकों और उन क्षेत्रों की संरचना पर लगातार ध्यान के साथ मिले—जो गरीबी घटा रहे हैं, सम्मानजनक नौकरियां पैदा कर रहे हैं या ऊर्जा क्रांति को तेज़ कर रहे हैं.”
अरबों लोगों को क्या आकर्षित करेगा, लेकिन जो उत्तरी देशों के एजेंडों में शायद ही प्रमुखता से दिखता है? भारत के अपने कार्यक्रमों पर नज़र डालिए—इंटरनेशनल सोलर एलायंस, ग्रीन हाइड्रोजन, डिजिटल स्टैक्स—इन सबमें ग्लोबल साउथ के साझेदारों को देने के लिए भरोसेमंद और ठोस चीज़ें हैं, जब वे अपने विकास के रास्तों की योजना हमारी तुलना में तेज़ या धीमी गति से बना रहे हों.
व्यावहारिक तौर पर, मंच को भारत में क्यूरेट किया जाएगा, लेकिन उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी जोड़ा जाएगा. इसके लिए ज़रूरी नहीं कि किसी एक शहर को प्रतीक बनाया जाए; बल्कि दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद में इस मंच को घुमाने से नीति नेतृत्व, वित्तीय केंद्रों, तकनीकी हब और मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर्स जैसी मुख्य क्षमताओं को सामने लाने में मदद मिलेगी.
इसके अलावा, इस मॉडल के लिए एक मज़बूत कूटनीतिक प्रयास की ज़रूरत होगी, ताकि इस मंच को संवाद के एक नए रूप के तौर पर डिज़ाइन किया जा सके, जिसमें उच्च-स्तरीय मंत्रिस्तरीय सत्र, सीईओ राउंड्स और नीति-केंद्रित बैठकें शामिल हों, जो अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर मानक तय करने में मदद करें. इस डिज़ाइन में स्टार्टअप्स और एसएमईज़ के लिए भी जगह होनी चाहिए, साथ ही भोजन और अन्य सॉफ्ट-पावर तत्वों के लिए भी, यह मानते हुए कि भारत का भोजन, कला, साहित्य और फिल्म निर्माण की परंपराएं इस कूटनीति को इतना टिकाऊ बना सकती हैं कि संवाद, भरोसा और व्यापार आगे बढ़ सकें.
इसके लाभ आर्थिक भी होंगे और सामाजिक भी. एक वैश्विक आर्थिक मंच की मेज़बानी से भारत में आने वाला कारोबारी सफर और पर्यटन बढ़ेगा, स्थानीय MICE इकोसिस्टम को गति मिलेगी, ऑन-साइट एमओयू और जॉइंट वेंचर्स के ज़रिए एफडीआई की पाइपलाइन तेज़ होगी और हॉस्पिटैलिटी, लॉजिस्टिक्स और प्रोफेशनल सर्विसेज़ में मल्टीप्लायर असर पैदा होगा. इससे भी ज़्यादा अहम होगा इसका बौद्धिक प्रभाव, जो संरचनात्मक होगा, जब उभरती अर्थव्यवस्था के नेतृत्व में समावेशी विकास, जलवायु न्याय और विकास के लिए तकनीक की कहानियों को वैश्विक मंच पर रखा जाएगा, तो दुनिया को एक संतुलित संवाद का लाभ मिलेगा, जहां ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताएं सिर्फ जोड़ भर नहीं, बल्कि बातचीत की मूल रूपरेखा होंगी.
नकल नहीं, अलग पहचान
आलोचक पूछेंगे कि क्या भारत में होने वाला कोई मंच दावोस जैसी प्रतिष्ठा हासिल कर सकता है. इसका जवाब नकल में नहीं, बल्कि अलग पहचान में है. एक सफल भारतीय मंच दावोस की विशिष्टता की नकल करने की कोशिश नहीं करेगा; वह प्रासंगिकता के आधार पर प्रतिस्पर्धा करेगा. दावोस में अधिकारी और मंत्री अपने जैसे लोगों से मिलने और बाज़ारों को प्रभावित करने जाते हैं. वे भारत इसलिए आएंगे ताकि नए साझेदारों से मिल सकें, उभरती सप्लाई चेन को खोल सकें, बड़े पैमाने पर लागू होने वाले विकास प्रोजेक्ट्स का परीक्षण कर सकें और अभूतपूर्व आकार के मार्केट्स खोल सकें. कई ग्लोबल इंस्टीट्यूट पहले से ही भारत के साथ सेक्टर-आधारित पहलों पर काम कर रहे हैं; इन रिश्तों को एक वार्षिक मंच के रूप में औपचारिक बनाना फैसलों की गति बढ़ाएगा और किए गए वादों के लिए जवाबदेही भी बढ़ाएगा.
भारत में WEF-शैली का आयोजन करने के पीछे एक कूटनीतिक तर्क भी है. इससे बहुपक्षीय व्यवस्था की संरचना मज़बूत होगी क्योंकि यह गठबंधनों के विकास के लिए एक अतिरिक्त या वैकल्पिक मंच देगा, जहां एजेंडा तय करने की मेज़ पर ग्लोबल साउथ के लिए स्थायी जगह होगी. यह वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे बदलाव के संदर्भ में महत्वपूर्ण है. यह वैश्विक बौद्धिक संस्कृति के लिए एक तरह का बैकअप भी देगा—एकरूपता के जोखिम को कम करते हुए और हमें इसे वैश्विक संरचना की एक बेहतर डिज़ाइन विशेषता के रूप में अपनाना चाहिए.
अंत में, नवाचार न करने की कीमत भी एक छिपे हुए तरीके से सामने आ सकती है. अगर वैश्विक बहसें केवल उत्तरी देशों के स्थानों पर ही होती रहीं, तो उन नीतिगत साधनों की कीमत बहुत बड़ी हो सकती है, क्योंकि वे दुनिया की बहुसंख्या की वास्तविकताओं से कटे हुए हो सकते हैं. भारत के प्रस्ताव की सरलता ही उसकी गहराई का हिस्सा है. दुनिया को वहीं लाओ जहां मुद्दे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जीए जाते हैं और जहां समाधान सक्रिय रूप से तैयार हो रहे हैं.
दुनिया को नए दृष्टिकोण, नए बाज़ार और नए स्थिर गठबंधनों से लाभ होगा. वहीं भारत अपनी नई भूमिका को सुरक्षित करेगा—नकल दिखाकर नहीं, बल्कि व्यवहारिकता का एक नया रूप पेश करके.
अगर इस विचार को गंभीरता से लिया जाए, तो भारत के पास पहले से ही ज़रूरी आधार मौजूद हैं—शासन क्षमता, डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर, बड़े आयोजनों का अनुभव और सांस्कृतिक गरिमा—ताकि वह एक ऐसा मंच बना सके जो मौजूदा वैश्विक आयोजनों से प्रतिस्पर्धा करने के बजाय उन्हें पूरक बने. अब ज़िम्मेदारी व्यापार, सरकार और नागरिक समाज की है कि वे समय, स्थान और एक वादे पर सहमति बनाएं: एक ग्लोबल इंडिया फोरम बुलाने का वादा, जो ऐसी दुनिया के लिए एजेंडा तय करे जहां विकास को सिर्फ जीडीपी से नहीं, बल्कि मज़बूती, समावेशन और साझा समृद्धि से भी मापा जाए. वैश्विक नेतृत्व का अगला दौर ऐसे मंचों को तरजीह देगा जो प्रामाणिक और प्रभावी हों; ऐसे मंच की मेज़बानी का भारत का समय आ चुका है.
मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका X हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.
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