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Thursday, 20 June, 2024
होममत-विमतधारा 370 पर भारत ने नहीं किया है किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते का उल्लंघन, न के बराबर होगा विरोध

धारा 370 पर भारत ने नहीं किया है किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते का उल्लंघन, न के बराबर होगा विरोध

विदेशी मीडिया की ओर से ज़रूर कड़ी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं पर जहां तक सरकारों की बात है, हमें ज्यादातर चुप्पी या शांत समर्थन देखने को मिलेगा.

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नरेंद्र मोदी सरकार ने संविधान की धारा 35 ए को भंग करने के संभावित कदम पर वैश्विक समुदाय के लोगों को चुपचाप सन्देश भेजा. ज्ञात हो कि धारा 35 ए के तहत कोई भी व्यक्ति जो जम्मू-कश्मीर राज्य का विषय नहीं है, राज्य में संपत्ति नहीं खरीद सकता है.

मैंने दुनिया भर के कई लोगों से इस बारे में उनकी प्रतिक्रिया जानने के लिए विशेष तौर पर बात की थी.

हैरानी की बात है कि सभी प्रतिक्रियाएं, बिना किसी अपवाद के, मौन और असंबद्ध, अनुमोदन पर टिकी थीं. हालांकि बातचीत अनुच्छेद 35 A तक ही सीमित थी, लेकिन उन्होंने मुझे विश्वास दिलाया कि अनुच्छेद 370 को खत्म करने से अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कोई वास्तविक प्रतिक्रिया नहीं मिलेगी, वहीं पाकिस्तान में रोष को बचाया जा सकेगा और इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) द्वारा औपचारिक रूप से निंदा की जायेगी. पर ऐसा क्यों है?


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मोदी ने रख दी थी नींव

स्पष्ट रूप से, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस महत्वपूर्ण अवसर की नींव डाल रहे थे जब उन्होंने ओसाका जी-20 शिखर सम्मेलन में डोनाल्ड ट्रम्प से बात की थी. उन्होंने निश्चित रूप से मध्यस्थता के लिए नहीं कहा, लेकिन उन्होंने लगभग सरसरी तौर पर अपने फैसले की जानकारी दी, हालांकि यह जैसा सोचा था वैसे नहीं हुआ. भारत सरकार द्वारा सार्वजनिक रूप से मध्यस्थता के लिए कहने के दावों से इनकार करने पर ट्रम्प के संयम का मतलब था कि किसी प्रकार का तत्काल समझौता हुआ था और अमेरिकी राष्ट्रपति को आखिरकार सटीक अनुरोध के बारे में सूचित किया गया था. स्पष्ट रूप से पूछे जाने पर – ट्रम्प ने ये स्वीकार किया कि अनुरोध किये जाने पर वे मध्यस्थता करने के लिए तैयार हैं – पर उन्होंने ये नहीं कहा कि मोदी ने उनसे ऐसा करने के लिए कहा था.

कई मायनों में, यूएस की प्रतिक्रिया महज सबसे महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया नहीं होती है, यह एकमात्र वास्तविक प्रतिक्रिया है जो मायने रखती है. ऐसा इसलिए है क्योंकि पश्चिमी मीडिया, जो कि हमेशा अमेरिका की सोच से प्रभावित रहता है, के विचार अधिकतर उसी दिशा में होते हैं.

हमने इसे बोस्निया के मामले में देखा, उदाहरण के लिए, जब ब्रिटेन और फ्रांस, शुरू में सर्बों के प्रति सहानुभूति रखते थे, वहीं जब अमेरिका ने बोसनिक्स के पक्ष में फैसला किया, तो उन्होंने तेजी से अपना रुख बदल लिया.

इसी तरह, 2003 के इराक पर हमले के बारे में निजी आरक्षण के बावजूद, अधिकांश पश्चिम ने अमेरिका का साथ दिया. जो भी विरोध हुआ वह अंतरराष्ट्रीय कानून के अपमानजनक उल्लंघन के बावजूद बहुत कम मुखर रहा.


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किसी कानून का उल्लंघन नहीं

यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत ने जो किया है वह पूरी तरह से संवैधानिक है. यह किसी घरेलू कानून का उल्लंघन नहीं है और न ही यह किसी अंतरराष्ट्रीय संधि के दायित्व का. इसका मतलब है कि इसका इतना विरोध नहीं होगा. ध्यान दें कि कैसे अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, आस्ट्रेलिया और इज़रायल सभी ने (भारत सरकार की ब्रीफिंग के आधार पर) अपने नागरिकों को कश्मीर छोड़ने की सलाह जारी की. स्पष्ट रूप से, वे जानते थे कि क्या होने वाला है पर इसके बारे में किसी ने कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया.

यदि कोई आपके कार्यों का विरोध करता है, तो निश्चित रूप से वे उन कार्यों को लीक कर देते हैं. यह तब हुआ जब क्रोधित बिल क्लिंटन ने अटल बिहारी वाजपेयी के गोपनीय पत्र को लीक कर दिया, जिसमें 1998 के परमाणु परीक्षणों के पीछे मुख्य प्रेरणा के रूप में चीन का हवाला दिया गया था. कुल मिलकर, यह इशारा करता है कि पश्चिम – या कम से कम एंग्लोस्फियर – भारत की योजनाओं के साथ है. इसके अलावा, 1998 की तुलना में भारत के साथ अमेरिकी व्यापार अब काफी अधिक है.

क्या अफगानिस्तान से सुरक्षित वापसी के लिए अमेरिका को पाकिस्तान की जरूरत है? हां, लेकिन समस्या यह है कि उक्त वापसी की शर्तों के बारे में इमरान खान और ट्रम्प ने पहले ही बातचीत कर ली थीं. अगर इस दौरान कश्मीर को बीच में लाया गया तो ये ट्रम्प का शर्तों से छेड़छाड़ के तौर पर देखा जायेगा और परिणाम अच्छे नहीं होंगे. संक्षेप में, यदि पाकिस्तान को लगता है कि वह अमेरिका के साथ कश्मीर बनाम अफगानिस्तान कार्ड खेल सकता है, तो काम बिगड़ सकता है.

सब चलेंगे अमरीका की राह

इसका मतलब यह भी है कि जर्मनी और अन्य यूरोपीय देश भी अनमने मन से इसी श्रेणी में शामिल हो जायेंगे. उन सभी देशों के पास निपटने के लिए और भी बड़े मुद्दे हैं. और ब्रिटेन, जो कि अपनी विशाल पाकिस्तानी प्रवासी आबादी के कारण एक चिंता का विषय था, अभी ब्रेक्सिट में उलझा हुआ है. ब्रिटेन जो कि यूरोप में साझेदारी की तलाश कर रहा है, अगर अभी कश्मीर पर ध्यान देगा तो उसके मतदाता नाराज़ हो सकते हैं. यद्यपि हम पाकिस्तानी मूल के सांसदों और संभवतः जेरेमी कॉर्बिन से कुछ विरोध की उम्मीद कर सकते हैं, पर यह आधिकारिक ब्रिटिश नीति में नहीं बदल पायेगा.

फ्रांस इस मायने में अलग है क्योंकि उसने ज्यादातर स्वतंत्र नीति अपनाई है. राफेल वार्ता के दौरान भी फ्रांस ने मांग किये जाने पर पर वीटो प्रदान करने की अपनी इच्छा का संकेत दिया. यह भारत को दी जाने वाली कई रियायतों में से एक था (जिसमें एनपीटी का एक प्रथमदृष्टया उल्लंघन भी शामिल है) यह दिखाने के लिए कि भारत विशेष है. इसके अलावा, फ्रांस ने 1998 के परमाणु परीक्षणों के दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की सेना का नेतृत्व किया.

भारत-फ्रांस के संबंध गाढे़ हैं और फ्रांस, ऐसे प्रांतों पर कुछ भी खतरे में नहीं डालेगा, जिसके बारे में 99 प्रतिशत फ्रांसीसी लोगों ने कभी सुना भी नहीं है, खासकर जब इस तरह की आलोचना राफेल की स्वायत्तता पर कुछ खतरा डालेगी.


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कहां से आ सकती है समस्या?

समस्या तीन स्थानों से उत्पन्न हो सकती है: यूरोपीय संघ, रूस और चीन. यहां फिर से, यूरोपीय संघ को सुरक्षित रूप से नजरअंदाज किया जा सकता है क्योंकि भारत के साथ यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के द्विपक्षीय व्यापार हित इतने अच्छे हैं कि वे इस पर यूरोपीय संघ की नीति को खतरे में नहीं डाल सकते. यूरोपीय संघ के किसी भी विरोध को विशुद्ध रूप से सतही तौर पर देखा जाना चाहिए.

इसी तरह, चीन विरोध कर सकता है, लेकिन इससे चीन द्वारा तिब्बत और शिनजियांग में किये गए कार्यों की तुलना हो सकती है जो की भारत द्वारा उठाये गए किसी भी कदम से कहीं बुरा है.

रूस की बात की जाए तो, भारत के पूर्व राजदूत व्याचेस्लाव ट्रूबनिकोव का बयान सबके सामने है, ‘अफगानिस्तान का समाधान कश्मीर के माध्यम से है.’ वृद्ध ट्रूबनिकोव को पुतिन के खास अफगानिस्तान के ज़मीर काबुलोव के खास के तौर पर देखा जाता है. वहीं काबुलोव को भारत में इस्लामिक स्टेट के करीबी के तौर पर माना गया है. हाल ही में रूस के साथ बड़े हथियारों के सौदे को देखते हुए, यह बहुत कम संभावना है कि पुतिन काबुलोव को कश्मीर नीति का मार्गदर्शन करने की अनुमति देंगे. और रूस का रुख भी ये रहेगा कि कश्मीर भारत की समस्या है और हमें इसमें नहीं पड़ना चाहिए.

विदेशी मीडिया की ओर से ज़रूर कड़ी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं पर जहां तक सरकारों की बात है, हमें ज्यादातर चुप्पी या शांत समर्थन देखने को मिलेगा.

(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ पीस एंड कंफ्लिक्ट स्टडीज़ में वरिष्ठ अध्येता हैं. वह @iyervval से ट्वीट करते हैं. यहां प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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