भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच हाल ही में हुए शिखर सम्मेलन में जिस मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर सहमति बनी है, वह सिर्फ कारोबार से जुड़ी एक उपलब्धि नहीं है. यह वैश्विक शासन (ग्लोबल गवर्नेंस) में एक बदलाव का संकेत देता है, जहां दो बड़े बहुदलीय लोकतंत्र टकराव के बजाय सहयोग का रास्ता चुन रहे हैं और एकतरफा फैसलों के बजाय कानून के शासन को तरजीह दे रहे हैं. नेताओं ने इस समझौते को एक परिवर्तनकारी समझौता बताया है, जो बाज़ार खोलेगा और बाधाएं कम करेगा, लेकिन इस समझौते की असली अहमियत उस साझा शासन के ढांचे में है, जिसे यह स्थापित करना चाहता है.
इस समझौते का सबसे साफ असर व्यापार उदारीकरण के रूप में दिखेगा, लेकिन इसका ढांचा सिर्फ टैरिफ तक सीमित नहीं है. इसमें नियमों से जुड़े अध्यायों और उन्हें लागू करने वाली प्रक्रियाओं को आपस में जोड़ा गया है, ताकि कारोबार के लिए अनिश्चितता कम हो और श्रम, पर्यावरण और उद्योग मानकों को लेकर साझा समझ बन सके. आज के दौर में यह इसलिए ज़रूरी है क्योंकि व्यापार अब सिर्फ सस्ता सामान भेजने तक सीमित नहीं है, बल्कि भरोसे पर टिका है जैसे टिकाऊ विकास, मानकों की जांच और कंपनियों की जवाबदेही से जुड़े स्पष्ट और भरोसेमंद नियम, जो लंबे समय के निवेश फैसलों को प्रभावित करते हैं. भारत-ईयू समझौता नियमों के तालमेल पर ज़ोर देकर €27 ट्रिलियन के मार्केट में कारोबारी रिश्तों को नया रूप देने का वादा करता है.
बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक ढांचा
संयुक्त शासन का एक बड़ा क्षेत्र जलवायु है. यूरोप का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म दुनिया भर के निर्यातकों के लिए चिंता का कारण रहा है. भारत के साथ बातचीत में ईयू ने बदलाव के दौर और सहयोग को लेकर खास प्रतिबद्धताएं दी हैं, ताकि अचानक व्यापार में रुकावट न आए. यह एक नई सच्चाई को दिखाता है, विकसित देश अब महंगे जलवायु नियम थोपने के बजाय, उन्हें क्षमता निर्माण और बदलाव की समय-सीमा के साथ जोड़ेंगे. यह तरीका महत्वाकांक्षी भी है और न्यायसंगत भी और दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के लिए मिसाल बन सकता है.
डिजिटल शासन एक और ऐसा क्षेत्र है जहां साझा नियमों का असर बहुत बड़ा होगा. ट्रेड एंड टेक्नोलॉजी काउंसिल और भारत-ईयू संवाद पहले से ही डेटा के फ्लो, आपसी तालमेल, सेमीकंडक्टर और साइबर सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं. डेटा सुरक्षा, एल्गोरिदम की पारदर्शिता और सीमा-पार डेटा प्रवाह पर एक जैसे नियम बनाने से मिलकर नवाचार करना आसान होगा और गोपनीयता व सुरक्षा भी बनी रहेगी. आसान शब्दों में कहें तो साझा डिजिटल मानक क्लाउड कंप्यूटिंग, फिनटेक और हेल्थटेक कंपनियों के लिए रास्ता साफ करेंगे और सेमीकंडक्टर फैक्ट्रियों से लेकर एआई रिसर्च लैब तक, सीमा-पार अनुसंधान और विकास को संभव बनाएंगे.
सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग भी अब इस शासन ढांचे का हिस्सा बन चुका है. हालिया शिखर सम्मेलन में रक्षा संवाद को और गहरा किया गया, जिसमें समुद्री सुरक्षा, अहम तकनीकी सप्लाई चेन और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की मजबूती पर ध्यान दिया गया. जब आर्थिक समझौते सुरक्षा साझेदारी से जुड़ते हैं, तो सरकारें भू-राजनीतिक तनाव को संस्थागत सहयोग के जरिए संभालने के लिए प्रेरित होती हैं जैसे संयुक्त सैन्य अभ्यास, साझा समुद्री निगरानी और रक्षा उद्योग से जुड़े अनौपचारिक संवाद. इससे व्यापारिक तनाव के रणनीतिक टकराव में बदलने की आशंका कम होती है.
तकनीक और मानकों पर सहयोग तय करेगा कि अगली औद्योगिक क्रांति के नियम कौन बनाएगा. चाहे बात ग्रीन हाइड्रोजन के प्रमाणन की हो, इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियों की हो या सेमीकंडक्टर की खरीद की — भारत-ईयू मंच ऐसे नियम मिलकर बनाने की कोशिश करता है, ताकि कोई एक देश या समूह अपने नियम अकेले न थोप सके.
भारतीय उद्योग के लिए यह सप्लायर की भूमिका से बाहर निकलकर मानक तय करने वाले साझेदार बनने का मौका देता है — यानी अलग-अलग नियमों के हिसाब से ढलने के बजाय, उन्हें बनाने में भागीदारी. इससे वैश्विक वैल्यू चेन के ज्यादा मूल्य वाले हिस्सों में प्रवेश का रास्ता खुलता है. वहीं यूरोप के लिए यह सप्लाई चेन को विविध बनाने और बाजार में डी-कार्बनाइजेशन तकनीकों की विश्वसनीयता बढ़ाने का जरिया है.
साझा शासन वित्त और सार्वजनिक हितों पर भी लागू होता है. इस समझौते और इसके साथ आई रणनीतिक रूपरेखा में टिकाऊ वित्त, रियायती मिश्रित फंडिंग और संयुक्त निवेश माध्यमों पर सहयोग की बात कही गई है, जिससे भारत और उसके आसपास के क्षेत्रों में कम-कार्बन औद्योगीकरण को समर्थन मिल सके. नियमों के असर और विकास वित्त को साथ जोड़कर भारत और ईयू जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचे के लिए फंडिंग की कमी को पाट सकते हैं और ऐसे सीमा-पार निवेश ढांचे बना सकते हैं, जो टिकाऊपन और विकास — दोनों ज़रूरतों को पूरा करें. यह ऐसा शासन है, जो पूंजी, मानकों और नीतिगत प्रोत्साहनों को बड़े पैमाने पर जोड़ता है.
नैतिक और सिद्धांत के स्तर पर यह समझौता बहुध्रुवीय बहुपक्षवाद को दोहराता है. ऐसे समय में जब वैश्विक संस्थाएं दबाव में हैं और नियमों पर विवाद है, भारत और ईयू यह दिखा रहे हैं कि समान सोच वाले बड़े साझेदार ऐसे नियम बना सकते हैं, जो राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग — दोनों में संतुलन रखें. उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह तरीका मजबूरी के दो विकल्पों के बजाय एक तीसरा रास्ता देता है, वे नियम-आधारित व्यवस्था का हिस्सा बन सकती हैं, जिसमें बदलाव के लिए मदद, तकनीक हस्तांतरण और क्षमता निर्माण शामिल हो, न कि एकतरफा मार्केट से बाहर कर दिया जाना. इस तरह साझा शासन, मानकों के साथ-साथ समावेशी कूटनीति भी बन जाता है.
एक व्यावहारिक खाका
अब भी कुछ व्यावहारिक चुनौतियां बाकी हैं — कानूनी समीक्षा, ईयू देशों में मंजूरी और अलग-अलग घरेलू समूहों के हितों में तालमेल बैठाना. लेकिन यह समझौता एक सकारात्मक संस्थागत रास्ता तय करता है. अगर इसे सही ढंग से लागू किया गया, तो यह सिर्फ व्यापार नहीं बढ़ाएगा, बल्कि जटिल वैश्विक चुनौतियों को नियम-आधारित सहयोग, आपसी समायोजन और साझा क्षमता निर्माण के जरिए संभालने की एक शैली को मजबूत करेगा. यही इसकी असली उपलब्धि है — ऐसा शासन ढांचा, जो बहुध्रुवीय और तकनीक-आधारित सदी के लिए उपयुक्त है.
आखिर में, भारत-ईयू साझेदारी एक बड़ी सच्चाई को सामने रखती है: आज के तेज़ तकनीकी बदलाव और जलवायु दबावों वाले दौर में, संप्रभुता का मतलब अकेले काम करना नहीं है. इसका मतलब है नियमों को मिलकर गढ़ना और उन्हें निभाने की क्षमता मिलकर बनाना. महत्वाकांक्षी और सहयोग की भावना से भरा भारत-ईयू समझौता एक व्यावहारिक खाका पेश करता है — दूसरे देशों के लिए भी यह न्योता है कि वे सिर्फ़ लेन-देन वाले रिश्तों से आगे बढ़कर ऐसे साझा शासन की ओर जाएं, जो टिकाऊ, न्यायपूर्ण और भविष्य की ओर देखने वाला हो. यह व्यापार समझौता टकराव, संकट और प्रतिस्पर्धा की जगह शांति, समृद्धि और साझेदारी का उदाहरण बने.
मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: भारत दावोस जैसी बातचीत के लिए तैयार है, वैश्विक शासन को एक नए मेज़बान की ज़रूरत है
