Sunday, 26 June, 2022
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भारत ने देशद्रोह कानून पर खूब बहस की लेकिन बिना न्याय व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव के यह नहीं जाएगा

निवारक नज़रबंदी का चलन जारी है क्योंकि भारत में पुलिस की जांच प्रक्रिया में बहुत बदलाव नहीं किया गया, और न ही मुकदमा चलाने वालों में उतना कानूनी कौशल है.

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सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से 11 मई को जो आश्वासन दिया उसका न केवल मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमन्ना ने बल्कि तमाम अखबारों के संपादकीय और स्तंभों में भी स्वागत किया गया. मेहता ने कहा, ‘देश जब आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, एक राष्ट्र के रूप में हमें औपनिवेशिक काल की उन चीजों से मुक्त होने की कोशिश करनी चाहिए जिनकी उपयोगिता खत्म हो चुकी है. इनमें वे उपनिवेशवादी कानून और प्रथाएं भी शामिल हैं. इसी भावना के तहत भारत सरकार ने 2014-15 के बाद से अप्रासंगिक हो चुके 1500 से ज्यादा पुराने क़ानूनों को खत्म कर दिया है… देशद्रोह के विषय पर जो तमाम विचार रखे जा रहे हैं उनका भारत सरकार ने पूरा संज्ञान लिया है और उसने नागरिक तथा मानव अधिकारों से संबंधित सरोकारों पर भी विचार किया है. इसके साथ ही इस महान राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहते हुए उसने भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की धारा 124-ए के प्रावधानों की जांच करने और उन पर विचार करने का फैसला किया है, जो सक्षम मंच पर ही किया जा सकता है.’

लेकिन कई लोग इसके विपरीत तथ्यों की ओर इशारा करते हैं— जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक, हर एक की सरकार संविधान में दर्ज मौलिक अधिकारों की जबानी तरफदारी तो करती रही लेकिन निवारक नज़रबंदी (पीडी) और देशद्रोह संबंधी कानून को शासन प्रणाली में बनाए रखने की पूरी व्यवस्था भी करती रही. यह सच है कि संविधानसभा की बहस में ‘पीडी’ और देशद्रोह कानून को स्वतंत्रता आंदोलन का विरोध माना गया था. के.एम. मुंशी ने कहा था कि ‘सच्ची बात तो यह है कि सरकार की आलोचना लोकतंत्र का सार है.’ भूपिंदर सिंह मान के प्रयासों और निरंतर ज़ोर देते रहने के कारण ही ‘देशद्रोह’ शब्द को संविधान से निकाल दिया गया.

ऐसे क्रूर प्रावधानों की जरूरत इसलिए है कि गृह मंत्रालय ने सीबीआइ और एनआइए जैसी विशेष एजेंसियों के सिवा पुलिस और फोरेंसिक लैब्स की जांच करने की क्षमता और हमारे अभियोक्ताओं की कानूनी कौशल को बढ़ाने पर समय और संसाधन नहीं खर्च किए. सरदार वल्लभभाई पटेल ने संविधान लागू होने के एक महीने के अंदर, 25 फरवरी 1950 को जो आपराधिक न्याय व्यवस्था, पीडी के अस्थायी प्रावधान और धारा 124-ए लागू किए उनके पूरे दायरे पर जब तक हम समग्र दृष्टि नहीं डालते तब तक वे कानून बने रहेंगे.

पटेल ने क्या कहा था

हम जरा उस भावना और तर्क पर गौर करें जिसके तहत देश में पहला ‘पीडी’ कानून लागू किया गया. जहां तक भावना की बात है, तो सरदार पटेल ने संसद को बताया था कि इस विधेयक को लेकर वे दो रात सो नहीं पाए, लेकिन उन्होंने इस विधेयक को लाने का तर्क भी प्रस्तुत किया. उन्होंने कहा कि बंटवारे के नतीजों और हैदराबाद में हथियारबंद बगावत (1946-51) के कारण इन प्रावधानों की जरूरत आ पड़ी जिनका 1919 में ब्रिटिश शासन के रोलेट एक्ट में दर्ज किए जाने पर ‘न वकील, न दलील, न अपील’ के नारे के साथ जबरदस्त विरोध किया गया था.

लेकिन पटेल ने यह उम्मीद भी जाहिर की थी कि निवारक नज़रबंदी अधिनियम 1950 बिलकुल अस्थायी व्यवस्था है. पटेल जल्दी ही गलत साबित किए गए. इस अधिनियम से कुख्यात ‘मीसा’ अधिनियम 1971 और फिर 1980 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के राज में ‘रासुका’ 1980 का जन्म हुआ. इस बात की कम ही चर्चा होती है कि 1977 में जब शांति भूषण कानून मंत्री थे तब दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) में संशोधन करके जिला मजिस्ट्रेटों और पुलिस कमिश्नरों को निवारक नज़रबंदी करने के अधिकार दिए गए. यानी गुलामी के दौर से लेकर आज़ाद भारत में आज तक केंद्र की हर सरकार ने इन प्रावधानों को कायम रखा.

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देशद्रोह पर नेहरू का रुख

सरदार पटेल ने जब पीडी विधेयक पर संसद में बयान दिया, उसके 14 महीने बाद 12 मई 1951 को नेहरू ने संविधान का पहला संशोधन पेश किया. भावना और तर्क के बीच एक बार फिर द्वंद्व सामने आया. नेहरू ने कहा, ‘अब जहां तक मेरी बात है, मैं आइपीसी के उस खास धारा 124-ए को बेहद आपत्तिजनक और निंदनीय मानता हूं, और आप चाहें तो हम जो भी कानून पास करें उसमें व्यावहारिक और ऐतिहासिक नजरिए से इस धारा के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए. हम इससे जितनी जल्दी छुटकारा पा लें उतना बेहतर.’

लेकिन उनकी सरकार ने न केवल आइपीसी की धारा 124-ए को बहाल किया बल्कि उसे मजबूत बनाने के लिए उसमें दो बातें और जोड़ दी कि ‘दूसरे देश के साथ मैत्री’ और ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ की खातिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ‘उचित प्रतिबंध’ लगाए जा सकते हैं. पहली शर्त श्यामा प्रसाद मुखर्जी की वजह से लगाई गई क्योंकि वे बंटवारे को रद्द करने की मांग कर रहे थे (पाकिस्तान के साथ मैत्री का मामला). दूसरी शर्त तेलंगाना विद्रोह के दौरान हैदराबाद में कम्युनिस्टों की वजह से जोड़ी गई. यही नहीं, पहले संशोधन के कारण नौवीं अनुसूची बनी, जिसे कानूनदां उपेंद्र बक्षी ने ‘संवैधानिक छलांग’ कहा, क्योंकि इसमें ऐसे कानून दर्ज थे जिन्हें अदालतों में चुनौती नहीं दी जा सकती और न न्यायपालिका उनकी समीक्षा कर सकती है.


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धारा 124-ए को कानूनी चुनौती

गौरतलब है कि 1950 में ही सुप्रीम कोर्ट ने ‘रमेश थापर बनाम मद्रास राज्य’ मामले में फैसला दिया था कि ‘सरकार की आलोचना से उसके खिलाफ असंतोष या बुरी भावना पैदा होती है तो उसे अभिव्यक्ति की आज़ादी और प्रेस पर प्रतिबंध लगाने का आधार नहीं बनाया जा सकता, जब तक कि उसके कारण राज्यसत्ता की सुरक्षा खतरे में न पड़ती ही और उसका तख़्ता पलटने का न खतरा न पैदा होता हो.’ उस समय मुख्य न्यायाधीश एम. पतंजलि शास्त्री ने कानून की उदारवादी व्याख्या करने के उद्देश्य से संविधानसभा द्वारा संविधान से ‘देशद्रोह’ शब्द को जानबूझकर हटाने के फैसले का जिक्र किया था.

इसके बाद 1951 में पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने और 1959 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धारा 124-ए को असंवैधानिक घोषित कर दिया था. लेकिन 1962 में पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने देशद्रोह पर केदारनाथ के आदेश में हाईकोर्टों के फैसलों को पलट दिया और उस कानून को संवैधानिक रूप से वैध ठहरा दिया. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार की आलोचना में जब तक हिंसा के लिए उकसाया नहीं जाता या आह्वान नहीं किया जाता तब तक उसे ‘देशद्रोह’ नहीं कहा जा सकता. भारतीय विधि आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने भी बाद में अपनी कई रिपोर्टों में इस देशद्रोह कानून के बेहिसाब दुरुपयोग की बात दर्ज की है. केदारनाथ दिशा-निर्देशों और कानून के अलग तरह के पाठ ने यह ज़िम्मेदारी पुलिस पर छोड़ दी कि वह उचित भाषण और देशद्रोही भाषण में फर्क करके मामले दर्ज करे.

फिलहाल स्थिति यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से कहा है कि वे धारा 124-ए के तहत दायर सभी लंबित मुकदमों, अपीलों और कार्रवाइयों को तब तक स्थगित रखें जब तक केंद्र सरकार उन प्रावधानों पर पुनर्विचार करने और उनकी समीक्षा करने का अपना वादा पूरा नहीं करती, जिन प्रावधानों को ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, इन्डोनेशिया, न्यूजीलैंड जैसे कई देशों ने पहले है असंवैधानिक घोषित कर रखा है.

संजीव चोपड़ा इतिहासकार और वैली ऑफ वर्ड्स के फेस्टिवल डायरेक्टर हैं. हाल तक वे लाल बहादुर शास्त्री नेशनल एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन के डायरेक्टर थे. उनका ट्विटर हैंडल है @ChopraSanjeev . यहां व्यक्त विचार निजी हैं.

यह लेख ‘देश की दशा-दिशा’ श्रृंखला का भाग है, जिसमें भारत में नीति, प्रशासकीय सेवा और गवर्नेंस की समीक्षा की जाती है.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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