imran khan
इमरान खान का चित्र । फेसबुक
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खान ने ऐसे समय पर अपना बयान दिया है जब पाकिस्तान में नारीवाद आंदोलन काफी जोरों पर है और साथ ही समाज के एक तबके (राइट-विंग्स) द्वारा इसका मजाक भी उड़ाया जा रहा है।

मीडिया साक्षात्कार में विवादास्पद बयानबाजी के मामले में इमरान खान कोई अजनबी नहीं हैं। उदारवादियों  को ‘खून का प्यासा’ का शीर्षक देने से लेकर पाकिस्तान सुपर लीग टी 20 में खेलने आ रहे अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों को “रेलु कट्टा (क्रिकेट की दुनिया के आम आदमी)” कहकर संबोधित करने तक की उनकी बयानबाजियाँ अगले समाचारों के लिए एक चारा हैं।

तो अब खान साहब ने तथाकथित “खून के प्यासे उदारवादी” की एक उपशाखा नारीवाद को लक्षित करने का फैसला लिया है।

एक समाचार चैनल को हाल ही में दिए गए एक साक्षात्कार में इमरान खान ने कहा कि, “पश्चिमी नारीवाद ने माँ की भूमिका को कम कर दिया है।“

मेरी जैसी ही कई महिला पत्रकारों ने नारीवाद पर उनके विवादास्पद बयान का जवाब देने के लिए ट्विटर का इस्तेमाल किया। इमरान खान का राग अलापने वाली भीड़, जो अक्सर उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के साथ होती है, हमें पश्चिमी एजेंडे के साथ कायर नारीवाद कहते हुए इमरान के बचाव में मैदान में कूद पड़ी और कहने लगी कि नारीवाद वास्तव में मातृत्व की भूमिका को बर्बाद कर देता है।

एक उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि, अगर एक माँ काम करने जाती है तो किस प्रकार बच्चे को नजरअंदाज कर दिया जाता है, अपनी बात में उन्होंने आसानी से इस तथ्य को अनदेखा कर दिया कि चार साल की उम्र के बाद बच्चा बड़ा होता है, स्कूल जाता है और अंत में एक स्वतंत्र मनुष्य बन जाता है। उनके हिसाब से, हम सभी बुरे नारीवादी जींस पहन कर सब उथल पुथल करना चाहते हैं और खराब व्यवहार वाले बच्चों को जन्म देकर बड़ा करना चाहते हैं क्योंकि हम लोग अपनी डिग्रियों का इस्तेमाल उसी काम के लिए करना चाहते हैं जिसके लिए हमने वह प्राप्त की हैं।

मेरे जैसे बुरे नारीवादी ऑनर किलिंग, यौन उत्पीड़न और कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर चुके हैं। इसके साथ ही चलो इस बात को छोड़ देते हैं कि कैसे नारीवादियों ने अपमान की परवाह न करते हुए बच्चों को स्तनपान कराने वाली महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया, अब बात यह आती है कि पुरूषों को बेहतर पिता बनना चाहिए, दूर या अनुपस्थित इंसान की तरह नहीं बर्ताव करना चाहिए जो अंत में  बच्चे की परवरिश पर कोई प्रभाव नहीं डालता है।

आइये इस बारे में बात करते हैं कि खान की टिप्पणी उस वक्त कैसे आई है जब पाकिस्तान में नारीवाद आंदोलन उफान पर है और साथ ही साथ समाज का एक तबका (राइट-विंग्स) इसका मजाक उड़ा रहा है।

हाल ही में, महिलाओं के अधिकारों  ‘औरत मार्च’ से एक बहुत ही लोकप्रिय नारा ‘खाना खुद गरम कर लो’ निकल के सामने आया, इस नारे ने मीम्स, सोशल मीडिया झगड़े और एक टेलीविजन ईद फिल्म को प्रेरित किया। पाकिस्तान के कई अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने खुलकर नारीवाद शब्द की निंदा की और अब प्रशंसा की तुलना में यह शब्द और अधिक अपमानजनक हो गया है। खान की तरह अधिकांश लोगों ने अपनी अनौपचारिक राय देने से पहले इस शब्द और इसके इतिहास के बारे में बहुत ही कम जानकारी एकत्र की है।

अगर आप मानते हैं कि महिलाएं पुरूषों के समान अधिकारों की हकदार हैं, वे पुरूषों के समान अवसरों की हकदार हैं, सम्मान के नाम पर उनकी हत्या नहीं की जानी चाहिए, उनके साथ दुर्व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए, प्रपोजल स्वीकार न करने पर गोली नहीं मारी जानी चाहिए या तेजाब से हमला नहीं किया जाना चाहिए, दिन के उजाले में 27 बार चाकू नहीं मारा जाना चाहिए या उनका यौन उत्पीड़न नहीं किया जाना चाहिए  – तो आप एक नारीवादी हैं।

खान के बयान के जवाब में कई अनुचित बयानों का जवाब देने से स्वयं को  रोकना बहुत मुश्किल है। लेकिन यह बहुत ही महत्वपूर्ण है कि नारीवाद को लेकर खान के मुश्किल से 10 शब्दों के बयान में कितना जहर भरा हुआ है।

सवाल यह है कि क्या खान यह सोचते हैं कि पश्चिमी नारीवाद ने मातृत्व की भूमिका को कम कर दिया है भले ही पश्चिम में महिलाओं के अधिकारों के लिए आंदोलन हुए हैं जो महिलाओं को विश्वविद्यालयों में शिक्षा का अधिकार, मतदान का अधिकार, प्रसव के लिए छुट्टी, यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने और बराबर वेतन भुगतान के लिए संघर्ष (लड़ाई) करने का अधिकार देते हैं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह वही नारीवाद है जो कई महिलाओं को बहस करने की इजाजत देता है कि उनकी वर्तमान पत्नी, बुशरा मेनका को उनकी पोशाक के लिए निशाना नहीं बनाया जाता है, क्योंकि वह उसकी पसंद है। एक महिला की पसंद का सम्मान करना वही है जो “नारीवाद की पश्चिमी अवधारणा” महिलाओं को सिखा रही है।

या क्या खान वास्तव में विश्वास करते हैं कि जो महिलाएं काम करती हैं उन्हें घर पर रहकर पूर्णकालिक रूप से अपने बच्चों का पालन पोषण करने का फैसला लेने वाली महिलाओं की तुलना में कम समझा जाता हैं।

और कई महिलाओं के लिए, विशेष रूप से दुनिया के हमारे हिस्से में यह एक विकल्प नहीं है लेकिन सामाजिक मानदंडों का एक पैटर्न है जहां वे इस बिंदु पर वंचित हैं कि उनके पास अध्ययन और काम करने के लिए पर्याप्त शिक्षा या स्वतंत्रता नहीं है। कई महिलाएं घर पर रहती हैं और बच्चों का पालन पोषण करती हैं क्योंकि यही वही है जो उन्हें करने के लिए चुना गया है। इस तरह से उन्हें अपनी महत्वाकांक्षाओं को ढालने के लिए कहा जाता है: कि गोल रोटियां और गोरी त्वचा बनाओ।

क्या खान हर मध्यम वर्गीय महिला का संघर्ष नहीं जानते, चाहे वो खेत में गेहूँ फटकना या कॉरपोरेट जंगल में जूझना हो, या समान वेतन के लिए लड़ाई हो। या फिर वह शायद लाखों महिलाओं के संघर्ष को नज़रंदाज कर देते हैं जो काम और घर को संतुलित करने की कोशिश कर रही हैं, ऐसा नहीं है कि उन्हें बहुत ज्यादा काम करना, समय सीमा पर काम को पूरा करने की कोशिश करना और बच्चे के डायपर को साफ करना पसंद हैं, ऐसा इसलिए है क्योंकि पितृसत्ता ने महिलाओं को एक करियर और घर के बीच आसानी से चयन करने में सहायता नहीं की है। अपराधी यहाँ नारीवाद नहीं है, श्रीमान खान, यहाँ अपराधी पितृसत्ता है।

आम चुनाव 2018 की बंपर योजना में खान का यह अनजान वेतुका बयान महत्वपूर्ण और आलोचनात्मक है। उनके पास अनुयायी, मतदाता, सहानुभूतिकर्ता और क्षमाकर्ता हैं जो उनके शब्दों को भविष्य के भाषण के लिए संदर्भ बिंदु के रूप में ले लेंगे।

कहा जाता है कि खान की पार्टी पीएमएल (एन), जिसने आखिरी चुनाव जीता था, को हराने के लिए जी जान से लड़ रही है। जबकि पीटीआई का वोट बैंक समाज के शहरी, शिक्षित, जानकार आदि अनुभागों से होते हैं, नारीवादियों के खिलाफ किए गए उनके विवादित बयान से उनके प्रतिद्वंद्वी को गुप्त मुल्लाशेक मानसिकता के साथ एक उत्सुक अनुनाद मिल सकता है जो पाकिस्तान में कई महिलाओं के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण है।

एक पूर्व क्रिकेटर अपनी कई शादियों, रोमांटिक मेलजोल और तलाक के कई सर्कसों के बावजूद भी नारीवाद से नफरत करने वाले एक रूढ़िवादी व्यक्ति की तरफ़ इशारा करता है।

इस तरह के अनुभव से एक महिला राजनीति में स्पष्ट छवि  के साथ नहीं  लड़ सकती। उसके विवाह, रोमांटिक लिंकअप और उसके तलाक का इस्तेमाल उसके खिलाफ एक बयान के रूप में किया जा सकता है, कि वह वास्तव में कितनी अनैतिक है, और कैसे उसे चुनावी मैदान में अपना दमखम आजमाने के बजाय घर पर बैठकर एक योग्य वर के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। खान को इस प्रणाली से फायदा होता है, यह प्रणाली पितृसत्तात्मक पुरूषों को उससे भी ज्यादा दूर तक जाने की अनुमति देती जहाँ तक महिलाओं को जाने की अनुमति है।

क्या यह एक छोटा सा आश्चर्य है कि वह नारीवादियों से नफरत करते हैं?

लेखिका पाकिस्तान में एक उदारवादी, नारीवादी पत्रकार, यूट्यूबर, एक आदर्श माँ और बिरयानी मास्टर (बिरयानी बनाने में माहिर) है। इनका ट्विटर हैंडिल @mahwashajaz_है।

Read in English : Imran Khan hates feminism because he wants women to just make gol rotis & have gori skin

 

 


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