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Monday, 22 July, 2024
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प्रणब को आरएसएस से क्या मिला पता नहीं, किंतु मुझे दो बड़े फायदे हुए

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प्रणब मुखर्जी का नपा-तुला कदाचार मुझे आरएसएस द्वारा की गयी दोहरी तरफ़दारी, जिसे मेरे माता-पिता ने साभार स्वीकार किया था, का खुलासा करने के लिए सही बहाना या समाचार आधार देता है|

प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) मुख्यालय में भाषण देने के लिए आरएसएस के निमंत्रण को स्वीकार करते हुए आसानी से वो सुर्खियाँ बनायीं जो अभी तक किसी भी पूर्व राष्ट्रपति ने नहीं बनायीं हैं|

कम से कम उनके पास आरएसएस के निमंत्रण के लिए हाँ या ना कहने के विकल्प तो था या और ज्यादा प्रतिबद्ध सेक्युलर शब्दों में कहें तो, “अस्पृश्य” को छूने का विकल्प था| यदि कोई विकल्प नहीं होता तो कोई व्यक्ति क्या करता?

जैसे मैंने नहीं किया, पांच साल की उम्र में? ठीक है ठीक है, ये कुछ समय पहले की बात है, 1962 की|

प्रणब दा का नपा-तुला ‘अपराध’ मुझे आरएसएस द्वारा की गयी दोहरी तरफ़दारी, जिसे मेरे माता-पिता ने साभार स्वीकार किया था, का खुलासा करने के लिए और 50 साल पहले (आप अपने झुकाव के आधार पर अपनी पसंद का चयन कर सकते हैं) एक तथ्य को झुठलाने को देरी से स्वीकार करने के लिए सही बहाना या समाचार आधार देता है| मेरे पास पांचवीं कक्षा की 1962-63 में खींची गयी मेरी एक धुंधली गुप फोटो है| विद्यालय था सरस्वती शिशु मंदिर, जो सीनियर विद्यार्थियों के लिए विद्या मंदिरों के साथ साथ आरएसएस द्वारा पूरे देश में चलाये जाने वाले जूनियर स्कूलों की एक श्रृंखला का हिस्सा है|

मैं आपको आरएसएस द्वारा मेरे लिए की गयी दो तरफदारियां बताता हूँ: पहला किस्सा हरियाणा में पलवल नामक एक छोटे से शहर से है (यह ग्रैंड ट्रंक रोड पर दिल्ली से आगरा के रास्ते पर लगभग 60 किमी की दूरी पर है), जो 1962-63 में एक दूरस्थ सिनेमा हॉल (हमने वहां दोस्ती, हकीकत और संगम फिल्म देखी थी) वाला एक बड़ा गाँव था|

यह जगह इतनी छोटी थी कि हमारे घर आने वाले किसी आगंतुक के लिए एक बड़ा पीपल का पेड़ एक लैंडमार्क हो सकता था| मेरे पिता, जिन्होंने पंजाब सरकार की सहकारी समितियों में काम किया था और पनिशमेंट पोस्टिंग्स के लिए एक सामान्य संदिग्ध व्यक्ति थे, को यहाँ भेजा गया| इस जगह पर बाहरी इलाके में एक मदरसे को छोड़कर किसी भी प्रकार का कोई स्कूल नहीं था और भूतपूर्व पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थियों के लिए स्थापित किये गए अस्थायी शिविरों के बगल में मिशन हॉस्पिटल के कुछ विदेशी डॉक्टरों के अलावा कोई एमबीबीएस डॉक्टर भी उपलब्ध नहीं था|

चूंकि वहां कोई स्कूल नहीं था, इसलिए मेरी माँ और मुझे अपने नाना के साथ दिल्ली में रहना पड़ा था ताकि मैं कम से कम किंडर्गार्डेन में भाग ले सकता| तो, पलवल में एक स्कूल की स्थापना करके, आरएसएस एक परिवार को एक साथ ले आया यानि कि उस समय हम तीनों का हमारा परिवार।

एक शनिवार, सप्ताहांत पर मेरे पिता परिवार को समय देने के लिए दिल्ली आये और खबर लेकर आये कि पलवल में स्कूल खुल चुका है, अतः हम पलवल चले गये| यह सरस्वती शिशु मंदिर था जिसमें पांचवीं तक कक्षाएं संचालित होती थीं| कुछ समय तक के लिए यह पलवल में एकमात्र स्कूल था| तो यह पहला एहसान था जो आरएसएस ने मुझ पर किया था| उस समय इसने मेरे परिवार को मिला दिया था| लेकिन फिर भी पहले एमबीबीएस डॉक्टर ने वहां पहुँचने में दो साल का समय लिया|

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लेखक (दूसरी पंक्ति में सबसे आखिरी में ) जब वह कक्षा पांच में सरस्वती शिशु मंदिर में थे

दूसरा एहसान: उन्होंने कभी भी द्वेष नहीं दिखाया कि मैं, हालाँकि उस समय सिर्फ 5 वर्ष का था, अंग्रेजी माध्यम स्कूल से आया था और एक किंडर्गार्डेन से शुरुआत की थी| बल्कि उन्होंने इसकी सराहना की और मुझे दोहरी प्रोन्नति, कक्षा प्रथम से तृतीय और उसके बाद पंचम, के साथ पुरुस्कृत किया|

इसलिए आरएसएस उन तीन महत्वपूर्ण वर्षों में मेरे लिए न सिर्फ मेरा शिक्षक था बल्कि इसने मेरे अकादमिक जीवन में दो साल भी जोड़े जिससे मुझे कॉलेज से स्नातक होने में तब मदद मिली जब मैं 18 साल का भी नहीं था|

हालाँकि इसने मुझे दोहरी प्रोन्नति दी यह एक कमतर तथ्य है| उनके प्रसिद्द हिंदी-संस्कृत समर्थन और अंग्रेजी विरोधी पूर्वाग्रहों को देखते हुए कान्वेंट स्कूल से हुई मेरी शुरुआत के प्रति इस आश्चर्यजनक स्वागत का बहुत अधिक महत्व था|

यह सबसे मनोहर बात थी| वहां अंग्रेजी के लिए द्वेष और अविश्वास था और इसके लिए अभी भी आदर था| पंजाब के स्कूलों (पलवल तब पंजाब में था और 1966 में राज्य के विभाजन के बाद हरियाणा का हिस्सा बना) ने कक्षा पांच तक अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षरों को पढ़ना शुरू नहीं किया था| फिर भी अंग्रेजी के बुनियादी ज्ञान के लिए एक इनाम दिया जाता था|

हालाँकि हिंदी और संस्कृत के लिए बहुत सारे इनाम थे| स्कूल की प्राथना पवित्र सरस्वती वंदना के साथ होती थी, भले ही पंजाबी उच्चारण के साथ यह छिन्न भिन्न हो जाती| एक पंजाबी या हरियाणवी से ये कहलवाने का प्रयास कीजिये, “ या ब्रह्मच्युत शंकर प्रभृतिभिः देवैः सदा वंदिता….|”

लेकिन हमने कोशिश की और किनारे आकर मुंह दबाकर हँसे क्योंकि हममें से कोई भी इसका पूर्ण अर्थ नहीं जानता था और न ही इसने हमें इसे गंभीरता से लेने के लिए विश्वस्त किया| इसके बाद प्रधानाचार्य जी के प्रवचन अधिक परीक्षा लेने वाले थे| यद्यपि उस नाजुक और अबोध उम्र में ही यह बताया जाना, कि अंडा खाना बुरी बात है क्योंकि यह रज और वीर्य का मिश्रण होता है, कुछ-कुछ कामुकता से संबधित और गन्दा था|

मुझे यकीन नहीं है कि कोई भी इससे विशेष रूप से प्रभावित था। हमने खुद अपने आधे कच्चे आधे पक्के छोटे से घर पे एक दर्जन मुर्गियां और कुछ मुर्गे पालना जारी रखा, हालाँकि सिर्फ अण्डों के लिए न कि मांस के लिए|

शाखा में उपस्थिति अनिवार्य नहीं थी, लेकिन उतेजित करके ये प्राप्त की जाती थी | शाखा हमारे के ठीक सामने पीपल के पेड़ के पास लगती थी इसलिए हम में से कई बस देखने और सुनने के लिए बैठते थे| हम इतने बड़े तो हुए नहीं थे कि हमें खाकी शॉर्ट्स, बेल्ट और छड़ी खरीद कर दी जातीं|

आमतौर पर स्वयंसेवकों को हास्य चित्र के रूप में देखा जाता था  और उनके बारे में दर्जनों चुटकुले हैं जो मैं भूला नहीं हूँ लेकिन वे इतने भी सभ्य नहीं है कि दप्रिंट में प्रिंट किए जा सकें|

शाखाओं में शेर और बकरी के बीच एक नकली लड़ाई होती थी जिसमें हमेशा मुट्ठीभर निडर शेर अनेकों कपटी बकरियों को ख़त्म कर देते थे| आप अनुमान लगा सकता हैं कि कौन सा जानवर हिन्दू और मुस्लिमों की तरफ एक इशारा है| तब खो-खो के अलावा कोई खेल नहीं था जिसका हम लड़कों ने लड़कियों का खेल कहकर तिरस्कार कर दिया था|

उसके बाद आता था सबसे दिलचस्प हिस्सा, कहानियों का, और हम इंतजार करते थे| मुझे कहानियां याद हैं लेकिन सबसे ज्यादा दोहराई जाने वाली कहानी हकीक़त राय के बारे में थी, एक जवान लड़का जिसने मुस्लिम तानाशाह की मांग, कि वह अपनी चोटी कटवाए या यज्ञोपवीत उतार दे, को स्वीकार करने के बजाय अपने शीश का बलिदान देना पसंद किया था| गुरु गोबिंद सिंह और उनके बेटों के बलिदान, लाला लाजपत राय, भगत सिंह तथा सावरकर और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका के बारे में भी कहानियां थीं।

गाँधी-नेहरु और अन्य लोगों को इन कहानियों से बाहर रखा गया था सिवाय यह कहने के कि उन्होंने पटेल के होने के बावजूद भारत का विभाजन होने की अनुमति दी थी| नेहरू को मैकॉले के पसंदीदा बेटे के रूप में गलियां दी जाती थीं| लेकिन उनके उत्तराधिकारी लाल बहादुर शास्त्री को फ़ौरन सहयोजित किया गया था, विशेष रूप से 1965 के युद्ध के साथ| उन्हें एक विनम्र शाकाहारी के रूप में भी पेश किया गया था जो कि एक कायस्थ होने के बावजूद शास्त्री की वरीयता थी|

हमे बताया गया कि “मूंग की दाल खाने वाले शास्त्री जी ने शराबी कबाबी अयूब को मात दी|” संगीत शिक्षक ने एक हास्यजनक सियापा (वह कोलाहलपूर्ण पंजाबी रिवाज जहाँ शोकग्रस्त महिलाएं अपना सीना पीटती हैं, दिवंगत व्यक्ति के लिए स्तुति गाती हैं और शोक प्रकट करती हैं) भी बनाया था| ‘कित्थे गए सीटो –सेंटो, मार गए चीनी यार, हाय मै की कराँ, मेरे टैंक होए बीमार हाय मैं की करां” बोल मेरे दिमाग पर छप गए थे |

सीटो और सेंटो चीनी, जो पाकिस्तान की मदद करने मे विफल रहे और वो  पैटन टैंक भी जो प्रदर्शन नहीं कर पाये, अमेरिका के नेतृत्व वाले रक्षा संधि में पाकिस्तान का सम्मिलित होना मज़ाक उड़ा रहा था |

आरएसएस द्वारा संचालित इस विद्यालय द्वारा हम सब को 1965 की सर्दियों की शुरुआत में एक दिन प्रधानमंत्री से मिलवाने के लिए बस से दिल्ली भी ले जाया गया था| उस समय तक भी राष्ट्र की मनोदशा युद्ध जैसी थी| मेरी माँ ने मुझे आधा दर्जन पायजामे दिए थे जो उन्होंने “घायल जवानों” के लिए सिले थे और शास्त्री जी के लिए घर में उगाई गयी पालक का एक थैला भरकर दिया था, याद कीजिए, ये अकाल के दिन थे और प्रधानमंत्री हमसे हफ्ते में एक दिन का उपवास रखने और घर में ही सब्जियां उगाने के लिए कह रहे थे| शास्त्री जी ने मुस्कुराहट और गाल पर एक थपथपी के साथ दोनों को स्वीकार किया|

आरएसएस और इसकी सोच के बारे में बहुत कुछ विदित है, लेकिन मैं अपने अनुभव से तीन चीजों पर प्रकाश डालूँगा| पहला, हमारे शिक्षण में भगत सिंह, आज़ाद, सावरकर और नेताजी जैसे क्रांतिकारियों को छोडकर अपने अन्य नायकों में से किसी का जिक्र किए बिना स्वतंत्रता आंदोलन पर भारी ज़ोर दिया गया|

यह स्पष्ट था की आरएसएस के पास बहुत सारे क्रन्तिकारी आरएसएस जनित नहीं थे, लेकिन क्रांतिकारियों को व्यवस्थित रूप से सह-चयन कर रहे थे| उस समय के लोकप्रिय गीतों के आधार पर संगीत की कक्षाएं “देशभक्ति” गीतों के स्वरों से भरी हुई थीं|

मन्ना डे की अमर पंक्तियाँ “निर्बल से लड़ाई बलवान की, ये कहानी है दिए की और तूफान की” से “इंग्लैंड से लड़ाई हिंदुस्तान की, ये कहानी है अमर बलिदान की” में परिवर्तित हो गयी थीं और बाकी के पदों में भारतीय बलिदान और ब्रिटिश नमकहरामी के बारे में बात की गयी थी जो कि कुछ यूं थी – ‘ऐसा चक्कर चलाया, किया धन का सफाया, इंग्लैंड का खज़ाना भरने लगा, तभी भारत अभागा अपनी नींद से जागा, आई याद उसे भी निज शान की‘| और हाँ, कांग्रेस को इस जागृति से कोई लेना देना नहीं था|

दूसरा, एक तरफ जहाँ अंग्रेजों और विदेशियों की निंदा की जाती थी, वहीं दूसरी तरफ जो लोग डरे हुए थे और नापसंद किए जाते थे वे थे मुसलमान| उस समय विभाजन के दौर के भयानक अत्याचारों, कश्मीर में ‘युद्ध विराम रेखा’ या सीज़फायर लाइन (LoC का 1971 से पहले का नाम) पर संकट और हिंदुओं और सिखों पर मुस्लिम शासकों की ज्यादतियों की कहानियां प्रचलित थीं|

औरंगजेब इस पैशाचिकी के शीर्ष पर था और यह मुद्दा बार-बार उठाया जाता था कि उसने नौवें सिख गुरु तेग बहादुर का सिर कलम किया था| मैं औरंगजेब के दादा जहाँगीर के अनुपस्थित संदर्भ से आश्चर्यचकित था, जो दुनिया के सारे मध्ययुगीन शासकों की तरह एक अच्छा व्यक्ति नहीं था और जिसने पांचवे  सिख गुरु अर्जुन देव को धीमी यातनाओं के माध्यम से, उन्हें गरम चादरों पर लिटाकर और उनके शरीर पर गरम रेत डालकर मार डाला था|

मैं सोचता रहा कि औरंगजेब को ही उस अपराध के लिए बुरा क्यों बनाया गया जबकि जहाँगीर का भी अपराध औरंगजेब से कमतर नहीं था| और यह बात मुझे तब अचानक से समझ आई जब सरकार के साथ अपनी “समन्वय” बैठकों के लिए आरएसएस का आगमन और 1965 युद्ध की 50वीं वर्षगांठ मेरी याददाश्त को मेरे शिशु मंदिर में वापस ले गयी| औरंगजेब ने नौंवें गुरु की हत्या इसलिए की थी क्योंकि वह उसके पास कश्मीरी हिंदुओं के जबरन धर्मान्तरण को रोकने की याचना लेकर गए थे |

दूसरी तरफ पांचवे गुरु ने गुरु ग्रंथ साहिब में से उन छंदों को बाहर निकालने से इंकार कर दिया था जो उन्होंने पवित्र कुरान से लिए थे| आप एक हिन्दू कारण के लिए एक गुरु के बलिदान और अपने अध्यात्मिक जगत में इस्लाम से ज्ञान को समाविष्ट करने की जिद के लिए दूसरे गुरु के बलिदान के बीच का अंतर समझ सकते हैं|

और तीसरा, जो लगभग स्वाभाविक रूप से आरएसएस से झलका, यानि कि पाकिस्तान का डर और नफरत और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह कि उस देश के साथ भारतीय मुस्लिमों का अंतिम समय में जुड़ाव| भारतीय मुसलमानों के लिए प्राचीन आरएसएस विचार एक स्थायी पांचवें स्तंभ के रूप में था| अब भारत के पास बड़ी मुस्लिम आबादी होने की अपरिहार्यता की स्वीकृति है, लेकिन सोच अभी भी यही है कि इसे ‘हमारे’ नियमों के हिसाब से जीना है|

और फिर भी, जैसे गहरे अविश्वास और बहुत सम्मान का विचित्र मिश्रण कान्वेंट शिक्षा के साथ जुड़ा है ठीक वैसे है और भी अधिक सम्मान उन मुसलमानों के लिए है जो ‘देशभक्ति’ और ‘भारतीयता’ पास कर लेते हैं|

यही कारण है की कलाम, न सिर्फ उन मिसाइलों के लिए जो उन्होने बनाई हैं बल्कि श्लोक और वीणा के उनके प्यार के लिए भी, एक महान नायक और औरंगजेब के लिए एकदम सही प्रतिकारक बन गए| या 1965 युद्ध के महानतम नायक हवलदार अब्दुल हमीद| वकील – राजनेता मोहम्मद करीमजी छगला एक और उदहारण थे|

वाजपेयी और आडवाणी आरएसएस के प्रति वफादार रहते हुए इस संगठनात्मक मानसिकता में अपने हिसाब से बदलाव करने वाले दुर्लभ आरएसएस नेता हैं| यही कारण है कि उनके अंतर्गत भाजपा ने जसवंत सिंह, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा, रंगराजन कुमारमंगलम जैसी अन्य कई गैर-आरएसएस प्रतिभाओं को आकर्षित किया और गले लगाया| आडवाणी के पास भी यह समझने की बुद्धि है कि यह विचारधारा नहीं बदलेगी| उनका सूत्रीकरण, कि भारत में हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्धों को सुधारने की कुंजी भारत पाकिस्तान सम्बन्धों को सामान्य बनाना है, अच्छा खासा है, लेकिन इसने उन्हें परेशानी में डाल दिया था| आरएसएस ने उन पर जिन्ना का चाहने वाला होने का आरोप लगाया था| धरमनिरपेक्ष लोग इस जटिलता को या तो समझते नहीं थे या सराहना नहीं करते थे|

भाजपा के नेताओं का वर्तमान समूह अभी भी स्वयंसेवक है और शिशु मंदिर-विद्या भारती को दिलों में रखने वाले छात्र हैं| यही कारण है कि नागपुर के पुरोहित दिल्ली में ‘सर्वोच्च शिक्षक’ की तरह खुद को स्थापित कर सकते हैं यानि कि भाजपा पर अतिरिक्त संवैधानिक प्रभाव, ठीक वैसे ही जैसे कॉंग्रेस पर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का प्रभाव था|

देखिये किस प्रकार अब एयर इंडिया की बिक्री पर इससे परामर्श किया जाता है और फ्लिपकार्ट-वालमार्ट सौदे पर किस तरह से हस्तक्षेप किया है| प्रारम्भ में मेरा मानना था कि नरेंद्र मोदी, एक निष्ठावान स्वयंसेवक होने के साथ साथ अपने स्वयं के अधिकार में एक मजबूत नेता भी हैं, अपने प्राधिकार को संगठन के हाथों में जाने की अनुमति नहीं देंगे और यह भी मानता था कि यदि वह अपने राजनीतिक किरदार के लिए सच्चे होंगे तो वह अपने आप को दृढ़ रखेंगे|

मैंने कहा था, गुरु-शिष्य की लड़ाई की भविष्यवाणी करना मुश्किल है, लेकिन यदि वे करते हैं, तो यह एक बदतर लड़ाई होगी| अब ऐसा लगता है कि मेरी सोच गलत थी| चार साल में मोदी सरकार उतनी ही आरएसएस सरकार है जितनी कि वाजपेयी की नहीं थी|

यही कारण है कि आरएसएस द्वारा “यथार्थता” के लिए प्रणब मुखर्जी से शामिल होने का बेतहाशा आग्रह करना आडम्बरपूर्ण बकवास है| देश के सत्तारूढ़ संस्थान को व्यक्तियों से यथार्थता की आवश्यकता नही है| इसका 2019 में परीक्षण किया जाएगा |

– इस आलेख का संस्करण सितंबर 2015, में आउटलुक पत्रिका में प्रकाशित हुआ था|

Read in English : How engaging with the RSS brought double benefit – for the schoolboy me, if not Pranab-da

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