जो सात लोग 27 मार्च को ज़ोजिला दर्रे में हुए हिमस्खलन में मारे गए, उन्होंने आखिरी बार ही यह धूप देखी होगी. और, वही धूप उनकी मौत का कारण बनी.
दोपहर की गर्मी ऊपर जमी बर्फ को पिघला देती है, जिससे वह श्रीनगर-लेह हाईवे की ढलानों से नीचे आ जाती है. यह भी अच्छी तरह से प्रचालित है कि मार्च हिमस्खलन के लिए खतरनाक महीना होता है और सुबह 10 बजे तक का समय आमतौर पर दोपहर से ज्यादा सुरक्षित माना जाता है. 12:30 से 1 बजे के बीच हुआ यह हिमस्खलन भारी और हल्की गाड़ियों पर गिरा, जबकि सलाह होती है कि पहले हल्के वाहन जाएं और उसके बाद भारी वाहन. मरने वालों में एक 10 साल का बच्चा भी शामिल है, और दो लोगों की तलाश अभी जारी है.
करीब चार हफ्तों में यह हिमस्खलन लगभग भुला दिया जाएगा. भारत में गर्मी शुरू हो जाएगी और स्कूलों की छुट्टियां भी. लोग उत्तराखंड या हिमाचल के आखिरी गांव में होमस्टे ढूंढने की भागदौड़ में लग जाएंगे. यह सिलसिला चलता रहेगा, क्योंकि #TheMountainsAreCalling. जब पिछले कुछ सालों में हजारों लोगों की जान जा चुकी है, तो सात लोगों की मौत का क्या मतलब रह जाता है?
पहाड़ों पर दबाव
पीढ़ियों से भारत के उत्तरी राज्य मैदानी इलाकों की भीषण गर्मी से राहत देने वाली जगह रहे हैं. पिछले 25 सालों में पर्यटन क्षेत्र के बदलने के साथ, और चौड़ी सड़कों पर 4×4 गाड़ियों की आसान यात्रा ने पुराने ट्रेन सफर की जगह ले ली, जिससे हिमालय तक पहुंच अचानक बहुत ज्यादा बढ़ गई. लेकिन पिछले कुछ सालों से पहाड़ खतरे का इशारा दे रहे हैं—भूस्खलन, अचानक बाढ़, कचरे और पानी की समस्या के रूप में. लेकिन इन सबके बावजूद पर्यटकों का उत्साह कम नहीं होता.
उत्तराखंड के जोशीमठ को ही देख लीजिए. यह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का शहर है और हेमकुंड साहिब और औली जैसे पर्यटन स्थलों का प्रवेश द्वार है. 2023 में यहां 700 इमारतों में दरारें आ गईं और वे रहने लायक नहीं रहीं. यह शहर, जो पुराने भूस्खलन के मलबे पर बसा है, धीरे-धीरे धंसने भी लगा.
लेकिन यह पहली बार नहीं था जब जोशीमठ चर्चा में आया. यहां घरों में दरारें 1960 के दशक में ही दिखने लगी थीं. 1976 में एक सरकारी समिति ने सिफारिश की थी कि पत्थरों को तोड़ने का काम तुरंत बंद किया जाए, पक्का ड्रेनेज सिस्टम बनाया जाए और पेड़ों की कटाई रोकी जाए ताकि भूस्खलन से बचा जा सके.
इसके बावजूद, आज जोशीमठ में लग्जरी होटल भरे पड़े हैं.
2023 तक इस शहर का धीरे-धीरे धंसना यह दिखाने वाला उदाहरण बन गया कि अस्थिर पहाड़ी जमीन पर बिना वैज्ञानिक तरीके से निर्माण करने का क्या परिणाम होता है. लेकिन अगले ही साल गर्मियों तक यह चेतावनी भूल जा चुकी थी, और चार धाम यात्रा—जिसके लिए किए जा रहे निर्माण को लेकर भूवैज्ञानिक पहले से चिंता जता रहे थे—में 50 लाख से ज्यादा श्रद्धालु आए. 2012 में यह संख्या 4.5 लाख थी.
धार्मिक पर्यटन ही पहाड़ों पर दबाव का एकमात्र कारण नहीं है. पिछले साल पर्यटन के चरम समय में, हिमालय के 67 प्रतिशत पर्यटन स्थलों पर पानी की कमी हो गई और स्थानीय लोगों के लिए पानी सीमित करना पड़ा ताकि होटलों को पानी मिल सके. पहाड़ों में एक पर्यटक रोज 150 से 200 लीटर पानी इस्तेमाल करता है, जबकि एक स्थानीय व्यक्ति 30 से 40 लीटर ही इस्तेमाल करता है. शिमला में पिछले जून एक दिन में 15,000 वाहन पहुंचे, जबकि वहां पार्किंग की क्षमता सिर्फ 5,000 वाहनों की है.
लेकिन पर्यटक को दोष देना सबसे आसान है, क्योंकि वह इस समस्या की सबसे दिखाई देने वाली कड़ी है—सबसे बड़ी वजह नहीं.
कभी न खत्म होने वाला विकास
भारत के हाईवे नेटवर्क का हिमालय तक विस्तार पिछले दो दशकों की सबसे बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में से एक रहा है. हिमालय भूवैज्ञानिक रूप से युवा पहाड़ हैं, जिनकी चट्टानें टूटी-फूटी और कमजोर होती हैं, और सड़क बनाने जैसे काम से उन पर दबाव पड़ता है जिससे वे आसानी से खिसक सकती हैं. खर्च और जगह बचाने के लिए ढलानों को लगभग सीधा काट दिया जाता है, जिससे पहाड़ अस्थिर हो जाते हैं.
इस अस्थिरता का असर कई बार सालों बाद दिखता है, जैसे किसी गांव का धंसना या हल्की बारिश के बाद भूस्खलन होना.
परवाणू-सोलन फोर-लेन प्रोजेक्ट की शुरुआती लागत 2015 में 934 करोड़ रुपये थी. लेकिन इस रिपोर्ट के मुताबिक, “2022 तक बार-बार भूस्खलन होने से लागत 65 प्रतिशत बढ़कर 1,541 करोड़ रुपये हो गई”. फरवरी 2023 में NHAI को इस रास्ते पर 32 जगहों पर “स्लोप प्रोटेक्शन वर्क” के लिए 122 करोड़ रुपये का टेंडर जारी करना पड़ा. जो सड़क पहाड़ों को खोलने के लिए बनाई गई थी, अब उसी सड़क को पहाड़ों से बचाने के लिए भारी खर्च किया जा रहा है.
लेकिन विकास की यह लगातार दौड़ जारी है. इन हादसों के बावजूद इस मॉडल पर दोबारा सोचने की जरूरत महसूस नहीं की गई है.
हिमाचल प्रदेश में मीना बाग होमस्टे चलाने वाले पूर्व पत्रकार संजय ऑस्टा बताते हैं कि उन्होंने स्पीति वैली के चंद्रताल को सड़क से जुड़ते देखा, जहां पहले सिर्फ कठिन ट्रेक करके पहुंचा जा सकता था. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “कुछ जगहें ऐसी होनी चाहिए जो पहुंच से बाहर हो. चंद्रताल मेरे सबसे अच्छे ट्रेकिंग अनुभवों में से एक रहा, क्योंकि वहां पहुंचने के लिए मेहनत करनी पड़ी. तभी तो उस जगह की असली कीमत समझ आती है.”
लेकिन यह सोच कि हर जगह तक आसानी से पहुंच होना ही अच्छा है और कोई भी पहाड़ पहुंच से बाहर नहीं होना चाहिए, पहाड़ों को समझने की बजाय उन्हें इस्तेमाल करने की चीज बना देती है. इस सोच को मजबूत राजनीतिक समर्थन भी मिला हुआ है. ऑस्टा, हाटू पीक का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि हमें यह मान लेना चाहिए कि हर जगह हर किसी के लिए सुलभ नहीं हो सकती. ऑस्टा को कई बार ऐसे लोगों को मना भी करना पड़ता है जिन्हें चलने-फिरने में दिक्कत होती है, क्योंकि उनका होमस्टे, जो एक ऑर्गेनिक बाग में है, वहां पहुंचने के लिए थोड़ा ट्रेक करना पड़ता है.
‘घाटी इतनी आबादी नहीं संभाल सकती’
मीना बाग पारंपरिक काठकुनी शैली में बना है, जिसमें लकड़ी और पत्थर की परतें बिना सीमेंट के लगाई जाती हैं. यह तरीका इतना अनुकूल था कि इससे बने घर भूकंप में भी सुरक्षित रहते थे. पीढ़ियों तक यह तरीका पर्यावरण के अनुकूल था, लेकिन जब इसी स्टाइल को बड़े होटलों में इस्तेमाल किया जाता है तो स्थिति बदल जाती है.
जैसा कि ऑस्टा बताते हैं, बड़े काठकुनी होटलों में देवदार की लकड़ी बहुत ज्यादा इस्तेमाल होती है. एक देवदार का पेड़ पूरी तरह बड़ा होने में करीब 200 साल लेता है. “अब काठकुनी एक ब्रांड स्ट्रेटेजी बन गई है,” ऑस्टा कहते हैं. “लेकिन बड़े पैमाने पर ऐसे निर्माण से अवैध खनन और पेड़ों की कटाई बढ़ती है.”
मीना बाग को अभी तक बड़े पर्यावरणीय हादसों का सामना नहीं करना पड़ा है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के असर साफ दिख रहे हैं. ऑस्टा बताते हैं कि रत्नारी के आसपास उनके खेत से मेंढक और टोड जैसे जीव लगभग गायब हो गए हैं, जो पहले कीड़े-मकोड़ों को नियंत्रित करते थे. इनके न होने से कीट बढ़ गए हैं, और किसान अब कीटनाशकों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे पक्षियों की संख्या भी कम हो गई है. हिमालयन बुलबुल, जिसकी चोंच छोटी होती है, अब कीड़ों की बजाय चेरी खाने लगी है और खुद एक कीट मानी जाने लगी है.
पहाड़ों में रहने वाले लोगों को भी खुद को बदलना पड़ रहा है. हिमाचल प्रदेश में एक छोटा सा होमस्टे चलाने वाली संध्या (बदला हुआ नाम) ने पिछले सात सालों में अपनी घाटी को बदलते हुए देखा है—एक हरे-भरे नदी किनारे से लेकर अब यह इमारतों की एक अंतहीन कतार बन गई है—जिनमें कमर्शियल और रिहायशी, दोनों तरह की इमारतें शामिल हैं. उन्होंने बताया, “यह घाटी बहुत संकरी है और ज्यादा लोगों को नहीं संभाल सकती. जब हमने होमस्टे शुरू किया था, दो दिन में एक गाड़ी गुजरती थी. अब हर तरफ ट्रक कंस्ट्रक्शन का सामान ला रहे हैं और मेरे होमस्टे में धूल की परत जम जाती है. बचपन में पहाड़ों में ऐसा कभी नहीं देखा था.”
संध्या के गांव में करीब 40 घर हैं, लेकिन अब वहां 15 होमस्टे बन गए हैं. कई लोगों ने कोविड-19 के बाद बढ़ते पर्यटन को देखकर जल्दी-जल्दी कर्ज लेकर ये बनाए. लेकिन 2023 और 2025 की भारी बारिश और भूस्खलन ने बड़ा नुकसान पहुंचाया. “मेरे एक कर्मचारी का घर 2023 की बाढ़ में बह गया,” संध्या ने बताया. “उसने बाद में पक्का घर बनाया, लेकिन जुलाई 2025 की बाढ़ में वह नया घर भी बह गया.”
संध्या का अपना होमस्टे भी खतरे में है. इलाके के सर्वे करने वालों ने सलाह दी है कि इस पहाड़ी को खाली कर देना चाहिए क्योंकि ढलान बहुत अस्थिर है. “लेकिन कोई अपना घर छोड़ना नहीं चाहता. लोग अपनी चीजों को पकड़े रखना चाहते हैं, चाहे जान का खतरा ही क्यों न हो.”.
जिम्मेदार पर्यटन
जब समाधान की बात होती भी है, तो अक्सर बात “जिम्मेदार पर्यटन” पर आकर रुक जाती है. हमें कहा जाता है कि हमें छोटे ग्रुप्स में यात्रा करनी चाहिए और अपने असर को कम करना चाहिए. शिखा त्रिपाठी, जो एक पर्वतारोही हैं और स्नोफॉक्स एस्केप्स नाम की एक छोटी ट्रेकिंग कंपनी की को-फाउंडर हैं, कई सालों से यही करने की कोशिश कर रही हैं. कई वर्षों से त्रिपाठी हिमालय के ट्रेक जैसे हम्पटा पास या मार्का वैली के बारे में लिखती रही हैं, जहां बहुत ज्यादा ट्रेकर्स पहुंच रहे हैं.
उन्होंने कहा, “स्नोफॉक्स की शुरुआत इस सोच से हुई थी कि पहाड़ों में जो समस्याएं मैं देख रही थी, उनका हल निकाला जाए. और उनमें से एक बड़ी समस्या थी बड़े-बड़े ट्रेकिंग ग्रुप्स का भारी असर और परेशानी.”
त्रिपाठी कहती हैं कि जब समूह छोटे होते हैं तो सीखने का अनुभव बहुत अलग होता है.
लेकिन वह यह भी साफ कहती हैं कि यह मॉडल सब कुछ हल नहीं कर सकता. “मुझे नहीं लगता कि हिमालय के लिए कोई ऐसा पर्यटन मॉडल है जो हमारी इतनी बड़ी मांग के हिसाब से पूरी तरह टिकाऊ हो सके,” वह कहती हैं.
त्रिपाठी जानती हैं कि किसी भी समाधान के लिए लोगों की संख्या पर सख्त सीमा लगानी पड़ेगी. “अगर आप छोटे और कम असर वाले ग्रुप्स रखना चाहते हैं, तो खर्च बढ़ जाता है. फिर सवाल आता है कि पहाड़ों का आनंद कौन ले पाएगा—वह जो सच में कुदरत से प्यार करता है या वह जो जिम्मेदार यात्रा के नियमों का पालन करने वाली कंपनी को पैसे दे सकता है? मैं अभी भी इस बात को लेकर उलझन में हूं कि सही लोगों तक कैसे पहुंचा जाए बिना कीमत को बाधा बनाए,” वह कहती हैं.
दूसरे शब्दों में, जिम्मेदार पर्यटन ज्यादातर उन्हीं के लिए है जो इसका खर्च उठा सकते हैं. पहाड़ सबके लिए खुले हैं, लेकिन उन्हें सही तरीके से प्यार करना एक कीमत के साथ आता है.
त्रिपाठी एक खूबसूरत सोच जाहिर करती हैं जो उन्होंने पहाड़ों से सीखी. “हर चीज को ऐसे देखो जैसे पहली बार देख रहे हो, और जैसे आखिरी बार देख रहे हो.” वह इसे हैरानी और वर्तमान में जीने का तरीका मानती हैं. लेकिन 2026 के हिमालय में, जहां ढलान खतरनाक हो चुके हैं, “आखिरी बार” अब सिर्फ एक रूपक नहीं रह गया है. हमने इन पहाड़ों से इतना ज्यादा और इतनी लापरवाही से प्यार किया है कि शायद एक आखिरी, परफेक्ट नज़ारा ही बाकी रह जाए.
करनजीत कौर पत्रकार हैं. वे TWO Design में पार्टनर हैं. उनका एक्स हैंडल @Kaju_Katri है. व्यक्त विचार निजी हैं.
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