Monday, 23 May, 2022
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NEET ने गरीब और ग्रामीण छात्रों के लिए डॉक्टर बनना कैसे मुश्किल कर दिया

नीट से सबसे ज्यादा फायदा कोचिंग बिजनेस को हुआ है क्योंकि कई राज्यों में पहले 12वीं के नंबर के आधार पर मेडिकल कॉलेज में दाखिले होते थे और उनका बिजनेस जम नहीं पा रहा था.

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भारत के मेडिकल कॉलेजों की ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट सीटों के लिए होने वाली एकीकृत परीक्षा- नेशनल इलिजिबिलिटी कम एंट्रेस टेस्ट यानि नीट– के लागू हुए पांच साल हो गए हैं और अब हम इस परीक्षा से होने वाले एडमिशन के बारे में काफी कुछ जानते हैं कि इसकी वजह से किनको एडमिशन मिल रहा है और कौन मेडिकल एजुकेशन से बाहर हो गए हैं.

यह जानना इसलिए संभव हो पाया क्योंकि तमिलनाडु सरकार ने नीट के जरिए होने वाले एडमिशन का अध्ययन करने के लिए हाई कोर्ट के रिटायर जज जस्टिस ए.के. राजन की अध्यक्षता में इस साल 10 जून को एक कमेटी गठित की. इस कमेटी ने 86,000 से ज्यादा लोगों की राय का अध्ययन किया और तमाम आंकड़े जुटाए. कमेटी इस निष्कर्ष पर पहुंची कि नीट न सिर्फ भेदभावपूर्ण है, बल्कि इसकी वजह से गरीब और ग्रामीण स्टूडेंट्स मेडिकल शिक्षा से वंचित रह जा रहे हैं.

कमेटी के कुछ प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार हैं:

1. नीट के जरिए मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन पाने वाले 99% कैंडिडेट वे हैं, जिन्होंने कोचिंग सेंटर की मदद ली है. यानि अगर किसी के पास कोचिंग सेंटर जाने के लिए पैसे नहीं हैं, या कोई दूर दराज में रहता है, जहां कोचिंग सेंटर नहीं हैं, या किसी लड़की का परिवार अगर उसे कोचिंग के लिए बाहर नहीं भेज रहा है तो उसे मेडिकल कॉलेज में एडमिशन शायद ही मिल पाएगा.

2. नीट के आने के बाद से ग्रामीण क्षेत्रों के स्टूडेंट्स का मेडिकल कॉलेजों में सलेक्शन घट गया है. 2016-17 से पहले जहां तमिलनाडु के मेडिकल कॉलेजों में 65% कैंडिडेट गांवों के स्कूलों से आ रहे थे, वह संख्या अब घटकर 48% रह गई है.

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3. इसी तरह नीट लागू होने से पहले तमिलनाडु के मेडिकल कॉलेजों में लगभग 15% कैंडिडेट तमिल मीडियम स्कूलों से आ रहे थे. वह संख्या अब 2% से भी कम रह गई है.

4. चूंकि नीट के सिलेबस का आधार सीबीएसई का सिलेबस है, इसलिए तमिलनाडु राज्य बोर्ड के स्टूडेंट्स का मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश भी लगातार घट रहा है.

अगर बाकी राज्यों में अध्ययन कराया जाए, तो नतीजे ऐसे ही आएंगे. कुल मिलाकर देखा जाए तो नीट शहरी, इंग्लिश मीडियम स्कूलों, सीबीएसई बोर्ड और कोचिंग सेंटर में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स के पक्ष में काम कर रहा है. वहीं ग्रामीण, भारतीय भाषा माध्यमों के स्कूलों, राज्य बोर्ड और कोचिंग न ले पाने वाले स्टूडेंट्स मेडिकल एजुकेशन से वंचित हो रहे हैं.

जस्टिस राजन कमेटी ने तमिलनाडु सरकार को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में इस बात की सिफारिश की है कि तमिलनाडु को नीट से बाहर आ जाना चाहिए और राज्य के मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन का आधार 12वीं के रिजल्ट होने चाहिए.

राजन कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद तमिलनाडु सरकार ने विधानसभा में एक कानून (तमिलनाडु अंडरग्रेजुएट मेडिकल डिग्री कोर्स एडमिशन एक्ट) पास किया, जिसमें व्यवस्था है कि राज्य के मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन का आधार 12वीं में हासिल नंबर होंगे.

अब ये मामला केंद्र सरकार के पास है, क्योंकि राष्ट्रपति के अनुमोदन से ही ये लागू हो पाएगा. ऐसा इसलिए है क्योंकि मेडिकल शिक्षा समवर्ती सूची में है, जिसपर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं और चूंकि इस बारे में केंद्र सरकार का कानून मौजूद है, इसलिए उसे बेअसर करने वाला कोई कानून राष्ट्रपति (व्यावहारिक अर्थों में केंद्र सरकार) की मंजूरी से ही लागू हो सकता है.


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क्या हम नीट के अंत की ओर बढ़ रहे हैं?

क्या ये माना जाए कि तमिलनाडु की इस पहल के बाद कुछ और राज्य भी ऐसी ही पहल करेंगे (कई राज्य पहले ही नीट का विरोध कर चुके हैं) और इस तरह नीट का अंत हो जाएगा? अभी इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी. लेकिन इतना तय है कि जस्टिस राजन कमेटी ने नीट को लेकर कुछ वाजिब सवाल खड़े कर दिए हैं और इसे लेकर चर्चा शुरू हो गई है.

नीट के जरिए मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन एक नई व्यवस्था है. इसे वास्तविक अर्थों में 2016-17 में ही लागू किया जा सका. हालांकि इसके लिए केंद्र सरकार 2010 से ही लगातार कोशिश कर रही थी. नीट लागू होने से पहले राज्य सरकारें मेडिकल एडमिशन के अपने एंट्रेंस टेस्ट करती थीं. निजी और माइनॉरिटी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे मेडिकल कॉलेजों के टेस्ट अलग से होते थे. इसके अलावा राज्यों के मेडिकल कॉलेजों में 15 प्रतिशत ऑल इंडिया सीटों को भरने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्री मेडिकल टेस्ट या पीएमटी आयोजित होती थी.

मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन के लिए कई परीक्षाओं का होना वह मुख्य कारण बना, जिसे आधार बनाकर यूपीए सरकार ने 20 दिसंबर, 2010 को एक नोटिफिकेशन जारी किया. इसमें नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेस्ट टेस्ट यानि नीट के जरिए देश भर के मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन दिए जाने की व्यवस्था थी.


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क्या बताकर लाया गया था नीट?

नीट लाने के पीछे जो कारण बताए गए थे, वे बहुत लुभावने थे. दरअसल उस समय तक ये नजर आने लगा था कि मेडिकल की पढ़ाई समृद्धि हासिल करने का बड़ा जरिया है और सीटों के लिए मारामारी तेज हो गई थी. प्राइवेट मेडिकल कॉलेज कैपिटेशन फीस के जरिए एडमिशन दे रहे थे और पैसे वालों के लिए अपने बच्चों को डॉक्टर बनाना आसान हो गया था. उस समय सरकार ने जब ये कहा कि हम नीट के जरिए मुनाफाखोरी खत्म कर देंगे, कैपिटेशन फीस के जरिए डॉक्टर बनने बंद होंगे, एडमिशन में धांधली बंद होगी और एक ही परीक्षा के आधार पर एडमिशन हो जाएगा, तो कई लोगों ने इसका स्वागत किया. इसी माहौल में तत्कालीन यूपीए सरकार 2010 में नीट लेकर आ गई.

लेकिन ये मामला कोर्ट में चला गया. इसे मुख्यत: इस आधार पर चुनौती दी गई कि ये राज्यों के मामलों में हस्तक्षेप है. साथ ही निजी कॉलेजों और विशेषकर अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थाओं की स्वायत्तता का भी इससे हनन होता है. इस समय के चर्चित केस क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर बनाम भारत सरकार मुकदमे में नीट के पक्ष में मेडिकल कौंसिल और भारत सरकार के एडिशनल सोलीसिटर जनरल ने दलीलें दीं.

मेडिकल कौंसिल के वकील ने बहस के दौरान कहा: ‘माननीय न्यायालय ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि किस तरह मेडिकल एडमिशन में कैपिटेशन फीस और दूसरी धांधलियां हो रही हैं, जिसका बुरा असर भारत में मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ रहा है. ऐसी धांधली से पूरी एडमिशन प्रक्रिया सवालों के दायरे में है और अगर इसे जारी रहने दिया गया तो दाखिले का पूरा सिस्टम एक धोखा बनकर रह जाएगा. इन धांधलियों पर रोक लगाने के लिए ही मेडिकल कौंसिल ने नीट की शुरुआत की है और ऐसा करना मेडिकल कौंसिल के अधिकार क्षेत्र में है.’

वहीं भारत सरकार के वकील एडिशनल सोलिसिटर जनरल सिद्धार्थ लूथरा ने कहा- ‘मानदंडों में एकरूपता, मेरिट और पारदर्शिता लाने के लिए नीट की शुरुआत की गई है. साथ ही इसका मकसद छात्रों को होने वाली दिक्कतों को समाप्त करना भी है… कई सारी परीक्षाओं वाली पुरानी व्यवस्था न तो राष्ट्र हित में थी और न ही इससे मेडिकल शिक्षा के स्तर को ही बनाए रखा जा सकता था. न ही ये गरीब और मध्यवर्गीय स्टूडेंट्स के हितों को पूरा कर रही थी, जिन्हें इनकी वजह से कई परीक्षाओं के फॉर्म खरीदने पड़ रहे थे और परीक्षा देने के लिए जगह-जगह जाना पड़ रहा था.’

इन दो वकीलों के तर्कों के आधार पर समझा जा सकता है कि सरकार नीट को क्या बताकर ला रही थी. इसमें राष्ट्र हित वाला तर्क सबसे रोचक है, लेकिन केंद्र सरकार के वकील ने इस बारे में और कोई बात नहीं कही, इसलिए समझ पाना मुश्किल है कि इसमें राष्ट्रहित का मामला कहां से आ गया.


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नीट से न भ्रष्टाचार रुका, न शिक्षा सस्ती हुई

आज हम ये कहने की स्थिति में हैं कि नीट ने अपना कोई घोषित उद्देश्य पूरा नहीं किया है. अखिल भारतीय परीक्षा ने एक माहौल तो बनाया कि इससे सब साफ-सुथरा हो जाएगा और ईमानदारी से एडमिशन होगा, लेकिन हम सब जानते हैं कि नीट में धांधली और पर्चा लीक होने से लेकर डमी कैंडिडेट बिठाकर परीक्षा दिए जाने के मामले कितने आम हैं. कोचिंग सेंटरों को भी अक्सर ऐसी धांधली में लिप्त पाया गया है.

मेडिकल एजुकेशन खासकर प्राइवेट कॉलेजों में शिक्षा पहले से महंगी ही हुई है. जहां तक मेरिट और स्तर की बात है तो अगर किसी के पास पैसे हैं तो प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेने के लिए रैंक कोई बाधा नहीं है. दरअसल नीट में मेडिकल कॉलेजों की मुनाफाखोरी रोकने की कोई व्यवस्था कभी थी ही नहीं. ये एक ऐसा वादा था, जो बस यूं ही कर दिया गया था.

नीट ने कोचिंग सेंटर्स के कारोबार को कई गुना बड़ा बना दिया और ये अब शिक्षा जगत का सबसे फायदेमंद क्षेत्र है. जब तक 12वीं बोर्ड के नंबर के आधार पर एडमिशन होते थे, तब तक कोचिंग सेंटर को कारोबार फैलाने का मौका नहीं मिल पाया था.

राष्ट्रहित के बहाने से लाए गए नीट ने राज्यों के अधिकारों को भी काफी कम कर दिया. राज्य सरकारों के जिन मेडिकल कॉलेजों की स्थापना और उनके संचालन में केंद्र सरकार एक पैसा खर्च नहीं करती, वहां होने वाले एडमिशन में केंद्र सरकार का पूरा नियंत्रण एक अन्यायपूर्ण व्यवस्था है. यही बात निजी और माइनॉरिटी शिक्षा संस्थानों पर भी लागू होती है.

इन्हीं तर्कों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने 18 जुलाई, 2013 को बहुमत से दिए गए फैसले में नीट को खारिज कर दिया था. जस्टिस अल्तमस कबीर और जस्टिस विक्रमजीत सेन ने अपने फैसले में लिखा था– ‘देश के अलग-अलग हिस्सों में शिक्षा का स्तर भिन्न है. हर राज्य में शिक्षा की अपनी व्यवस्था है और शिक्षा का मीडियम भी अलग है. ये भी सच है कि बड़े शहरों के स्टूडेंट्स को गांवों के स्टूडेंट्स की तुलना में बेहतर शिक्षा मिलती है. अगर केंद्र सरकार एक ही एंट्रेंस टेस्ट से सबको तौलेगी, तो कहने को तो ये मेरिट को बढ़ावा देना होगा, लेकिन इससे प्रतियोगिता असमान हो जाएगी.’

इस बेंच के तीसरे जज जस्टिस अनिल दवे ने इस फैसले से असहमति जताई. तीन साल बाद जस्टिस दवे के नेतृत्व में पांच जजों की बेंच ने 2013 के फैसले को पलट दिया और इस तरह नीट देश में लागू हो गया. आश्चर्यजनक रूप से 2016 के फैसले में जजों ने नीट लागू करने का कोई कारण नहीं बताया.

अब आवश्यक है कि नीट पर एक बार फिर से पुनर्विचार हो. ऐसा खासकर इसलिए जरूरी हो गया है क्योंकि जस्टिस राजन कमेटी की रिपोर्ट बता रही है कि नीट से देश के गरीब और राज्य बोर्ड के स्टूडेंट्स का कितना नुकसान हो रहा है.

(लेखक पहले इंडिया टुडे हिंदी पत्रिका में मैनेजिंग एडिटर रह चुके हैं और इन्होंने मीडिया और सोशियोलॉजी पर किताबें भी लिखी हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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