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Tuesday, 28 May, 2024
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भारत में जल्दबाजी वाली पॉलिसी-मेकिंग फेल होती है, यूएस बैंकिंग संकट से सीखना होगा

भारत ने रेग्युलेशन के मामले में बहुत अच्छा किया है क्योंकि हर चीज के बारे में गहराई से सोचा है. अमेरिकी बैंकिंग संकट मोदी सरकार को नोटबंदी जैसे जल्दबाजी में लिए जाने वाले फैसलों से बचने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.

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हाल ही के दिनों ने देखने को मिला है कि हर बार जब भी भारतीय नीति निर्माताओं ने सोच-समझकर और काफी गहनता से विचार करके कोई कदम उठाया है तो उन्हें इसके अच्छे परिणाम देखने को मिले हैं जबकि इसके विपरीत, हर बार जब भी उन्होंने जल्दबाजी में कोई फैसला लिया है तो उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है.

पहले कही गई बात का सबसे ताजा उदाहरण अमेरिका और यूरोप में हो रही मंदी के आलोक में हमारे बैंकिंग क्षेत्र द्वारा प्रदर्शित लचीलापन है. दूसरी तरफ, हड़बड़ी में की गई नीतियों के कई उदाहरण सामने आए हैं जिनमें प्रमुख हैं नोटबंदी, जीएसटी और कृषि कानून.

आइए शुरुआत करते हैं इस बात से कि भारत ने सावधानी बरतकर क्या हासिल किया है. क्रिप्टोकरेंसी के संबंध में भारतीय रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय द्वारा लागू की गई नीतियों को लें. दिसंबर 2013 से, आरबीआई ने क्रिप्टोकरेंसी में निवेश करने से जुड़े जोखिमों को लेकर संभावित निवेशकों के लिए आरबीआई ने पिछले एक दशक में कई सार्वजनिक नोटिस जारी किए हैं.

2017 में जब क्रिप्टो करेंसी का क्रेज जोर पकड़ने लगा था और जनता के दिल-ओ-दिमाग पर कब्जा कर रहा था, तब भी वित्त मंत्रालय ने कड़ा रुख अपनाया और उसकी तुलना पोंजी स्कीम से करते हुए इसमें निवेश को जोखिम भरा बताया. इस साल फरवरी में, आरबीआई के डिप्टी गवर्नर टी रबि शंकर ने कहा था कि क्रिप्टो पोंजी स्कीम की तुलना में “और भी ज्यादा जोखिम भरा हो सकता है.”

2018 में अपने आखिरी बजट भाषण में, तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने स्पष्ट रूप से कहा था कि सरकार “क्रिप्टोकरेंसी को लीगल टेंडर नहीं मानती है… और पेमेंट सिस्टम से इन क्रिप्टो एसेट के उपयोग को खत्म करने के लिए सभी उपाय करेगी”. यानी क्रिप्टोकरेंसी में किसी भी तरह के लेनदेन की अनुमति नहीं होगी.

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हालांकि, वह ब्लॉकचेन तकनीक के काफी समर्थक थे, जिस पर क्रिप्टोकरेंसी आधारित होती है, लेकिन जिसमें क्रिप्टो से परे भी उपयोग की एक विस्तृत श्रृंखला होती है.

क्रिप्टो करेंसी और ब्लॉकचेन को लेकर जेटली का रवैया अब तक सरकार के साथ रहा है. बजट 2022 में, वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने क्रिप्टोकरेंसी से होने वाले मुनाफे पर कर लगाने के प्रावधान की घोषणा की, जिससे इस सेक्टर को उम्मीद थी कि कानूनी मान्यता मिलने वाली है.


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धीमी और स्थिर

लेकिन यह सरकार काफी सतर्क थी. उन्होंने मूल रूप से यह कहा था कि यदि आप क्रिप्टो करेंसी की बिक्री से लाभ प्राप्त करते हैं, तो आपको उन लाभों पर टैक्स चुकाना होगा. लेकिन अगर आपको नुकसान उठाना पड़ता है या धोखाधड़ी के शिकार हो जाते हैं, तो इसके लिए सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी, क्योंकि इसका कोई रेग्युलेटर नहीं है. ऐसे में कानूनी मान्यता का अर्थ समझ से परे है.

अब इस सतर्कता को इस तरह से देखें. अगर भारत ने क्रिप्टो करेंसी का खुली बाहों से स्वागत किया होता, तो इस बात की पूरी संभावना होती कि अमेरिका में एफटीएक्स के साथ जिस तरह की मंदी हुई थी यहां भी वैसा ही हुआ होता. ऐसा नहीं होने का कारण यह है कि हमारे रेग्युलेटर्स जोखिम को लेकर काफी सजग हैं.

इसलिए, आपको कीमते गिरने के कारण कुछ ऐसे निवेशक दिख सकते हैं जिन्होंने अपने खो दिए हों, या आप उन्हें घोटालों का शिकार होते हुए देख सकते हैं, लेकिन ऐसी घटनाओं की संख्या और पैमाने सरकार द्वारा अपनाए गए हतोत्साहित करने वाले रवैये के कारण बहुत कम हैं.

जिस तरह से हमने चीनी ऐप टिकटॉक पर प्रतिक्रिया दी वह दुनिया भर में क्रिप्टो करेंसी को लेकर बनी नीतियों के लिए भारत के सतर्क दृष्टिकोण का एक और उदाहरण है. जून 2020 में, भारत सरकार ने गोपनीयता और राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए टिकटॉक और 58 अन्य ऐप्स पर प्रतिबंध लगा दिया था.

निश्चित रूप से, इसमें हमारे भू-राजनीतिक तनावों और सीमा पर झड़पें इसका बड़ा कारण थीं, लेकिन ऐसा लगा कि इसका कारण निजता और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे हैं. अमेरिका कथित तौर पर टिकटॉक पर प्रतिबंध लगाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है, जब तक कि मूल कंपनी अपनी हिस्सेदारी नहीं बेचती.

भारत की राह पर चलने वाला अमेरिका अकेला नहीं है. यूरोपीय आयोग, यूरोपियन कमीशन और ईयू काउंसिल और यूरोपियन पार्लियामेंट सहित ब्रिटेन और न्यूजीलैंड ने भी अपने अधिकारिक फोन पर टिकटॉक पर प्रतिबंध लगा दिया.

अंत में, हम बैंकिंग विनियमन में आते हैं. हां, 2009-13 में हुए जरूरत से ज्यादा ऋण, और बाद में एनपीए की उच्च दर, और यस बैंक और आईएल एंड एफएस जैसे एनबीएफसी व बैंकों के टूटने की कगार पर पहुंचने के कारण भारत की बैंकिंग इंडस्ट्री की प्रतिष्ठा को काफी नुकसान पहुंचा.

लेकिन तथ्य यह है कि सारा मिस-मैनेजमेंट ऋण को लेकर था, जहां रेग्युलेशन (या इसकी कमी) की तुलना में व्यक्तिगत विवेकाधिकार की भूमिका कहीं ज्यादा थी. डिपॉजिट के बारे में बात करें तो- जहां अमेरिकी क्षेत्रीय बैंक वर्तमान में संकट का सामना कर रहे हैं- भारत में मजबूत विनियम और मानक हैं.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरबीआई ने शुरुआत में ही तय कर लिया था कि बैंकिंग विनियमन पर विश्व स्तर पर स्वीकृत सबसे बेहतर कार्यशैली- बासेल III दिशा निर्देश- सभी भारतीय बैंकों पर लागू होंगी. 2021 में, केंद्रीय बैंक ने इसे अखिल भारतीय वित्तीय संस्थानों (AIFIs) जैसे एक्जिम बैंक, नाबार्ड, नेशनल हाउसिंग बैंक (एनएचबी), और सिडबी को भी इसके दायरे में शामिल कर लिया.

अमेरिका में ऐसा नहीं है. वहां, एक महत्वपूर्ण लॉबी ने सरकार को छोटे बैंकों को बेसल III मानदंडों के दायरे से बाहर रखने और अनुमति देने के लिए मजबूर किया. जिसकी वजह से सिलिकॉन वैली बैंक, सिग्नेचर बैंक और सिल्वरगेट बैंक इत्यादि इस तरह के अविवेकपूर्ण तरीकों से काम कर सके.

यह देखकर बहुत अच्छा लगा कि आरबीआई सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी के लॉन्च को लेकर भी काफी सावधानी बरत रहा है, क्योंकि इसके लॉन्च से पहले बड़े स्तर पर पायलेट प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है.


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जल्दबाजी में गलती होती है

अब, आइए जल्दबाजी के कारण होने वाली गलतियों पर नजर डालते हैं. जिसमें पहला, निश्चित रूप से, नोटबंदी है. यदि विचार काले धन पर अंकुश लगाने का था, तो डेटा से पता चलता है कि यह सफल नहीं सका क्योंकि सारा का सारा कैश वापस आ गया था. यदि आतंक की फाइनेंसिंग को रोकना था, तो वह भी अल्पकालिक ही था क्योंकि कैश के प्रचलन में आने के बाद यह फिर से उनके पास पहुच गया.

यदि डिजिटल लेन-देन और अधिक बढ़ावा देने या ज्यादा बेहतर स्वरूप प्रदान करना था, तो यूपीआई के ज्यादा सुविधाजनक होने और 8 महीने बाद गुड एंड सर्विसेज टैक्स लॉन्च होने के कारण यह खुद-ब-खुद हो गया होता.

अब बात जीएसटी को लेकर उठती है. जीएसटी की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि यह खरीददारों और विक्रेताओं के चालानों (रसीदों) के मिलान पर आधारित था, और इसलिए सैद्धांतिक रूप से बहुत सारी लीकेज को खत्म कर सकता था. इसे ऐसी अर्थव्यवस्था पर थोपने की वजह से जो कि इसके लिए तैयार न हो, इनवॉइस मैचिंग को कई सालों के लिए रोकना पड़ा था.

जीएसटी निस्संदेह एक महान सुधार है, लेकिन जल्दबाजी में शुरू करने के कारण के इसकी महानता अब तक पूरी तरह से सामने नहीं आ पाई है.

फिर हम अब कुख्यात कृषि कानूनों पर आते हैं. भले ही आप बहुत कम गैर-राजनीतिक किसानों को वास्तव में यह कहते हुए पाएंगे कि कानून नुकसानदायक थे, उन्हें लागू करने में सरकार की हड़बड़ी का मतलब यह था कि उसने अधिक मुखर किसान समूहों को समझाने में पर्याप्त समय नहीं लगाया. अंतिम परिणाम यह हुआ कि उसे शर्मनाक तरीके से कानूनों को रद्द करना पड़ा.

भारत ने रेग्युलेशन के कई क्षेत्रों में बहुत अच्छा काम किया है क्योंकि इसने हर चीज के बारे में पहले गहराई से सोचा. अमेरिका और यूरोप में चल रहे बैंकिंग संकट से भारत सरकार को इस सावधानी की कीमत का पता लगना चाहिए, और इसे जल्दबाजी छोड़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए.

(संपादनः शिव पाण्डेय)
(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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