स्विमिंग पूल के पास अपनी जगह पर आराम करते हुए, वह जासूस जो बादशाह को बचाना चाहता था, उस तख्तापलट का इंतिजार कर रहा था जिसे उसी ने तैयार किया था. सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी के अधिकारी र्मिट ‘किम’ रूज़वेल्ट ने बाद में उन आखिरी दिनों और घंटों के बारे में लिखा, “जब बात करने लायक कुछ खास नहीं था, तो हमने एक और वोडका और लाइम पी, और गाइज़ एंड डॉल्स का ‘लक बी ए लेडी टुनाइट’ का रिकॉर्ड चलाया.” 16 अगस्त 1953 की सुबह रेडियो पर सैन्य संगीत बजने लगा. फिर प्राइम मिनिस्टर मोहम्मद मोसादेग की आवाज आई. किम का तख्तापलट असफल हो गया था, और सम्राट मोहम्मद रजा पहलवी देश छोड़कर पहले बगदाद और फिर रोम चले गए थे.
ईरान में कई लोगों को देश की धार्मिक सरकार को खत्म करने के लिए चलाया जा रहा कड़ा अमेरिकी-इजरायली अभियान अजीब तरह से जाना-पहचाना लगेगा. 1923 से, जब इंग्लैंड के जनरल एडमंड आयरनसाइड ने अपने शिष्य ब्रिगेडियर रजा खान को सत्ता में बैठाया, तब से साम्राज्यवादी ताकतें अपनी मर्जी से ईरान के शासकों को हटाती रही हैं.
सैनिक से सम्राट बने रजा शाह को अगस्त 1941 में ईरान से निकाल दिया गया, जब सोवियत संघ और ग्रेट ब्रिटेन ने ईरान पर कब्जा कर लिया. उन्होंने उस सेना और गुप्त पुलिस को हटा दिया, जिन पर देश की आधी से ज्यादा इनकम खर्च होती थी. पिता के निर्वासन के बाद मोहम्मद रजा पहलवी को गद्दी पर बैठाया गया. 1963 की घटनाओं में वह बाल-बाल बचे, जिसमें उन्हें सीआईए और ब्रिटिश खुफिया एजेंसी की मदद मिली.
हर बार साम्राज्यों ने सत्ता परिवर्तन की इन कार्रवाइयों को भलाई के कदम के रूप में पेश किया, जैसे वे ईरान की जनता और दुनिया की व्यवस्था की रक्षा कर रहे हों. लेकिन इससे देश की राजनीति और सार्वजनिक जीवन में तानाशाही और गहरी बैठ गई.
साम्राज्य और आतंक
ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय के रिकॉर्ड में एक बेहद गुप्त दस्तावेज में दर्ज है कि परमाणु आतंक ईरान तक कैसे पहुंचा. मौलवियों को इसकी कोई जानकारी नहीं थी. 1955 के अंत में यूनाइटेड किंगडम ने अमेरिका के साथ मिलकर योजना बनाई कि अगर सोवियत आक्रमण हुआ तो ईरान के तेल क्षेत्रों को परमाणु हथियारों से नष्ट कर दिया जाएगा. उस दस्तावेज में माना गया कि न्यूक्लियर बम के इस्तेमाल से “अपूरणीय नुकसान” होगा. इतना गंभीर कि राष्ट्रीय सरकारों से इस बारे में बात करना “फिलहाल राजनीतिक रूप से अस्वीकार्य” होगा. इसलिए सुझाव दिया गया कि ब्रिटिश और अमेरिकी कंट्रोल वाली तेल कंपनियों के साथ काम किया जाए.
विंस्टन चर्चिल की सेवाओं से, जो एक महंगे लॉबिस्ट के रूप में काम कर रहे थे, बर्मा ऑयल की सहायक कंपनी एंग्लो-पर्शियन ऑयल ने 1923 में ईरान के तेल पर विशेष अधिकार हासिल कर लिए थे. ईरान के नेताओं ने इसे विदेशी शोषण बताया और इसका विरोध किया.
विदेशी ताकतों को विशेष आर्थिक अधिकार देना ईरान में हमेशा विवाद का मुद्दा रहा. 1891 में जब राजा नासर अल-दीन शाह ने ब्रिटिश कंपनी को तंबाकू पर एकाधिकार दिया, तो बड़े स्तर पर विरोध हुआ. यह ईरानी राष्ट्रवाद के उभार का अहम पल था. 1951 में प्रधानमंत्री जनरल अली रज़मारा, जिन्हें ब्रिटिश ने चुना था, की धार्मिक कट्टरपंथी आतंकी संगठन फिदायिन-ए-इस्लाम ने हत्या कर दी. उन्होंने एंग्लो-पर्शियन ऑयल के लिए सऊदी अरब और वेनेजुएला की कंपनियों से बेहतर शर्तें तय करने की कोशिश की थी.
जनरल अली की हत्या के बाद मोसादेग की राष्ट्रवादी सरकार बनी. ईरानी सरकार ने एंग्लो-पर्शियन ऑयल का राष्ट्रीयकरण कर दिया, जिसका नाम बदलकर एंग्लो-ईरानियन ऑयल कंपनी रखा गया. ब्रिटिश सरकार इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस (ICJ) पहुंची. लेकिन अदालत ने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि ईरान की सरकार और निजी कंपनियों के बीच विवादों पर ईरान का राष्ट्रीय कानून लागू होगा.
इसके जवाब में ब्रिटेन ने ईरान के तेल पर बैन लगा दिया, जिससे वह ग्लोबल मार्केट से कट गया. 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अमेरिका ने भी कई बार ऐसे ही प्रतिबंध लगाए. ICJ में हार के बाद ब्रिटिश सीक्रेट इंटेलिजेंस सर्विस ने मोसादेग सरकार को गिराने के लिए गुप्त कार्रवाई का प्रस्ताव रखा. सीआईए के गोपनीय इतिहास के अनुसार, 1953 की गर्मियों में लारनाका में दोनों खुफिया एजेंसियों ने योजना बनाई. यह ICJ के फैसले के सिर्फ एक साल बाद था.
योजना पक्की होने के बाद सीआईए और एसआईएस ने मिलकर साजिश में शामिल लोगों को जोड़ना शुरू किया. यह कोशिश हमेशा सफल नहीं रही. सम्राट की बहन ने मिंक कोट और पैसों के बदले साथ देने की बात मानी, लेकिन वह मोहम्मद रजा को मोसादेग को हटाने वाले दस्तावेजों पर साइन कराने में सफल नहीं हो सकीं.’
नकद के बदले तख्तापलट
सीआईए का तख्तापलट असफल हो गया. ईरान की कम्युनिस्ट पार्टी तुदेह के एजेंटों ने इसकी जानकारी मोसादेग को दे दी थी. लेकिन सीआईए द्वारा दिया गया पैसा यह सुनिश्चित करता रहा कि योजना आगे बढ़ती रहे. मोसादेग द्वारा रेडियो पर आकर तख्तापलट की निंदा करने के चार दिन बाद जनरल फजलुल्लाह ज़ाहेदी ने दूसरा तख्तापलट किया. जिसमें CIA एजेंट अली जलाली और फारुग कायवानी के साथ-साथ उनके SIS काउंटरपार्ट खुसरो खान कश्काई और उनके भाई मलिक मंसूर खान ने भी मदद की. उस समय के अमेरिकी आधिकारिक इतिहास के अनुसार, इन भाइयों ने 50 लाख डॉलर लेकर ईरानी सैन्य कमांडरों का समर्थन मोसद्देक के खिलाफ सुनिश्चित किया.
गोपनीय दस्तावेजों से पता चलता है कि कुछ पैसा प्रभावशाली मौलवियों तक भी पहुंचा. एक ब्रिटिश रिपोर्ट के अनुसार, मोसादेग विरोधी अयातुल्ला मीर मुहम्मद बेहबहानी को भीड़ जुटाने के बदले सीआईए से रिश्वत मिली. अयातुल्ला अबुल-घासेम काशानी ने भी विरोध प्रदर्शनों में अहम भूमिका निभाई, हालांकि इस बात का कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है कि उन्हें भुगतान किया गया था.
ब्रिटिश स्कॉलर एलपी एलवेल-सटन ने तंज करते हुए बताया कि अमेरिका और ब्रिटेन को अपने काम पर कोई नैतिक परेशानी क्यों नहीं हुई. उन्होंने लिखा, “सच में, यह ठीक नहीं लगता था कि सम्मानित और सही पश्चिमी कूटनीति को रहस्यमय पूर्वी लोगों की हरकतों से हरा दिया जाए.” CIA हिस्टोरियन स्कॉट कोच की 1998 की एक ऑफिशियल स्टडी में पाया गया कि मोसादेग को ब्रिटिश लोग समझने लायक लगे. उन्होंने अमेरिकी डिप्लोमैट एवरेल हैरिमन से कहा, “वे जिस चीज़ को छूते हैं, उसे गंदा कर देते हैं.”
एक भयावह विरासत
ज्यादातर मामलों में ये घटनाएं पहले से बने एक ढांचे के अनुसार हुईं. 1905-1911 की डेमोक्रेटिक क्रांति से मिडिल ईस्ट में पहली कॉन्स्टिट्यूशनल सरकार बनी. इतिहासकार अली अंसारी ने लिखा है कि संवैधानिक नेताओं ने खुद को तानाशाह राजा मोहम्मद अली शाह कजर के खिलाफ बचाया. लेकिन बाद में फ्रांस, ब्रिटेन और रूस के संयुक्त प्रयास से यह नई व्यवस्था खत्म कर दी गई. उन्होंने जार की सेना के जरिए तबरीज़ पर कब्जा करवाया. इस कब्जे को लोकतंत्र की कमी और राज्य की कमजोरी के जवाब के रूप में पेश किया गया, लेकिन स्कॉलर केहान नेजाद के अनुसार इसने उन्हीं लक्ष्यों की ओर हो रही प्रगति को कमजोर कर दिया.
1941 में सोवियत संघ और ब्रिटेन द्वारा ईरान पर संयुक्त कब्जे को भी नाजी जर्मनी के खतरे से बचाने के लिए जरूरी बताया गया, जबकि वास्तव में वह खतरा असफल साबित हुआ. 1953 के तख्तापलट को सही ठहराने के लिए कम्युनिस्ट प्रभाव से बचाने का तर्क दिया गया. सीआईए को इस बात की परवाह नहीं दिखी कि जनरल जहेदी पहले नाजी जर्मनी के समर्थक रहे थे.
इसके परिणाम समझने के लिए ज्यादा कल्पना की जरूरत नहीं है. शाह के शासन में ईरान की जनता पर हुए अत्याचारों ने कई लोगों को 1979 में सत्ता में आए मौलवियों की गैर-लोकतांत्रिक और कठोर राजनीति की ओर मोड़ दिया. हालांकि मौलवी भी अपने पूर्ववर्तियों जितने ही सख्त और क्रूर साबित हुए, लेकिन उन्होंने कम से कम राष्ट्रीय संप्रभुता का एक दिखावा तो दिया.
ईरान को लेकर पश्चिम के दावों की विश्वसनीयता अब बहुत कम रह गई है, क्योंकि उसका पिछला रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा. इसमें परमाणु मुद्दों का उसका रवैया भी शामिल है. 1981 में, इज़राइल ने ओसिरक में इराक के न्यूक्लियर रिसर्च रिएक्टर पर बमबारी की थी. ब्रिटिश गोपनीय जांच से साफ हुआ कि इराक का कोई हथियार कार्यक्रम नहीं था और उसने रिएक्टर के लिए इंटरनेशनल इंस्पेक्शन की शर्तों का पालन किया था.
2002 में भी इराक से कोई खतरा नहीं था. इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी के इस फैसले को नज़रअंदाज़ कर दिया गया कि देश का न्यूक्लियर-हथियार प्रोग्राम एक दशक पहले ही खत्म कर दिया गया था.
साम्राज्यवादी सत्ता परिवर्तन के एक सदी लंबे इतिहास से ईरान के शासकों ने सीखा कि परमाणु बम जीवित रहने का अहम साधन है. बम की खोज की शुरुआत मौलवियों ने नहीं, बल्कि शाह ने की थी. 9/11 के बाद टकराव से बचने की उम्मीद में ईरान ने तालिबान और अल-कायदा के बारे में अमेरिका को खुफिया जानकारी देना शुरू किया. फिर 2003 में तेहरान ने स्विस राजनयिकों के जरिए अमेरिका से बातचीत का प्रस्ताव भेजा. बारबरा स्लाविन ने कहा, “तालिबान और सद्दाम को जल्दी हटाने के बाद घमंड में डूबी बुश सरकार ने जवाब नहीं दिया.”
इराक युद्ध और पहले के अमेरिकी सत्ता परिवर्तन के प्रयासों से सबक साफ होना चाहिए. अगर ईरान की सरकार को हटा दिया गया, तो देश की जटिल जातीय और धार्मिक संरचना टूट सकती है. इससे राज्य की सत्ता कमजोर होगी और युद्ध सरदार उभर सकते हैं. यह इजरायल या अमेरिका के लिए चिंता का विषय न हो, लेकिन इससे ईरान की जनता और पड़ोसी देशों जैसे खाड़ी के राजतंत्रों और सऊदी अरब के लिए गंभीर परिणाम होंगे.
पूर्व डिप्लोमैट नीमा जर्मनी का तर्क है, “कोई भी ईरानी सरकार, चाहे यह हो या अगली, क्रांतिकारी हो या पश्चिम समर्थक, उसे इजरायल और अमेरिका जैसे परमाणु हथियार वाले विरोधियों का सामना करना पड़ेगा, जिन्होंने एक ही साल में दो बार ईरान की जमीन पर हमला किया है.” हर युद्ध ईरान और उसकी जनता पर भारी कीमत डालेगा, लेकिन यह उसके नेताओं के लिए परमाणु हथियार पाने का मजबूत तर्क भी बनेगा.
पिछली सदी में हर शाही काम का मकसद एक आज्ञाकारी, कमज़ोर ईरान बनाना था. इसके बजाय इस पॉलिसी ने देश को राक्षसों का अड्डा बना दिया है.
प्रवीण स्वामी दिप्रिंट में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @praveenswami है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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