फरवरी 2026 कई घटनाओं और उतार-चढ़ाव से भरा रहा. कुछ अच्छी खबरें भी थीं—विकसित भारत के लिए तैयार किया गया केंद्रीय बजट और यह घोषणा कि एक साल से ज़्यादा समय तक टैरिफ को लेकर चल रही उठा-पटक के बाद, भारत और अमेरिका आखिरकार किसी तरह की सहमति पर पहुंचे हैं.
लेकिन एक मां होने के नाते, जिस खबर ने मुझे सबसे ज़्यादा झकझोर दिया, वह सीधे मेरे दिल को लगी. गाजियाबाद में तीन बहनों की तड़के सुबह हुई दर्दनाक आत्महत्या—जो एक-दूसरे को पकड़े हुए नीचे गिरीं, इस घटना ने पूरे देश को सदमे में डाल दिया. यह मेरे लिए सहन से बाहर था और यह देखना बेहद दिल तोड़ने वाला था कि इतनी कम उम्र की ज़िंदगियां बेवजह खत्म हो गईं.
जैसे-जैसे और गहरी और डरावनी जानकारियां सामने आने लगीं, मैं सोचने लगी कि तकनीक तक बिना किसी लिमिट के पहुंच और इंटरनेट की गहराई में छिपे अंधेरे किस तरह कमज़ोर दिमागों पर कहर बरपा सकते हैं.
पुलिस को मौके से मिले सुसाइड नोट्स में सामाजिक अलगाव और डिजिटल लत की एक बेहद दुखद कहानी सामने आई. पिता के मुताबिक, कोविड के समय से पिछले कुछ सालों से लड़कियां ‘लगातार लगभग हर समय’ ऑनलाइन गेम खेलती रहती थीं. पड़ोसियों ने बताया कि इन बच्चों को सोसायटी के पार्क या खुले मैदानों में खेलते शायद ही कभी देखा गया था और माना जाता था कि उन्होंने खुद को अपने कमरे तक ही सीमित कर लिया था. बताया गया है कि लड़कियां खुद को कोरिया की राजकुमारी समझने लगी थीं, भारतीय होने से खुश नहीं थीं और उन्होंने अपने लिए कोरियन्स के जैसे नाम भी रख लिए थे. धूप और शारीरिक गतिविधि की कमी के कारण उन्हें कौन-कौन सी पोषण और विटामिन की कमी रही होगी, यह अभी देखा जाना बाकी है.
इंटरनेट तक पहुंच में बढ़ोतरी
2025–2026 तक, भारत में मोबाइल इंटरनेट की औसत कीमत दुनिया में सबसे कम में से एक है. यह करीब 9 से 14 रुपये प्रति जीबी (0.12 डॉलर से भी कम) है और मेरे इलाके में तो एक कप चाय से भी सस्ती है. इंटरनेट डेटा की यह बेहद सस्ती कीमत—जो 2014 में 250 रुपये से ज्यादा थी—कड़ी प्रतिस्पर्धा, 4G/5G के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल और बहुत बड़ी यूज़र संख्या की वजह से है, जहां हर यूज़र औसतन महीने में करीब 27.5 जीबी डेटा इस्तेमाल करता है.
डेलॉइट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 तक भारत में स्मार्टफोन यूज़र्स की संख्या 1 अरब तक पहुंचने की उम्मीद है.
जनवरी में आई एक स्टडी में कुछ चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए. 16 साल से कम उम्र के बच्चों में घर पर स्मार्टफोन की पहुंच बहुत ज्यादा है; 82 प्रतिशत से ज्यादा किशोर स्मार्टफोन चलाना जानते हैं और 14–18 साल के 90 प्रतिशत ग्रामीण बच्चों के पास स्मार्टफोन की पहुंच है. स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले बच्चों का एक बड़ा हिस्सा (76 प्रतिशत से 80 प्रतिशत) इसका इस्तेमाल पढ़ाई के बजाय मनोरंजन के लिए करता है, जैसे फिल्में देखना या सोशल मीडिया चलाना.
क्या यही ‘डिजिटल इंडिया’ का सही इस्तेमाल है?
सवाल अब भी बना हुआ है कि तकनीक का इस्तेमाल पढ़ाई के लिए सबसे अच्छे तरीके से कैसे किया जाए और युवाओं को इसे एक तरह के भागने के जरिये के तौर पर इस्तेमाल करने से कैसे रोका जाए.
इंटरनेट की लत और उसके असर
मेरे ऑफिस के पास वाले पार्क में मैं अक्सर देखती हूं कि छोटे बच्चे हाथ में फोन लिए उसी में खोए रहते हैं. झूले और स्लाइड्स खाली पड़े रहते हैं. मेरे बचपन में और उसके बाद की पीढ़ियों के बचपन में, प्लेग्राउंड और मोहल्ले के पार्क बच्चों के फुटबॉल, क्रिकेट, बैडमिंटन खेलने या पकड़म-पकड़ाई जैसे खेलों की आवाज़ों से गूंजते रहते थे.
आजकल, मोहल्ले के पार्क ज़्यादातर लड़के-लड़कियों के रील बनाने की जगह बन गए हैं—जो एक और खतरनाक चलन है. कुछ साल पहले, PUBG गेम ने कई युवाओं के दिमाग पर कब्ज़ा कर लिया था और इस गेम से जुड़ी कई आत्महत्याओं की खबरें भी आई थीं.
असल में, भारत और विदेशों में शिक्षाविदों द्वारा इंटरनेट की लत से जुड़े विषय पर बड़ी संख्या में रिसर्च पेपर छपे हैं और मोबाइल फोन के बिना रहने के डर को एक मेडिकल नाम भी दिया गया है. नोमोफोबिया (नो मोबाइल फोन फोबिया) का मतलब है मोबाइल डिवाइस न होने, बैटरी खत्म हो जाने या नेटवर्क न मिलने का बेवजह डर या घबराहट. यह एक व्यवहारिक लत की तरह काम करता है, जिससे घबराहट, पसीना आना और कांपना जैसे शारीरिक या मानसिक लक्षण दिखाई देते हैं. इसका असर खास तौर पर युवा आबादी पर ज्यादा पड़ता है.
कई रिसर्च जर्नल्स के मुताबिक, इंटरनेट की लत की वजह से कई नकारात्मक मानसिक असर होते हैं, जिनमें नींद का बिगड़ना, ध्यान न लगा पाना, तनाव का बढ़ना, मूड बदलना, पढ़ाई में कमी और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं शामिल हैं. इसमें असली दुनिया में ठीक से काम न कर पाना भी शामिल है. “सलाहुद्दीन और मुअज्ज़म (2019) द्वारा की गई स्टडी में यह निष्कर्ष निकला कि जो लोग वीडियो गेम की लत का शिकार हो जाते हैं, वे अपनी असल ज़िंदगी की गतिविधियों में रुचि खो देते हैं और सिर्फ इस बात पर ध्यान देने लगते हैं कि गेम में आगे कैसे बढ़ा जाए.”
एक और स्टडी में कहा गया, “समस्या पैदा करने वाले गेमिंग से जुड़े क्लिनिकल, महामारी विज्ञान और न्यूरोबायोलॉजिकल सबूतों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए और गेमिंग इंडस्ट्री को यह समझना चाहिए कि उसके बिज़नेस मॉडल की नैतिक और सामाजिक ज़िम्मेदारियां भी हैं.”
उक्त उदाहरण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सैकड़ों अकादमिक जर्नल्स में से सिर्फ दो के अंश हैं, जो युवाओं में गेमिंग की लत के गंभीर नतीजों पर चर्चा करते हैं. यह समस्या अब हद से बाहर जाती दिख रही है.
पोर्न की लत
इंटरनेट तक बिना किसी रोक-टोक के पहुंच होने की वजह से नाबालिगों तक पोर्नोग्राफिक कंटेंट और उम्र के हिसाब से गलत कंटेंट आसानी से पहुंच रहा है. इससे हम सभी डरे और परेशान हैं.
पिछले महीने भजनपुरा में तीन किशोर लड़कों पर छह साल के एक बच्चे के साथ कथित तौर पर रेप करने का आरोप लगा! 13 साल, 14 साल और 15 साल के इन लड़कों ने यह बेहद घिनौना अपराध किया. 2024 में मद्रास हाई कोर्ट ने कहा था कि स्मार्टफोन तक आसान पहुंच की वजह से जेन Z पोर्न की लत से जूझ रही है और उन्हें इससे बाहर निकालने के लिए काउंसलिंग की ज़रूरत है. कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि 13 साल की उम्र के बच्चे भी पोर्न के आदी हो चुके हैं.
लेकिन साफ है कि इससे भी कम उम्र के बच्चे अब इसकी पहुंच में आ रहे हैं.
एआई से बने वीडियो बढ़ने के साथ-साथ ऐसे गलत और आपत्तिजनक वीडियो भी बढ़ेंगे, जिन्हें एआई तैयार करेगा और स्मार्टफोन के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से छोटे बच्चे भी उम्र के हिसाब से गलत कंटेंट आसानी से देख पाएंगे.
भारतीय पारिवारिक मूल्यों का टूटना
इंटरनेट की लत में इस खतरनाक बढ़ोतरी की वजह क्या है? क्या इसका कारण भारतीय परिवार व्यवस्था का टूटना है, जैसी वह पहले हुआ करती थी? जैसा कि एक मशहूर कहावत है, एक बच्चे को पालने में पूरा गांव लगता है और हमारी दादी-नानी के ज़माने में सच में पूरा गांव ही बच्चे की परवरिश करता था. पारंपरिक संयुक्त परिवारों में, जहां एक ही छत के नीचे कई पीढ़ियां रहती थीं, ज्ञान अपने आप आगे बढ़ता था. शास्त्र सिखाए जाते थे और धर्म जीवन का हिस्सा था. संगीत, संस्कार, प्रार्थनाएं—ये सब पारंपरिक विश्वासों और भारतीय व्यवस्थाओं का हिस्सा थे, जो परिवार को जोड़े रखते थे. इस ढांचे के केंद्र में संस्कार थे, जिनका मतलब है “गहरे मानसिक प्रभाव, मूल्य और सांस्कृतिक प्रशिक्षण”, जो इंसान के चरित्र, उसके काम और उसकी शख्सियत को गढ़ते हैं. भारतीय परंपरा में रचे-बसे संस्कार नैतिक शिक्षा, अच्छे आदतों और जीवन के अलग-अलग पड़ावों के ज़रिये इंसान को निखारने की प्रक्रिया को दर्शाते हैं, जो एक सुसंस्कृत जीवन की नींव बनते हैं.
यह साफ दिखता है कि डिजिटल लत भारतीय युवाओं के संस्कारों को कमज़ोर कर रही है. यह लत इंसानी रिश्तों को भी तोड़ रही है, जिससे पारंपरिक सामाजिक मेल-जोल की जगह वर्चुअल और कई बार असामाजिक व्यवहार ले रहा है. तेज़ी से हो रहे शहरीकरण, पारंपरिक परिवार व्यवस्था के टूटने और बढ़ते आत्म-केंद्रित व्यवहार की वजह से लोग खुद को साबित करने और मनोरंजन के लिए इंटरनेट पर ज्यादा निर्भर हो गए हैं—सिर्फ युवा ही नहीं, बल्कि बुज़ुर्ग भी. हर सार्वजनिक जगह पर अब आम नज़ारा यही है कि लोग अपनी स्क्रीन में खोए रहते हैं और आसपास की असली दुनिया से बेखबर रहते हैं.
2026 में हुए एक ऑनलाइन सर्वे में सामने आया कि 57,000 माता-पिता में से 70 प्रतिशत का मानना है कि उनके बच्चे स्क्रीन के आदी हो चुके हैं—चाहे वह ओटीटी प्लेटफॉर्म हों, सोशल मीडिया हो या ऑनलाइन गेमिंग. यहां तक कि WHO भी गेमिंग की लत को एक मानसिक बीमारी मानता है.
बच्चों के लिए फोन पर रोक
स्पेन ऐसा करने वाला सबसे नया देश है, जिसने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाने की बात कही है. वहीं फ्रांस तेज़ी से ऐसा कानून लाने की तैयारी में है, जिसमें 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बैन लगाया जाएगा और सरकार चाहती है कि यह रोक सितंबर में नए स्कूल सत्र शुरू होने से पहले लागू हो जाए. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा, “15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बैन—वैज्ञानिक यही सलाह देते हैं और फ्रांस की जनता भी बड़ी संख्या में यही चाहती है क्योंकि बच्चों के सपने एल्गोरिदम तय नहीं करने चाहिए.”
फिनलैंड अगस्त 2026 से बच्चों द्वारा स्मार्टफोन इस्तेमाल को लेकर पूरे देश में सख्त नियम लागू करेगा. इसकी वजह पढ़ाई के स्तर में गिरावट और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बढ़ती समस्याएं हैं. 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए पर्सनल स्मार्टफोन या सोशल मीडिया की इज़ाज़त नहीं होगी, और दो साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम बिल्कुल भी नहीं होगा.
ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बैन पहले ही 2026 की शुरुआत से लागू हो चुका है. बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने की जिम्मेदारी न तो बच्चों पर है और न ही उनके माता-पिता पर. बल्कि फेसबुक, स्नैपचैट, टिकटॉक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यह जिम्मेदारी डाली गई है. अगर वे बच्चों की पहुंच रोकने के लिए “उचित कदम” नहीं उठाते हैं, तो उन पर 33 मिलियन डॉलर तक का भारी जुर्माना लगाया जा सकता है. इसमें माता-पिता की अनुमति की भी कोई छूट नहीं है.
भारत को क्या करना चाहिए?
भारत ने अगस्त 2025 में ‘प्रमोशन एंड रेगुलेशन ऑफ ऑनलाइन गेमिंग एक्ट, 2025’ पास किया. इसका मकसद ई-स्पोर्ट्स और सामाजिक व शैक्षणिक खेलों को बढ़ावा देने के लिए एक राष्ट्रीय ढांचा तैयार करना था और साथ ही लत और आर्थिक जोखिम की वजह से स्किल हो या न हो—सभी तरह के ऑनलाइन रियल-मनी गेम्स (RMGs) पर रोक लगाना था. इसके तहत निगरानी के लिए एक ऑनलाइन गेमिंग अथॉरिटी बनाई गई और ऑपरेटरों व प्रमोटरों पर जुर्माने का प्रावधान किया गया. इससे पहले राज्य स्तर के नियम थे, लेकिन अब एक केंद्रीय कानून लागू किया गया.
लेकिन गाजियाबाद और भजनपुरा की घटनाओं और शिक्षाविदों द्वारा किए गए तमाम शोध को देखते हुए साफ है कि यह नियम बहुत कम और बहुत देर से आए हैं. हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि ऑनलाइन लत की वजह से पूरी की पूरी पीढ़ियां बर्बाद न हो जाएं? इसके लिए गहरी और व्यक्तिगत सोच की ज़रूरत है—सांस्कृतिक स्तर पर भी और भारतीय संस्कारों के ढांचे के भीतर भी.
हमें 21वीं सदी की इन बड़ी चुनौतियों और तेज़ी से एआई पर निर्भर होती दुनिया से निपटने के लिए अपनी 10,000 साल से ज्यादा पुरानी सभ्यतागत समझ और ज्ञान की ताकत का सहारा लेना होगा—ताकि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को बचा सकें और अपनी प्राचीन जड़ों की आत्मा को सुरक्षित रख सकें.
अगर डेटा नया तेल है, तो सोशल मीडिया और इंटरनेट आधारित मनोरंजन नया अफीम है. इसलिए नीतियों का ढांचा इस डिजिटल अफीम पर रोक लगाए—ताकि युवाओं के शोषण और उनके गलत इस्तेमाल को रोका जा सके और साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि शिक्षा तक पहुंच पर कोई रोक न लगे.
मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.
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