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पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की फाइल फोटो । कॉमन्स
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भारत के इतिहास में पहली बार धर्मनिरपेक्षता शिखर से उद्घोषित नारों तथा नेताओं और बुद्धिजीवियों की चिंताओं के दायरे से निकलकर सड़कों पर उतरे उन आम नागरिकों का युद्धघोष बन गई है जिन पर कि नरेंद्र मोदी सरकार के नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की सर्वाधिक मार पड़ने वाली है.

‘हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई, आपस में हैं भाई भाई’, ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’.

आज जब ये नारे भारत के सड़कों और गलियों में गूंज रहे हैं, और हमें सामूहिक प्रतिरोध के अतीत के पलों की याद दिला रहे हैं, तो ऐसे में इस अवसर के ऐतिहासिक महत्व को समझना हमारा दायित्व बन जाता है. भारत में इससे पहले आखिरी बार कब धार्मिक पहचान पर केंद्रित भाईचारे के नारे गूंजे थे?

प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ को शामिल किया जाना

महात्मा गांधी जब नवंबर 1947 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के अपने आखिरी सम्मेलन में पूरे राजनीतिक कौशल के साथ भाग लेने आए तो वह अल्पसंख्यकों के अधिकारों के सवालों पर लोकप्रिय जनभावनाओं के ज्वार का सामना कर रहे थे. बंटवारे की पृष्ठभूमि में गांधी ने ज़ोर देकर कहा, ‘भारत बुनियादी एकता वाला देश रहा है और आज भी है, और कांग्रेस का लक्ष्य इस महान देश को एक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में विकसित करने का रहा है, जहां सभी नागरिकों को पूरे अधिकार हों और जहां सभी को, चाहे वो किसी भी धर्म के हों, शासन का संरक्षण प्राप्त हो. संविधान सभा ने इसे संविधान का बुनियादी सिद्धांत माना है. इसलिए इसका पालन करना हर भारतीय का दायित्व है.’


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हां, गांधी ने ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द का इस्तेमाल किया था, उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि ‘भारत को हिंदुओं के बराबर ही मुसलमानों का भी देश मानना कांग्रेस की बुनियादी मान्यता’ है. अपनी प्रार्थना सभाओं में इस बात पर बल देने के कारण गांधी को काले झंडे दिखाए गए और ‘गांधी मुर्दाबाद’ के नारे लगाते युवाओं का सामना करना पड़ा, कि दिल्ली मुसलमानों का भी है और उन्हें उन शरणार्थी शिविरों से वापस लाया जाना चाहिए जहां वे डर, हिंसा और आगजनी के कारण जाने को बाध्य हुए थे. विभाजित उत्तर भारत में फैली हिंसा के बीच उनकी आवाज़ कई बार एकाकी मालूम पड़ती थी. पर, वो हमारी आकांक्षा को स्वर देती थी. एक ऐसे देश के निर्माण की आकांक्षा जहां तमाम धार्मिक समुदाय के लोग एकसमान इज्ज़त और गरिमा के साथ रह सकें. भारतीय संविधान के निर्माताओं ने इस लक्ष्य से दिशा-निर्देश प्राप्त किया था.

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लगभग तीन दशकों के बाद जब 1976 में इंदिरा गांधी 59 प्रावधानों वाले 42वें संविधान संशोधन विधेयक को संसद के दोनों सदनों से पारित करा रही थीं तो उनके विरोधियों ने उनके पास संविधान में संशोधन का अधिकार नहीं होने की बात उठाई थी. द्रविड़ मुनेत्र कड़गम की एरा सेज़ियन ने उन्हें याद दिलाया था कि वह उनके कई सहयोगियों को जेल में डाल चुकी हैं जिन्हें कि इस अहम विधेयक पर चर्चा करने का अवसर नहीं दिया गया है और उन्हें हिटलर की तरह संविधान को कमजोर करने के लिए संविधान का ही इस्तेमाल करने नहीं दिया जा सकता. बाद में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को लिखे एक निजी पत्र में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पीबी गजेंद्रगडकर ने खुलासा किया कि उन्होंने विधेयक के प्रावधानों के असाधारण महत्व को देखते हुए इंदिरा गांधी से उस पर ‘राष्ट्रीय बहस’ कराने का आग्रह किया था. कुल 59 प्रावधानों में से एक में संविधान की प्रस्तावना में ‘संप्रभु, लोकतांत्रिक गणतंत्र’ की जगह ‘संप्रभु, लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, सामाजिक गणतंत्र’ दर्ज करने की व्यवस्था थी. गजेंद्रगडकर ने इंदिरा गांधी से ये स्पष्ट करने का आग्रह किया था कि धर्मनिरपेक्ष से उनका क्या आशय है.

लोकसभा और राज्यसभा में हुई बहसों से ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द के प्रति व्यापक सकारात्मक भाव, सम्मान और लगाव की बात उभर कर सामने आई. जनसंघ, माकपा, मुस्लिम लीग, रिपब्लिकन पार्टी, डीएमके, इंदिरा गांधी की कांग्रेस तथा भारत के कोने-कोने से आने वाले तमाम जातियों, जनजातियों और धार्मिक समुदायों के प्रतिनिधि इसके पक्ष में बोले और ‘हमारे लोकतांत्रिक तत्वों की मजबूती और धर्मनिरपेक्षीकरण’ (माकपा सदस्य इंद्रजीत गुप्ता द्वारा प्रयुक्त सारगर्भित शब्द) बढ़ाने के सरकार के उद्देश्य को रेखांकित किया. इंदिरा गांधी के किए कई संशोधनों को मोरारजी देसाई की अगली सरकार ने उलट दिया, पर प्रस्तावना में किए गए संशोधन को नहीं छुआ गया. उस दौर में एक आकांक्षा के रूप में धर्मनिरपेक्षता को सचमुच की मान्यता और समर्थन प्राप्त था.

दिखावटी धर्मनिरपेक्षता

भारत की 1976 में धर्मनिरपेक्ष होने की आकांक्षा का क्या मतलब था? यह एक उचित सवाल है क्योंकि कम से कम संसद में राजनीतिक अभिजात वर्ग के स्तर पर एक आम सहमति दिखती थी कि यह एक अच्छी बात है, सचमुच में अच्छी. एक-एक कर सदस्य स्पष्ट करते रहे कि भारत में धर्मनिरपेक्षता ‘न तो ईश्वर-विरोधी थी और न ही धर्म-विरोधी’ – वास्तव में इसका मतलब था सभी धर्मों के लिए एकसमान आदर. इसलिए फारवर्ड ब्लॉक के जामबंतराव धोटे और जनसंघ के प्रकाश वीर शास्त्री जैसे कई सदस्यों ने कानून मंत्री एचआर गोखले से आग्रह किया कि संशोधित प्रस्तावना का हिंदी में अनुवाद करते समय सेक्युलर को ‘धर्मनिरपेक्ष’ या ‘निधर्मी’ के रूप में नहीं लिखा जाए (अंततः इसका अनुवाद ‘पंथनिरपेक्ष’ किया गया).


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कानून मंत्री ने जहां अधैर्य दिखाते हुए इन चिंताओं को खारिज कर दिया, वहीं संवैधानिक परिवर्तन पर कांग्रेस की कमेटी के अध्यक्ष सरदार स्वर्ण सिंह ने कहा, …‘धर्मनिरपेक्ष’ एक ऐसा शब्द है जो मुझे लगता है कि अब हमारी भारतीय भाषाओं का हिस्सा बन चुका है. आप पंजाब जाएं, गुजरात जाएं, यहां तक कि दक्षिण भारत तक में भी, जब वे अपनी भाषाओं में भाषण देते हैं तो वे हमेशा ’धर्मनिरपेक्ष’ शब्द का उपयोग करते हैं क्योंकि इसका एक निश्चित अर्थ बन गया है जो ये है कि हमारे संविधान में कानून की नजर में विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोगों की समानता होगी. … इसमें किसी भी धर्मविरोधी भावना का कोई संकेत निहित नहीं है, वास्तव में इसमें सभी धर्मों के लिए सम्मान है …’

लेकिन जब रोजगार और शिक्षा के क्षेत्र में धार्मिक अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने, या अल्पसंख्यक आयोग स्थापित करने, या हिंदू अथवा सिख धर्म से धर्मांतरित अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों के लोगों के हितों की रक्षा के लिए प्रावधान करने के वास्ते संशोधनों के पक्ष में कांग्रेस के खुर्शीद आलम ख़ान, कम्युनिस्ट भूपेश गुप्ता और इंद्रजीत गुप्ता, रिपब्लिकन पार्टी के एनएच कुम्भारे जैसे प्रमुख सांसदों ने वक्तव्य दिए तो उनका साथ देने वाले लोग बहुत कम थे. सरकार से धर्मनिरपेक्षता को परिभाषित करने और प्रस्तावना में संशोधन को अधिक स्पष्ट करने के वास्ते सुरक्षा उपायों को शामिल करने की उनकी मांग पर कांग्रेस के मंत्रियों ने उदासीनता दिखाई, ये संकेत देने की कोशिश की कि इंदिरा गांधी अल्पसंख्यकों के लिए जो भी बेहतर होगा वो करेंगी, और अंतत: मांगों को ठुकरा दिया. प्रस्तावना में संशोधन संबंधी प्रावधानों में संशोधन के हर प्रयास को नकारे जाने से स्पष्ट है कि ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़ा जाना धर्मनिरपेक्षता को लेकर महज दिखावा था.

इस बात को आज ऐसे वक्त याद रखना खास कर महत्वपूर्ण है जबकि पूरे भारत में लोग ध्यान से और लगभग ‘प्रार्थनापूर्वक’ प्रस्तावना का पाठ कर रहे हैं.

सड़कों पर संघर्ष

संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता को शामिल किए जाते वक्त आवश्यक माने गए अहम परिवर्तनों को लागू नहीं किए जाने की बात के स्मरण से हमें वर्तमान में धर्मनिरपेक्षता की आकांक्षा को दोबारा हासिल करने में मदद मिल सकती है. धर्मनिरपेक्षता से हमेशा ही बड़ी अपेक्षाएं रही हैं और यह हमेशा उन पर खरी नहीं उतरी है, अनन्वेषित और अपूर्ण ये मांग और आशाएं ही हमारे लिए इस अंतहीन सुरंग में प्रकाश की किरण साबित होंगी. एक धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए लड़ाई भारतीयों को ही लड़नी और जीतनी होगी, वो भी राजनीतिक वर्ग से व्यापक और सतत सहयोग की अपेक्षा किए बिना.

(नीती नायर वर्जीनिया विश्वविद्यालय में इतिहास की एसोसिएट प्रोफेसर हैं और वुडरो विल्सन इंटरनेशनल सेंटर फॉर स्कॉलर्स में पब्लिक पालिसी फेलो हैं. यह उनका व्यक्तिगत विचार है.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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