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Friday, 14 June, 2024
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नफरत के रास्ते पर चलकर तो भारत पाकिस्तान बन जाएगा

गांधी जी को आज केवल ‘स्वच्छता’ तक सीमित करना एक तरह की सोची समझी रणनीति है क्योंकि संघ और भाजपा को मालूम है कि महात्मा गांधी को समाज की स्मृति से पूरी तरह मिटाना संभव नहीं है.

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भारतीय भाषाओं के दो सौ से भी अधिक नामचीन लेखकों ने एक बयान जारी करके इस बात पर चिंता जताई है कि नफ़रत की राजनीति का इस्तेमाल कर देश को बांटा जा रहा है और डर फैलाया जा रहा है. इन लेखकों ने देश में मुस्लिमों के खिलाफ बनते माहौल की तरफ इशारा करते हुए कहा है कि कुछ लोगों को नागरिक के तौर पर जीने के अधिकार से वंचित करने की कोशिश हो रही है.

सांप्रदायिकता की कड़ाही पर उबलता देश

उपरोक्त बयान को हम इन लेखकों के निजी राजनीतिक विचारों से प्रेरित मान सकते थे, लेकिन हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने वर्धा में एक चुनावी रैली में भाषण करते हुए जिस तरह राहुल गांधी के केरल के वायनाड से चुनाव लड़ने के निर्णय को सांप्रदायिक रंग दिया, उससे ये लगने लगा है कि भाजपा बिना किसी संकोच या लिहाज़ के सांप्रदायिक मुद्दे उठाकर ही इस चुनावी जंग को जीतने का प्रयास करेगी.

अगर ये सच न होता तो ये कभी नहीं हो सकता था कि देश का प्रधानमंत्री ऐसी भाषा का इस्तेमाल करे जो एक तरफ तो देश के अल्पसंख्यकों के मन में असुरक्षा की भावना को बढ़ावा दे और दूसरी तरफ बहुसंख्यक हिंदुओं के मन में ये शिकायत आए कि उनको आतंकी बताया जा रहा है. जैसा कि एक अखबार ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि प्रधानमंत्री ने अपनी वर्धा रैली के भाषण में कुल 13 बार ‘हिंदू’ शब्द का प्रयोग किया जिसमें से पांच बार ‘हिंदू आतंकवाद’ शब्द का और आठ बार ‘हिंदू’ कहा.

हाल के इस प्रसंग से पहले भी प्रधानमंत्री मोदी चुनाव प्रचार के दौरान इस तरह की रणनीति अपना चुके हैं. करीब सवा साल पहले हुए गुजरात विधानसभा चुनाव-प्रचार के दौरान भी उन्होंने कुछ ऐसी बातें कहीं थीं जो उनके पद की गरिमा के अनुरूप नहीं थीं. उन्होंने अपनी खास शैली में ये आरोप लगाया था कि गुजरात चुनाव को लेकर भूतपूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मणिशंकर अय्यर के घर पर पाक उच्चायुक्त और पाकिस्तान के एक पूर्व विदेशमंत्री के साथ गुप्त बैठक हुई थी. स्वाभाविक था कि इस आरोप पर काफी हल्ला हुआ लेकिन प्रधानमंत्री ने इस पर कोई खेद नहीं जताया. चुनाव परिणाम आने के बाद अरुण जेटली ने राज्य सभा में एक ढीला- ढाला ‘स्पष्टीकरण’ दिया ताकि कांग्रेस सदन चलाने में व्यवधान उत्पन्न न करे.

बीजेपी अपनी पुरानी रंगत में क्यों लौट रही है?

सवाल ये है कि प्रधानमंत्री ने इस बार के चुनाव प्रचार में सांप्रदायिकता के इस हथियार का प्रयोग इतनी जल्दी क्यों कर लिया? इसका एक ही मुख्य कारण समझ आता है- भाजपा को अब ये नज़र आ रहा है कि हिंदी पट्टी में उसको जो बढ़त 2014 में मिली थी, उसे बनाए रखना अब असंभव है. उस संभावित नुकसान को कम करने के लिए प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी अपने तरकश में मौजूद हर अस्त्र का प्रयोग कर लेना चाहती है.

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भाजपा ने अपने पूर्व अनुभव से ये सीखा है कि नफरत की राजनीति से उसे अच्छा लाभ मिलने लगा है. कुछ समय पहले तक ऐसी स्थिति नहीं थी क्योंकि समाज में गांधी जी के नेतृत्व में लड़े गए स्वतन्त्रता संग्राम में अर्जित मूल्यों का क्षरण पूरी तरह नहीं हुआ था. ऐसा नहीं है कि अभी भी पूरी तरह उन मूल्यों का अंत हो गया हो, लेकिन कोई संगठन लगातार ये समझाता रहे कि ‘अल्पसंख्यक तुष्टीकरण’ के कारण बहुसंख्यकों के साथ अन्याय हुआ है तो कुछ असर तो होगा ही.

गांधी का विचार दर्शन आज भी जिंदा है

गांधी जी को आज केवल ‘स्वच्छता’ तक सीमित करना एक तरह की सोची-समझी रणनीति है क्योंकि संघ और भाजपा को मालूम है कि महात्मा गांधी को समाज की स्मृति से पूरी तरह मिटाना कम से कम अभी तो संभव नहीं. ऐसे में उन्हें स्वच्छता और इसी तरह के गौण विषयों तक सीमित करना संघ परिवार को रास आता है. अन्यथा गांधी जी के सांप्रदायिकता पर विचार तो ऐसे हैं कि संघ के विचारधारा के लोग उनसे विचारों के कारण ही नफरत करते हैं. नाथूराम गोडसे द्वारा गांधी जी की हत्या उस नफरत की पराकाष्ठा थी.

संघ समर्थकों में ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो गांधी जी की हत्या और उनके हत्यारे को एक विशेष दृष्टि से देखते हैं और इन दिनों काफी खुलकर अपनी बात कहते भी हैं. एक ट्विटर हैंडल जिसे @IndianInterest नाम से चलाया जाता है, उसने प्रधानमंत्री के उपरोक्त भाषण के बाद कुछ लोगों द्वारा नाथूराम गोडसे को आज़ाद भारत का पहला आतंकवादी बताए जाने पर जवाब में लिखा कि गोडसे आतंकवादी नहीं था क्योंकि उसने केवल एक व्यक्ति को मारा था और वह भी गांधी जैसे व्यक्ति को जो एक ‘देशद्रोही ब्रिटिश एजेंट’ था.

इसी ट्विटर हैंडल में एक जगह ये भी ट्वीट किया गया है कि भारत का संविधान कुछ ‘ब्रिटिश वफ़ादारों’ द्वारा लिखा गया था. भारतीय संविधान में विश्वास न रखने वाले इस हैंडल के लगभग 60 हज़ार ‘फॉलोवर्ज़’ हैं. यह संयोग नहीं है कि ये लोग वर्तमान सरकार के प्रबल समर्थक हैं.

धर्म और राज्य को अलग रखना चाहते थे गांधी

स्वतंत्रता प्राप्ति के पांच दिन बाद ही गांधी जी ने कलकत्ता में अपने एक भाषण में कहा था कि धर्म हर किसी का निजी मामला होता है और सरकार या उसके अधिकारियों को और आमजन को भी एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के निर्माण के लिए पूरे मन से काम करना चाहिए. उपरोक्त भाषण से करीब साल भर पूर्व गांधी जी ने एक ईसाई मिशनरी से बात करते हुए कहा, ‘यदि मेरे वश में हो तो धर्म और राज्य को मैं बिलकुल अलग रखूंगा’.

यह स्पष्ट है कि धर्म और राज्य को अलग रखने के मामले में अब हम बहुत पिछड़ गए हैं और अब पिछले पांच वर्षों में तो यह फिसलन बहुत बढ़ गई है. हमें कभी न कभी तो समाज के तौर पर फिर एक बार ये याद करना होगा कि अगर समाज में हिंसा के बीज बो दिये जाएं तो वो किसी एक वर्ग के खिलाफ ही नहीं रहते और एक के बाद दूसरा शिकार ढूंढ़ने लगते हैं. अपने समाज के उदाहरण आप स्वयं याद करें तो अच्छा होगा, फिलहाल अपने पड़ोसी पाकिस्तान के माध्यम से इस बात को समझें.

भारत को पाकिस्तान बन जाने से बचाने की चुनौती

जैसा कि हम सब जानते हैं, पाकिस्तान धर्म के आधार पर बना था. एक तरफ मोहम्मद अली जिन्ना और दूसरी तरफ से सावरकर जैसे लोग धर्म के आधार पर द्विराष्ट्र सिद्धान्त में विश्वास रखते थे. जिन्ना अपनी ज़िद से अंग्रेजों से मनवाने में सफल हुए और धर्म के आधार पर पाकिस्तान बन गया. नए बने पाकिस्तान में वहां छूट गए हिंदू तो विरोधी के तौर पर एकदम शक्तिविहीन हो गए तो हिंसा की प्रवृत्ति ने नए शिकार खोजने शुरू किए. वहां के बहुसंख्यकवादियों ने पहले अहमदिया मुसलमानों को अपने शिकार के तौर पर खोजा और जैसे-जैसे समय बीता, शिया मुसलमान भी उनका शिकार होने लगे.

विभाजन के समय धर्म के नाम पर अपनी धरती छोड़ कर भारत से गए मुसलमान वहां ‘मुहाजिर’ नाम से जाने गए और जल्दी ही वो भी अपने सपनों के पाकिस्तान में पराए हो गए. सिंधी मुसलमान भी पंजाबी मुसलमानों के आधिपत्य से प्रताड़ित होने लगे और इस तरह धर्म के आधार पर विभाजन खोखला साबित होने लगा. इसकी पराकाष्ठा तो तब हुई जब बंगाली मुसलमानों ने अपने शोषण से तंग आकर भारत की मदद से अपना अलग देश ही बना लिया.

इस तरह सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ नफरत और धार्मिक उन्माद की राजनीति से बने पाकिस्तान ने अपने ही धर्म में जाने कितने ही विरोधी ढूंढ़ लिए. नफरत का राक्षस है ही ऐसा कि उसकी आदत पड़ जाए तो आगे-आगे नए शिकार ढूंढ़ता ही रहता है.

यदि अल्पकालीन राजनीतिक लक्ष्यों की सिद्धि के लिए हमारे नेता समाज में एक धर्म को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करेंगे और अगर दुर्भाग्य से समाज ने इस नफरत की राजनीति को स्वीकार कर लिया तो फिर खतरा है कि देश में निरंतर विभिन्न समुदाय एक दूसरे के खिलाफ गुस्से और नफरत से भरे रहेंगे. इसी दुर्भाग्यपूर्ण संभावना को देखते हुए कुछ लोग कहते हैं कि यदि हमारे यहां भी ये नफरत फैलाने की प्रवृत्ति समय रहते न रुकी तो हम भी पाकिस्तान बन जाएंगे.

समय आ गया है कि हम गंभीरता से निश्चय करें कि हमें देश और समाज को इस फिसलन से बचाना है और लोकतंत्र, नागरिकों के लिए समानता, आपसी भाईचारा और धर्म-निरपेक्षता का जो रास्ता हमने अपने संविधान के माध्यम से चुना था, उसी रास्ते पर हमें आगे बढ़ते रहना है. विश्व इतिहास में सैकड़ों ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जो ये बताते हैं कि नफरत का रास्ता किसी भी समाज को बहुत दूर नहीं ले जाता और वह युद्ध या गृह-युद्ध की विभीषिका में ही धकेलता है.

(लेखक सरकारी प्रचार माध्यमों से जुड़े रहे हैं और आजकल स्वतंत्र पत्रकारिता करते हैं.)

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