Saturday, 20 August, 2022
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साफ बताइए कि ‘आत्मनिर्भरता’ से आपका क्या मतलब है और आप यह क्यों चाहते हैं

भारत के लिए व्यापार घाटे से बड़ी समस्या है रोजगार घाटा. रणनीतिक आत्मनिर्भरता की तलाश में इस समस्या की, और व्यावहारिकता के मसले की अनदेखी नहीं होनी चाहिए.

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कोई भी अर्थव्यवस्था ‘अपने में पर्याप्त’ द्वीप जैसी नहीं होती और आत्मनिर्भर भारत कोई स्वायत्त सत्ता नहीं हो सकती. स्वावलंबन की नेहरूवादी मुहिम के उत्कर्ष के काल में भी भारत मशीनरी से लेकर पूंजी तक और टेक्नोलॉजी से लेकर हथियार तक, यहां तक कि कलमें भी आयात करता था. देसीकरण के प्रयास कम हुए तो आयात पर निर्भरता बढ़ी. आज भी, सबसे ‘आत्मनिर्भर’ रक्षा तथा अंतरिक्ष क्षेत्र की परियोजनाओं में भी आयात का अनुपात अच्छा-खासा है. तेजस लड़ाकू विमानों में इंजिन जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी की लगी हैं, जबकि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की वेबसाइट कहती है कि उसके उपग्रहों में लगे 50-55 फीसदी पुर्जे आयातित हैं. देश के परमाणु बिजली केंद्र आयातित यूरेनियम पर बुरी तरह निर्भर हैं और बात जब तेल की आती है तो हम 80 फीसदी आयातित तेल पर निर्भर हैं.

आत्मनिर्भरता को नीति के तौर पर स्थापित करने के लिए उसे सावधानी से परिभाषित करना होगा लेकिन सरकार के मंत्री ऐसा करते नहीं नज़र आते. क्या इसका अर्थ यह है कि रणनीतिक आयातों में कमी लाई जाएगी, या रूस पर जिस तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं वैसे प्रतिबंधों का जोखिम कम होगा? इसका जवाब है, यह कई चीजों पर निर्भर करता है. एक ओर, हरित क्रांति ने 1960 के दशक में अकाल पीड़ित भारत को गेहूं देते समय अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन की ज़ोर-जबरदस्ती से बचाया.

दूसरी ओर, आत्मनिर्भरता वाली परियोजनाओं का — चाहे वह इलेक्ट्रॉनिक चिप्स हों या सोलर इनर्जी पैनल हों— मतलब है अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन से मजबूत जुड़ाव, इसलिए घरेलू उत्पादन यूनिटों का कमजोर होना क्योंकि वे प्रायः अहम आयातों पर निर्भर होती हैं. उदाहरण के लिए, पाकिस्तान चीन के सहयोग से जेएफ-17 लड़ाकू विमान बनाता है. क्या इसका अर्थ यह है कि पाकिस्तान चीन पर कुलमिलाकर निर्भर है? और, क्या रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को तब भी तरजीह दी जानी चाहिए जबकि सप्लाई में देरी होती हो? संतुलन तो बनाकर चलना ही पड़ता है.


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एक पुरानी कविता है कि किस तरह एक साम्राज्य एक कील के बिना खत्म हो गया क्योंकि वह कील उस घोड़े के पांव में लगाई जाने वाली थी जिस पर सवार होकर राजा युद्ध के लिए जाने वाला था. कील हासिल करना तो आसान है लेकिन छोटे इलेक्ट्रॉनिक चिप्स की कमी ने विशाल ऑटो सेक्टर को परेशान कर दिया है. कल को कोबाल्ट या लिथियम की कमी के कारण बैटरी का उत्पादन प्रभावित हो सकता है. आप पूरे वैल्यू चेन में खुद को सुरक्षित नहीं रख सकते. व्यापार में साझीदारों पर निर्भरता आधुनिक अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा ही है.

यह तर्क समझा जा सकता है कि भारत के अंदर सप्लायर की खोज करना उग्र चीन पर निर्भरता को कम कर सकता है. अधिकतर उत्पादों में चीन ही एकमात्र सप्लायर नहीं है, वह एक प्रतिस्पर्द्धी सप्लायर है. और व्यापारिक माल के व्यापार में भारत के पास तेल-वंचित अधिकतर देशों के मुक़ाबले सरप्लस है. माल और सेवाओं के व्यापार पर विचार करते हुए जब परिभाषा को विस्तार दिया जाता है तब देश का करंट एकाउंट डेफ़िसिट सुरक्षित सीमा में है; शुद्ध पूंजी आवक घाटे की भरपाई से ज्यादा कुछ कर सकती है. भारत में ऊर्जा की कमी और उसके लिए चीन पर निर्भरता एक समस्या है; उसे व्यापक व्यापार को लेकर कोई समस्या नहीं है.

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इसके बाद कहा जा सकता है कि उसे मैनुफैक्चरिंग में कमजोरी की समस्या का सामना करना पड़ रहा है और जरूरत घरेलू क्षमताओं का विकास करने की है. यह उत्पादकता से जुड़े प्रोत्साहन (पीएलआइ) की योजना का तर्क है. अगर पांच साल तक सालाना 50,000 करोड़ रुपये खर्च करने से देश में कई तरह की मैनुफैक्चरिंग सुविधाएं स्थापित की जा सकती हैं और इसके लिए यह छोटी कीमत होगी. खतरे ये हैं कि स्थानीय मूल्य संवर्द्धन इतना कम होगा कि वह सबसीडी को उचित नहीं ठहराएगा, आयात का विकल्प देने वाली जो लॉबी बनेगी वह सरकार से ज्यादा समय के लिए सब्सिडी वसूलेगी, और संरक्षण के लिए जो शुल्क लगाए जाएंगे वे व्यापार के उदारीकरण की दिशा को उलट देंगे. इनमें से कोई-न-कोई खतरा पहले ही उभर चुका है.

व्यापक आर्थिक जोखिम यह है कि इस तरह का उपसंहार निचले स्तर के सभी यूजरों को सप्लाइ के लिए ऊंची कीमत देनी पड़ेगी और इसलिए प्रतिस्पर्द्धा में कमी आती है, जो कि आत्मनिर्भरता का उलटा है. पिछली बार ऐसा ही हुआ था, और यह फिर से हो सकता है. ‘पीएलआइ’ की दूसरी आलोचना यह होती है कि यह पूंजीखोर सेक्टरों पर ज़ोर देता है, जिनमें से कुछ में पुराने पद जाने का खतरा बना रहता है जिसके कारण टेक्नॉलजी और साजो-सामान को निरंतर अपडेट करना जरूरी होता है. क्या यह मुमकिन है? इस बीच, श्रम-आधारित सेक्टर, जो बड़े पैमाने पर संगठित क्षेत्र में रोजगार पैदा कर सकते हैं घिसट रहे हैं. भारत जिन दो समस्याओं (व्यापार घाटा और रोजगार घाटा) का सामना कर रहा है उनमें दूसरी समस्या जाहिर तौर पर ज्यादा बड़ी है. आत्मनिर्भरता की जो तलाश की जा रही है उसमें इस पहलू और व्यावहारिकता के पहलू की अनदेखी नहीं होनी चाहिए.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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