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Sunday, 8 February, 2026
होममत-विमत'हाल मुकाम' में बेदखली: इंडिया आर्ट फेयर में मलबे से निकली लाल ईंटें और उनसे बनी एक बेचैन दुनिया

‘हाल मुकाम’ में बेदखली: इंडिया आर्ट फेयर में मलबे से निकली लाल ईंटें और उनसे बनी एक बेचैन दुनिया

इंडिया आर्ट फेयर में सबसे ज़्यादा चर्चा में रहने वाला आर्टवर्क किसी परिभाषा में नहीं बंधता—गिरजेश कुमार सिंह मलबे से निकाली गई ईंटों से लोगों और उनके बैग की मूर्तियां बनाते हैं. इस प्रदर्शनी का नाम 'हाल मुकाम' है.

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इस साल नई दिल्ली में इंडिया आर्ट फेयर में मलबे से निकाली गई लाल ईंटों से पूरी तरह बनाई गई एक दमदार आर्ट इंस्टॉलेशन लोगों के बीच चर्चा का बड़ा विषय बनी हुई है.

यह कलाकार गिरिजेश कुमार सिंह की तीखी लेकिन बेहद सहज टिप्पणी है, जो हमारे समय की उस बेचैनी को दिखाती है, जिसमें लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर होते हैं या उन्हें बेदखल कर दिया जाता है. इस प्रदर्शनी का नाम है ‘हाल मुकाम’ यानी ‘करंट लोकेशन’.

प्रदर्शनी देखने आए लोगों के बीच ईंटों से बनी इन मूर्तियों को लेकर कई सवाल घूमते रहते हैं. क्या यह दुनिया भर में इमिग्रेशन संकट और उससे जुड़ी राजनीतिक बेचैनी पर सवाल उठाती है. क्या यह गाजा में बेघर होने और तबाही की कहानी है. या फिर यह भारत में बुलडोजर से हो रही तोड़फोड़ की ओर इशारा करती है.

Artist Girjesh Kumar Singh stands in front of his work. | Rama Lakshmi | ThePrint
कलाकार गिरजेश कुमार सिंह अपने काम के सामने खड़े हैं। | रमा लक्ष्मी | दिप्रिंट

प्रदर्शनी में बनी हर आकृति ईंटों पर लेटी हुई, ईंटों के सहारे टिकी हुई, ईंटों के बीच बैठी हुई या ईंटों के भीतर दिखाई देती है. पुरुष और महिलाएं अपने बैकपैक, गठरी, सामान और सूटकेस को पकड़े हुए, सीने से लगाए हुए या उन पर झुके हुए नजर आते हैं. हर कृति में हताशा की झलक है, मंजिल तक पहुंचने की अनिश्चितता है और अचानक, खतरनाक सफर और विस्थापन से पैदा हुआ नुकसान साफ महसूस होता है. बैग इतने ज्यादा शरीर से जुड़े हुए दिखते हैं कि उन्हें सफर में चल रहे इंसानों के शरीर का ही हिस्सा बना दिया गया है.

‘इन ट्रांजिट’ नाम की एक कृति में एक दाढ़ी वाला आदमी ईंटों के ढेर पर लेटा हुआ है, जो अपने बैकपैक को कसकर पकड़े हुए है और उसके पैरों के बीच एक सूटकेस फंसा हुआ है. एक दूसरी ईंट की आकृति ईंटों की दीवार में चुभी हुई खड़ी है, जिसके सीने से बेबी बैग चिपका हुआ है. अलग-अलग तरह के बैग और सामान का एक बड़ा ढेर भी दिखता है, जो पूरी तरह लाल ईंटों से बना है. इसके अलावा ईंट पर बनी एक बहुत छोटी सी जगह में बंद कई छोटी आकृतियों की एक श्रृंखला है, जो अपने बैग से जुड़ी हुई हैं.

“ये सारी ईंटें उन टूटे हुए घरों और ढांचों से ली गई हैं, जिन्हें मैं शहर में देखता हूं,” सिंह ने बताया. सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ था और अब वे वडोदरा में अपने स्टूडियो से काम करते हैं. ईंटें काफी समय से उनकी सभी मूर्तियों का मुख्य माध्यम और पहचान बनी हुई हैं.

“ये ईंटें कभी किसी बसे हुए स्थान का हिस्सा थीं. ये एक जीवन और एक पहचान को बनाती थीं. लेकिन तोड़फोड़ के बाद ये बिखर जाती हैं. मैं जाकर इन्हें इकट्ठा करता हूं. यह बहुत हद तक उन लोगों जैसा है, जिन्हें मजबूरी में जगह छोड़नी पड़ती है. उनका भी कभी एक पूरा जीवन था. सफर के दौरान वे अपना पुराना जीवन और उसका नुकसान, दोनों साथ लेकर चलते हैं. इसलिए एक तरह से वे कभी पूरी तरह जाते ही नहीं हैं, आप समझते हैं. लोग मेरे काम में कई तरह के मतलब निकालना पसंद करते हैं.”

A series of figurines confined in a tiny space on a brick, attached to their bags. | Rama Lakshmi | ThePrint
एक ईंट पर छोटी सी जगह में बंद मूर्तियों की एक सीरीज़, जो अपने बैग से जुड़ी हुई हैं | रमा लक्ष्मी | दिप्रिंट

‘हाल मुकाम’ की सभी कलाकृतियों के लिए इस्तेमाल की गई ईंटें वडोदरा के पुराने रेलवे स्टेशन की टूटी हुई दीवारों के अवशेषों से ली गई थीं, जिसे उस समय के महाराजा गायकवाड़ ने बनवाया था. “मैं पहचान और माइग्रेशन से जुड़े सवालों पर काम करता रहा हूं,” उन्होंने उस समय कहा था.

इंडिया आर्ट फेयर में लगी इस प्रदर्शनी में लाल ईंटों से बने छोटे-छोटे मेहराबदार दरवाजों की एक श्रृंखला भी शामिल है. “ये वे दरवाजे हैं, जो आपको बाहर जाने देते हैं,” उन्होंने कहा.

जानबूझकर अस्पष्ट

सिंह की दिखने में सख्त और झकझोर देने वाली मूर्तियां आर्ट फेयर में मुंबई की रुख़शान आर्ट गैलरी द्वारा पेश की गई हैं और ये युवा दर्शकों के लिए सोशल मीडिया रील्स का बड़ा आकर्षण बनी हुई हैं. कई लोग उनसे साफ जवाब और संकेत निकालने की कोशिश करते हैं.

वे धैर्य के साथ दर्शकों को अपनी कलाकृतियों के बारे में बताते हैं, लेकिन अपनी कला की रणनीति को परिभाषित करने या उसे किसी खास समय या राजनीति से जोड़ने से बचते हैं. उनका कहना है कि वे चाहते हैं कि लोग इन कृतियों को इंसानी आवाजाही के रूप में देखें, चाहे वह अपनी मर्जी से हो या मजबूरी में. उनके मुताबिक, जिसे हम ‘चुनाव’ कहते हैं, वह भी आखिरकार एक तरह की बातचीत और समझौता ही होता है.

ये कृतियां एक तरह का ठहराव हैं—आने और जाने के बीच के पल. मूर्तियों में ईंटें और लोग, दोनों ही अस्थायी होने की भावना को तेज़ी से सामने रखते हैं.

‘These are the doors that let you leave,’ said Singh. | Rama Lakshmi | ThePrint
सिंह ने कहा, ‘ये वो दरवाज़े हैं जिनसे आप बाहर निकल सकते हैं।’ | रमा लक्ष्मी | दिप्रिंट

“कोई भी यात्रा सामान के बिना नहीं होती, चाहे वह असली हो या रूपक. हम अपने साथ पहचान, इतिहास, विश्वास प्रणालियां और यादें लेकर चलते हैं,” क्यूरेटोरियल टेक्स्ट पैनल में लिखा है. “टूटने के क्षणों में भी—जब हम बिखर जाते हैं, बेघर हो जाते हैं, बाहर कर दिए जाते हैं—यह सामान बना रहता है…बीते समय का बोझ उठाए टूटी हुई दीवारों की तरह, टुकड़े भी अर्थ संभाले रखते हैं. ये कृतियां इसी जिजीविषा को दिखाती हैं.”

इसने मुझे एक और कला-कृति की याद दिला दी.

कुछ साल पहले, जब यूरोप में शरणार्थी संकट उफान पर था और मुस्लिम प्रवासियों को लेकर चिंता और इस्लामोफोबिया फैल रहा था, तब इस्तांबुल की तकसीम कुमहुरियत सानत गैलरिसी में लिज़ी मेरल की एक शानदार आर्ट इंस्टॉलेशन पर मेरी नजर पड़ी थी. यह रंग-बिरंगे हेडस्कार्फ से बने सफर वाले कपड़े के गठरों का एक विशाल ढेर था.

उसका नाम था ‘बंडल’.

Bundle by Lizzy Mayrl | Rama Lakshmi | ThePrint
लिज़ी मेरल द्वारा बंडल | रमा लक्ष्मी | दिप्रिंट

रमा लक्ष्मी, जो एक म्यूज़ियोलॉजिस्ट और ओरल हिस्टोरियन हैं, दिप्रिंट की ओपिनियन और ग्राउंड रिपोर्ट्स एडिटर हैं. स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन और मिसौरी हिस्ट्री म्यूज़ियम के साथ काम करने के बाद, उन्होंने भोपाल गैस त्रासदी की याद में ‘रिमेंबर भोपाल म्यूज़ियम’ बनाया. उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिसौरी, सेंट लुइस से म्यूज़ियम स्टडीज़ और अफ्रीकन अमेरिकन सिविल राइट्स मूवमेंट में ग्रेजुएट प्रोग्राम किया है. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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