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Thursday, 18 July, 2024
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अरविंद केजरीवाल जिस दौर से गुजर रहे हैं उसमें हर पार्टी दोषी है, इसे अलग करके न देखें

अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी का समय आप के इस आरोप को बल देता है कि भाजपा अपने चुनावी विरोधियों के खिलाफ केंद्र सरकार की एजेंसियों का इस्तेमाल कर रही है.

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हो सकता है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दिल्ली एक्साइड पॉलिसी घोटाले में शामिल रहे हों और हो सकता है न रहे हों, और उन्हें फंसाया गया हो. हो सकता है कि सरकार सच कह रही हो कि AAP ने घोटाले से बड़े पैमाने पर लाभ कमाया और फिर उस पैसे को गोवा चुनाव के लिए अपने कैंपेन पर पैसा खर्च किया. या हो सकता है कि आप सही कह रही हो कि केंद्र सरकार विपक्षी दल को कमजोर करने के लिए एक्साइज़ पॉलिसी मामले का उपयोग कर रही है, जबकि वास्तव में ऐसा कोई घोटाला नहीं हुआ था.

मुझ सचमुच नहीं पता. क्या आपको पता है? और क्या हममें से कोई बता सकता है कि सच्चाई क्या है जब तक कि अदालत सबूतों के आधार पर कोई फैसला नहीं देती?

हालांकि, अदालत अंततः जो भी निर्णय लेती है, उसके बावजूद कुछ बातें कही जानी ज़रूरी हैं.

सबसे पहले, भारतीय लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांत जो हम सभी को स्कूल में सिखाए गए थे, अब उनका पालन नहीं करते हैं. यह कहावत, जो अधिकांश उदार लोकतंत्रों में आम है, कि एक नागरिक दोषी साबित होने तक निर्दोष है, अब केवल पुराने जमाने की लगती है और किसी भी तरह से हमारे कानूनी सिस्टम के लिए आवश्यक नहीं है. लेकिन जैसा कि जस्टिस कृष्णा अय्यर ने कहा था कि ‘नियमतः जमानत दिया जाता है, जेल अपवाद है’, वह अब थोड़ी पुरानी बात लगती है.

स्पष्ट रूप से दृढ़ता से स्थापित ये सिद्धांत अब क्यों लागू नहीं होते? खैर, क्योंकि भारतीय सरकारों ने लगातार कानून पारित किए हैं (या उनमें संशोधन किया है) ताकि इन सिद्धांतों को सुरक्षित रूप से नजरअंदाज किया जा सके.

UPA, PMLA और कांग्रेस

अक्सर, कानूनों या संशोधनों को पारित करने के लिए अति सक्रियता एक वास्तविक चिंता थी: गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, जिसे यूएपीए के रूप में जाना जाता है, 1967 में पारित प्रारंभिक संस्करण को अपडेट करता है, लेकिन आतंकवाद से चुनौतियां बढ़ने के साथ ही इसे नियमित रूप से बार-बार संशोधित किया गया है. संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार ने 2008 और 2012 में इस अधिनियम को मजबूत किया और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने 2019 में एक बार फिर इसमें संशोधन किया ताकि पुलिसकर्मियों को किसी भी न्यायिक प्रक्रिया की परवाह किए बिना व्यक्तियों को आतंकवादी के रूप में नामित करने की व्यापक शक्तियां मिल सकें.

इसी तरह, मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) को 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा अधिनियमित किया गया था, लेकिन 2005, 2009 और 2014 में यूपीए सरकार द्वारा इसमें काफी संशोधन किया गया था. जबकि कानून को लाने के पीछे का मूल कारण मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ एक वैश्विक कैंपेन था. नशीली दवाओं के कारोबार और माफिया गतिविधियों जैसे अपराधों की आय के मामले में, कानून की व्याख्या इसके भारतीय स्वरूप में लगभग हर चीज को कवर करने के लिए की गई है.

यदि अभियोजन पक्ष दृढ़ता से इसका विरोध करता है तो यह अधिनियम अदालत के लिए जमानत देना कठिन (यदि लगभग असंभव नहीं) बना देता है. यह सबूत का बोझ आरोपी पर डाल देता है और जांच अधिकारियों को दिए गए बयानों को अदालत में स्वीकार्य मानता है. आम तौर पर, पुलिस को दिए गए बयान अस्वीकार्य होते हैं. जब तक कोई न्यायाधीश यह नहीं मानता कि सबूत पूरी तरह से अपर्याप्त है (जिस पर जमानत के चरण में निर्णय लेना कठिन है, और अधिकांश न्यायाधीश मामले में इतनी जल्दी निष्कर्ष निकालने के लिए अनिच्छुक हैं), तब तक नियमित रूप से जमानत देने से इनकार कर दिया जाता है.

विपक्ष का कहना है कि बीजेपी सरकार यूएपीए और पीएमएलए दोनों का दुरुपयोग कर रही है, जो सच हो भी सकता है. लेकिन यह कांग्रेस ही थी जिसने सत्ता में रहते हुए इन कानूनों में कुछ सबसे कड़े खंड पारित किए. इसलिए, जब इन अधिनियमों का उपयोग राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ किया जाता है, तो हमें यह दिखावा नहीं करना चाहिए कि नरेंद्र मोदी सरकार ने जादुई तरीके से इसमें ला के डाल दिया है. अधिकांश पहले से ही इसमें शामिल थे.

केजरीवाल की गिरफ्तारी पर जनता की नजर

फिर भी, मुझे नहीं लगता कि चुनाव नजदीक आते ही भाजपा केजरीवाल और अन्य लोगों के साथ जो कर रही है, उसकी कोई मिसाल है. बहस के लिए मान लीजिए कि केजरीवाल वास्तव में शराब घोटाले में शामिल हैं. उनके भागने का खतरा नहीं है. यदि वह साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करना चाहते, तो उनके पास ऐसा करने के लिए काफी समय था; शराब घोटाले में गिरफ्तारियां महीनों-महीनों से चल रही हैं.

केजरीवाल को चुनाव के बाद भी आसानी से गिरफ्तार किया जा सकता था. अभी उन्हें जेल क्यों भेजना? इससे आप के इस आरोप को बल मिलता है कि भाजपा अपने चुनावी विरोधियों के खिलाफ केंद्र सरकार की एजेंसियों का इस्तेमाल कर रही है.

यह कोई अलग दृष्टिकोण नहीं है. जब, इंडिया टुडे मूड ऑफ द नेशन पोल 2021 में लोगों से पूछा गया कि क्या भाजपा सरकार केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है, तो उनमें से 32 प्रतिशत ने हां कहा. हाल ही में देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में यह आंकड़ा बढ़कर 46 प्रतिशत हो गया था. (37 प्रतिशत ने नहीं कहा और 17 प्रतिशत की कोई राय नहीं थी).

हालांकि, यहां मूल बात यह है कि इससे मतदाताओं पर कोई फर्क नहीं पड़ता. उसी मूड ऑफ द नेशन पोल में मोदी और भाजपा के लिए भारी बहुमत की भविष्यवाणी की गई. इसलिए, एक सरकार जो ऐसे कानूनों का उपयोग करना चाहती है जो उसे लोगों को दोषी ठहराने के लिए पहले पर्याप्त सबूत इकट्ठा करने की परेशानी के बिना उन्हें कैद करने की अनुमति देता है, उसके लिए यह आसान है: पिछली सरकारें पहले ही कानून पारित कर चुकी हैं और मतदाताओं को कोई आपत्ति नहीं है.

इससे बड़ा सवाल उठता है: मतदाताओं को आपत्ति क्यों नहीं है?

शायद आप केजरीवाल से पूछकर शुरुआत कर सकते हैं. जब उन्होंने इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन (अन्ना हजारे के साथ अग्रणी व्यक्ति के रूप में) चलाया, तो कथित सरकारी भ्रष्टाचार पर उन्माद पैदा करके उन्हें काफी प्रसिद्धि मिल गई. उन्होंने कहा, यूपीए पूरी तरह से भ्रष्ट है और लोगों को भ्रष्ट राजनेताओं के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी. भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए नये कानूनों की जरूरत थी. सरकार ने केजरीवाल और उनके साथियों द्वारा तैयार किए गए लोकपाल विधेयक को क्यों नहीं अपनाया?

लोगों ने केजरीवाल पर इस हद तक विश्वास किया कि उन्होंने और इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने कमोबेश कांग्रेस को खत्म कर दिया और मोदी के लिए सत्ता पर काबिज़ होने का रास्ता साफ कर दिया. ऐसा नहीं है कि केजरीवाल ने खुद इसमें कोई ख़राब प्रदर्शन किया हो. उन्होंने दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के नेता के रूप में जीत हासिल के बाद अन्ना हजारे और उनके इंडिया अगेंस्ट करप्शन के अधिकांश साथियों को छोड़ दिया. यह पार्टी उनके तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से उभरी थी. पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर उनके निरंतर हमलों के साथ-साथ आप के सनसनीखेज आरोपों के कारण उन्हें अपनी सीट गंवानी पड़ी और उनकी साख को भी ठेस लगी.

केजरीवाल के आरोपों में से बहुत कम, यदि कोई हों, कभी भी प्रमाणित किए गए. मोदी ने केजरीवाल के भ्रष्टाचार विरोधी कैंपेन का पूरा फायदा उठाया, उनके आरोपों को दोहराया और एक साफ-सुथरी सरकार देने का वादा किया. हालांकि, एक बार उनके निर्वाचित होने के बाद, भाजपा ने इन आरोपों पर कार्रवाई करने के लिए बहुत कुछ नहीं किया, और उस युग का सबसे बड़ा ‘घोटाला’ – 2 जी घोटाला – मोदी सरकार द्वारा मामले में एक भी दोषसिद्धि प्राप्त करने में विफल रहने के बाद ख़त्म हो गया. यहां तक कि केजरीवाल ने भी अपने आरोपों को साबित करने के लिए बहुत कुछ नहीं किया, जब उनका उद्देश्य पूरा हो गया और आप ने दिल्ली में जीत हासिल कर ली. लेकिन यह धारणा मजबूत हुई कि सभी राजनेता भ्रष्ट है. अगर नेताओं को बिना किसी अपराध के दोषी ठहराए जेल में डाल दिया जाए तो लोगों को अब कोई खास फर्क नहीं पड़ता. जनता का मानना है: वे इसके लायक हैं क्योंकि ‘सब चोर हैं.’

मेरा कहना यह नहीं है कि केजरीवाल खुद उसी गड्ढे में गिर गए जिसे वह किसी और के लिए खोद रहे थे या खुद इतने सारे बेबुनियाद आरोप लगाने के बाद, वह शायद ही इस बात की शिकायत कर सकते हैं, जब वही रणनीति उनके खिलाफ इस्तेमाल की जा रही है, क्योंकि कर्म सिद्धांत का यहीं नियम है.

मेरी बात इससे कहीं ज्यादा व्यापक है. मुझे नहीं लगता कि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार जिस तरह से विपक्ष के साथ व्यवहार कर रही है, उसका कोई भी समझदार व्यक्ति समर्थन कर सकता है. न ही यह भारत के नागरिकों के अधिकारों के लिए अच्छी बात है, जब इतने सारे कानून अधिकारियों को जमानत की वास्तविक उम्मीद के बिना लोगों को जेल भेजने की इजाजत देते हैं: और यह लोगों पर भी उतना ही लागू होता है जितना कि AAP नेताओं पर, जिन्होंने महीनों जेल में बिताए हैं. गौरतलब है कि सरकार को इस सप्ताह AAP नेता संजय सिंह की जमानत पर अपनी आपत्तियां तुरंत छोड़नी पड़ीं, जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसे इस बात का कोई सबूत नहीं मिला कि वह दोषी थे.

लेकिन—और यह महत्वपूर्ण बात है—अभी जो हो रहा है उसे अलग से देखने की गलती न करें. यह उस प्रक्रिया का परिणाम है जो बहुत समय पहले शुरू हुई थी और इसके लिए हर राजनीतिक दल दोषी है. विशेष रूप से, कांग्रेस दमनकारी कानूनों और संशोधनों को क़ानून की किताबों में डालने की अपनी ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकती.

और जब भ्रष्टाचार के निराधार और गैर-जिम्मेदाराना आरोपों की बात आती है, तो केजरीवाल दुनिया के निर्विवाद चैंपियन हो सकते हैं.

(वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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