Saturday, 2 July, 2022
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द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनना सावरकरवादी हिंदुत्व की जीत है

द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनना बीजेपी की कार्य योजना के तहत ही है. बीजेपी और आरएसएस की ये दो रणनीतियां मिलकर एक विशाल तंत्र बनाती हैं, जिनका संचालक एकीकृत रूप से एक हेडक्वार्टर करता है, जो दरअसल आरएसएस का हेडक्वार्टर है.

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बीजेपी अगर भारत को पहली आदिवासी राष्ट्रपति देती है, जो अब लगभग तय है, तो ये विनायक दामोदर सावरकर की हिंदुत्व विचारधारा की एक बड़ी जीत होगी. कुछ विश्लेषक ये कह रहे हैं कि बीजेपी ने वंचित समुदायों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है. लेकिन ये पूरी तस्वीर का एक पहलू है. दरअसल ये हिंदुत्व की विचारधारा को आगे बढ़ाने के आरएसएस और बीजेपी के प्रोजेक्ट का भी एक महत्वपूर्ण कदम है.

भारतीय संविधान राजसत्ता के शिखर पर राष्ट्रपति को बेशक बिठाता है, पर वास्तविक कार्यकारी शक्तियां प्रधानमंत्री के पास होती हैं, जो लोकसभा के बहुमत का समर्थन हासिल होने तक पद पर रहता है. नरेंद्र मोदी बंपर बहुमत के साथ इस पद पर हैं और उनकी सत्ता को दूर-दूर तक कोई चुनौती मिलती नहीं दिखती. इसके बावजूद बीजेपी ने बहुत सोच-समझ कर और बेहद रणनीतिक तरीके से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुना है.

इसकी एक वजह तो बेहद स्पष्ट है और इसके बारे में सभी बात कर रहे हैं. वो ये कि मुर्मू आदिवासी संथाल समुदाय से हैं. ऐसा करके बीजेपी ने आदिवासियों के साथ तार जोड़ने और उसे मजबूत करने की कोशिश की है. जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस फैसले के बाद लिखा भी कि द्रौपदी मुर्मू “गरीबों, दबे-कुचले लोगों और खास तौर पर हाशिए के लोगों के सशक्तिकरण के लिए सक्रिय रही हैं.”

दरअसल, बीजेपी ने द्रौपदी मुर्मू को ऐसे समय में राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है, जब कई आदिवासी संगठन और नेता ये मांग कर रहे है कि जनगणना में आदिवासियों को हिंदुओं से अलग गिना जाए. साथ ही कई आदिवासी संगठन ये मांग कर रहे हैं कि चूंकि उनकी धार्मिक परंपराएं अलग हैं, इसलिए उन पर हिंदू कोड नहीं, बल्कि सरना कोड लागू हो. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पिछले साल हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक कॉन्फ्रेंस में कहा था कि “आदिवासी कभी हिंदू नहीं थे. वे प्रकृति के उपासक हैं, इसलिए उन्हें मूलनिवासी या इंडीजीनस कहा जाता है.” उस समय बीजेपी के कई नेताओं ने इस बयान पर आपत्ति जताई थी.

आदिवासियों की हिंदुओं से अलग पहचान की चाहत आरएसएस के लिए परेशानी की वजह है. आरएसएस को लगता है कि आदिवासियों के बीच पनप रही ऐसी प्रवृत्तियों को रोकना जरूरी है, वरना हिंदुओं का बहुसंख्यक होना खतरे में पड़ सकता है. बीजेपी और आरएसएस आदिवासियों को हिंदू खेमे में देखना चाहते हैं. ऐसी स्थिति में हिंदुत्व के प्रति भक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन करने वाली द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाकर आरएसएस-बीजेपी ने आदिवासियों को सही संदेश देने की कोशिश की है. ये संदेश उन आदिवासियों के लिए भी है, जिन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया है.

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आरएसएस का हिंदुत्व और आदिवासी

ईसाई मिशनरियों की आदिवासी अंचलों में सक्रियता काफी पुरानी है. 19वीं सदी के शुरुआती वर्षों से ही आदिवासी बहुल इलाकों में ईसाई धर्म का विस्तार हुआ. खासकर पूर्वोत्तर के राज्य जैसे नागालैंड, मिजोरम और मेघालय में तो ईसाई बहुसंख्यक हैं. आरएसएस पूर्वोत्तर में जनसंख्या की संरचना में आए इस बदलाव को हिंदुत्व और भारत दोनों के लिए खतरा बताता रहा है. आरएसएस नहीं चाहता है कि मध्य भारत के आदिवासी इलाकों में कभी ये स्थिति आए. वैसे, सदियों की कोशिशों के बावजूद मध्य भारत के आदिवासियों के बीच ईसाई मिशनरियों को धर्म प्रचार में खास सफलता नहीं मिली है. इन इलाकों में सिर्फ झारखंड में उन्हें पैर टिकाने की जमीन मिली है, लेकिन वहां भी ईसाई आबादी 4.3 प्रतिशत ही है. छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में आदिवासियों की अच्छी संख्या है, पर यहां ईसाई धर्म का प्रचार आदिवासियों के बीच कम ही है.

इसके बावजूद आरएसएस को लगता है कि यहां ईसाई धर्म फैल सकता है. इसलिए वह वनवासी कल्याण आश्रम और ऐसे ही कई संगठनों के जरिए हिंदू धर्म के प्रचार प्रसार में यहां सक्रिय है. यहां वे शिक्षा और समाज कल्याण की कई गतिविधियों के जरिए आदिवासियों के बीच पहुंचते हैं. मिसाल के तौर पर, समाज विज्ञानी प्रोफेसर बद्री नारायण ने एक लेख में बताया है कि “हिंदुओं और आदिवासियों के बीच तारतम्य बनाने के लिए हिंदू मंदिरों के अंदर आदिवासी देवताओं को रखा जाता है.” दरअसल आरएसएस को पता है कि जो आदिवासी ईसाई नहीं बने हैं, उनमें भी हिंदुओं जैसा ज्यादा कुछ है नहीं. उन्हें हिंदू खेमे के अंदर लाना एक बड़ा प्रकल्प है. एक आदिवासी महिला को बीजेपी अगर राष्ट्रपति बना पाती है तो आरएसएस के इस प्रकल्प को बल मिलेगा.

विपक्ष की बेढंगी चाल

आरएसएस और बीजेपी प्रतीकवाद का खेल लंबे समय तक खेल रही है और राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुनने या समर्थन देने में भी वह प्रतीकवाद को सामने रखती है. मिसाल के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी के शासन काल में चूंकि बीजेपी का अपना बहुमत नहीं था और उसे कुछ सेक्युलर दलों का भी समर्थन लेना पड़ा, इसलिए उसने एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर सेक्युलर दलों को सही संदेश दिया. इससे पहले, जब के.आर. नारायणन का नाम राष्ट्रपति के लिए सामने आया था तो बीजेपी ने समर्थन करके इतिहास की धारा के साथ रहने का फैसला किया. नरेंद्र मोदी के शासनकाल में रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाना भी एक सुचिंतित फैसला था. बीजेपी को इसका कितना राजनीतिक लाभ मिला इसका आकलन कर पाना संभव नहीं है. लेकिन ये तय है कि बीजेपी ने इसके जरिए खासकर यूपी में अनुसूचित जाति के मतदाताओं को सही संदेश देने की कोशिश जरूर की.

इसके मुकाबले विपक्षी दलों की राष्ट्रपति पद के लिए पसंद बेहद बेतुकी रही और ये हड़बड़ी और अफरातरी में लिया गया फैसला था. यशवंत सिन्हा का नाम तब सामने आया जब इसके लिए शरद पवार, फारुख अब्दुल्ला और गोपाल कृष्ण गांधी मना कर चुके थे. यशवंत सिन्हा की प्राथमिक पहचान बीजेपी नेता के तौर पर थी. 2018 तक वे बीजेपी में ही थे. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वे पूरे समय तक केंद्रीय मंत्री रहे. 2014 तक वे हजारीबाग के बीजेपी के सांसद थे. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने इस सीट पर उनके बेटे जयंत सिन्हा को उम्मीदवार बनाया और 2019 में उन्हें दोबारा ये सीट दी गई. बीजेपी से यशवंत सिन्हा की दूरी विचारधारा से कहीं ज्यादा महत्वाकांक्षा का मामला है. जाहिर है यशवंत सिन्हा को उम्मीदवार बनाकर विपक्ष ने बीजेपी के सामने कोई विचारधारात्मक या राजनीतिक चुनौती नहीं पेश की है.

ऐसा लगता है कि बीजेपी ने सत्ता संरचना में कर्म विभाजन किया है. राजनीतिक सत्ता में वो एससी, एसटी, आदिवासी और अन्य वंचित सामाजिक समूहों को हिस्सेदारी देती है. इसलिए बीजेपी की सरकारों में अच्छी संख्या में इन तबकों के मंत्री, गवर्नर, सांसद, विधायक आदि बने हैं. लेकिन सत्ता संरचना के अन्य अंगों जैसे नौकरशाही, पीएमओ, कुछ खास कैबिनेट पद, पीएसयू और बैंकों के प्रमुख, रेगुलेटरी संस्थाओं के संचालक, एकेडेमिक्स आदि में वह अपने कोर वोट बैंक यानी सवर्ण हिंदुओं का ध्यान रखती है. द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनना बीजेपी की कार्य योजना के तहत ही है. बीजेपी और आरएसएस की ये दो रणनीतियां मिलकर एक विशाल तंत्र बनाती हैं, जिनका संचालक एकीकृत रूप से एक हेडक्वार्टर करता है, जो दरअसल आरएसएस का हेडक्वार्टर है.

(लेखक पहले इंडिया टुडे हिंदी पत्रिका में मैनेजिंग एडिटर रह चुके हैं और इन्होंने मीडिया और सोशियोलॉजी पर किताबें भी लिखी हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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