Sunday, 26 June, 2022
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द्रौपदी मुर्मू : NDA की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार, एक पूर्व प्रोफेसर और झारखंड के राज्यपाल के रूप में कमान संभाल चुकी हैं

ओडिशा की मूल निवासी द्रौपदी मुर्मू को आदिवासियों की सच्ची पैरोकार कहा जाता है. 64 साल की उम्र में उन्होंने अपने दो बेटों को खोने समेत कई व्यक्तिगत त्रासदियों का सामना किया है.

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नई दिल्ली: झारखंड की पूर्व राज्यपाल 64 साल की द्रौपदी मुर्मू को जमीन से जुड़े रहने, आदिवासी अधिकारों का समर्थन करने, प्रशासनिक कौशल, आध्यात्मिकता और विनम्रता जैसी कई खासियतों के लिए जाना जाता है.

एनडीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में और भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन के पक्ष में पर्याप्त संख्या होने पर उन्हें जल्द ही भारत की पहली आदिवासी राष्ट्रपति के रूप में भी जाना जा सकता है.

जिन लोगों ने मुर्मू के साथ काम किया है और जो उन्हें जानते हैं, वे उनके बारे में बड़ी ही गर्मजोशी से बात करते हैं. वे उन्हें एक ऐसी मजबूत शख्सियत बताते हैं जो ‘कभी रबर-स्टाम्प गवर्नर नहीं थी’ और हमेशा आदिवासी कल्याण की प्रबल समर्थक रहीं.

झारखंड के एक आदिवासी भाजपा सांसद सुनील सोरेन ने कहा, ‘वह हमारी शान है. हमने उन्हें एक राजनेता और राज्यपाल के रूप में काम करते हुए देखा है. वह हमेशा बहुत सक्रिय रही हैं.’

एक नगर पंचायत में पार्षद से लेकर एनडीए अध्यक्ष पद के उम्मीदवार तक मुर्मू ने अपना राजनीतिक सफर 1997 से 2022 तक 25 सालों में तय किया है. उनके इस सफर ने आज कई लोगों को हैरान किया है. मुर्मू के साथ काम करने वाले बीजेपी के पूर्व विधायक कनक वर्धन सिंह देव ने कहा, ‘उनकी यात्रा एक राजनेता के रूप में उनके जीवन के बारे में बताती है. हमने उन्हें एक विनम्र और नई योजनाएं बनाने वाली आदिवासी नेता के रूप में देखा है. उन्होंने हमेशा समाज के लिए काम किया है.’

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वह आगे कहते हैं, ‘उनके परिवार के तीन प्रमुख आदिवासी समुदायों – मुर्मू, टुडू और हेम्ब्रम के साथ जुड़ाव ने उन्हें आदिवासी मसलों को और भी नजदीक से जानने और जुड़ने में मदद की. उन्होंने आदिवासियों की भलाई, उनकी संस्कृति और भाषा की रक्षा के लिए वास्तव में कड़ी मेहनत की है.’

ओडिशा की मूल निवासी मुर्मू का किसी भी तरह के विवाद से कभी कोई नाता नहीं रहा. उनकी इस बेदाग छवि की वजह से ही उन्हें 2007 में राज्य विधानसभा ने सर्वश्रेष्ठ विधायक के लिए नीलकंठ पुरस्कार से नवाजा था.

देव ने कहा, ‘एक विधायक के रूप में उनका काम बेहद संतुलित रहा. उनके काम और कौशल के लिए उन्हें 2007 में सर्वश्रेष्ठ विधायक से सम्मानित किया गया. मुर्मू एक समझदार और संवेदनशील राजनेता के रूप में जानी जाती हैं.’

उन्होंने आगे बताया, ‘वह भ्रष्टाचार के आरोपों से भी मुक्त रहीं. राज्यपाल के रूप में अपना कार्यकाल (2021) खत्म होने के बाद, वह मयूरभंज जिले (ओडिशा) में अपने गांव उपरबेड़ा लौट आईं और आदिवासी आबादी के लिए काम करना जारी रखा. उसके बाद वह पार्टी (भाजपा) में फिर से शामिल हो गईं.

कहा जा रहा है कि मुर्मू के राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को दुविधा में डाल दिया है. उनका झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) कांग्रेस के साथ राज्य का नेतृत्व करता है और विपक्षी गुट का हिस्सा है. कांग्रेस ने यशवंत सिन्हा को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में खड़ा किया है.

राज्य की एक चौथाई से अधिक आबादी अनुसूचित जनजाति (एसटी) की हैं और सीएम सोरेन खुद आदिवासी जड़ों से जुड़े हुए हैं. उन्हें मुर्मू का करीबी बताया जाता है.

झामुमो के एक वरिष्ठ सदस्य ने दिप्रिंट को बताया, ‘मुर्मू हमेशा हमारे लिए एक अभिभावक की तरह रही हैं. हमारा समुदाय एक-दूसरे से नजदीकी से जुड़ा हुआ हैं और हम एक दूसरे की मदद करते हैं. मुख्यमंत्री फैसला करेंगे कि तटस्थ रहना है या द्रौपदी मुर्मू को वोट करना है.’

झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा, ‘द्रौपदी मुर्मू एक विनम्र महिला हैं और उनके साथ हमारे हमेशा सौहार्दपूर्ण संबंध रहे हैं.’

उन्होंने कहा, ‘मतदान के बारे विचार करने के लिए हम पार्टी की बैठक बुलाएंगे और फैसला करेंगे.’


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‘अपने विचारों के साथ आगे बढ़ना’

झारखंड के राज्यपाल के रूप में मुर्मू ने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1949 में संशोधन के लिए विधानसभा द्वारा अनुमोदित एक विधेयक को स्वीकृति देने से इनकार कर दिया था.

यह मामला 2017 का था. उस समय राज्य में रघुबर दास के नेतृत्व में भाजपा सत्ता में थी. प्रस्तावित संशोधनों में आदिवासियों को अपनी भूमि का व्यावसायिक उपयोग करने का अधिकार देने की मांग की गई, जबकि उसमें सुनिश्चित किया गया था कि भूमि का स्वामित्व नहीं बदलेगा.

आरएसएस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा कि मुर्मू ने न केवल विधेयक लौटाया, बल्कि राज्यपाल के रूप में अपने फैसले पर कायम रहीं और सरकार से उन बदलावों के बारे में स्पष्टीकरण मांगा, जो आदिवासियों की भलाई के लिए लाए गए थे.

पदअधिकारी ने कहा, ‘तब से बिल कभी पारित नहीं हुआ. वह आदिवासी हित के प्रति ईमानदार रही हैं जैसा कि संघ हमेशा से करता आया है. वह संघ की विचारधारा में विश्वास करती हैं.’

राजनीतिक विश्लेषक संदीप साहू ने मुर्मू को एक राजनेता और राज्यपाल के रूप में काम करते हुए देखा है. उन्होंने कहा, ‘वह कॉलेज के दिनों में एबीवीपी (आरएसएस से संबद्ध छात्र संगठन) का हिस्सा नहीं थीं, लेकिन 1997 में भाजपा में शामिल होने के बाद संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों के करीब आ गईं.’

उन्होंने कहा, ‘वह कभी भी रबर-स्टैम्प गवर्नर नहीं बनीं. हमेशा अपनी विवेकाधीन शक्ति का इस्तेमाल करती थीं’

बिल पर हस्ताक्षर नहीं करने के मुर्मू के फैसले के बाद, 2017 में एनडीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में उन्हें नहीं चुना गया. जबकि उनका नाम कथित तौर पर संभावितों की सूची में था. आखिर में उनकी जगह (वर्तमान राष्ट्रपति) राम नाथ कोविंद को एनडीए के उम्मीदवार के तौर पर नामित किया गया.

आरएसएस पदाधिकारी ने कहा, ‘माना जाता है कि अपने फैसले की वजह से उन्हें 2017 में नामांकन की कीमत चुकानी पड़ी थी. जुलाई में बिलों को सहमति देने से इनकार करने के ठीक एक महीने बाद एनडीए ने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के नाम की घोषणा की. पर मुर्मू अति महत्वाकांक्षी नहीं थी. और उनके इन्हीं गुणों की वजह से इस साल उनके नाम को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर आगे बढ़ाने का फैसला लिया गया.’

मुर्मू के विधेयक को पास न करने के फैसले पर, सांसद सुनील सोरेन ने कहा: ‘हम आदिवासी समाज उनके फैसले की सराहना करते हैं. उन्होंने जो कुछ भी किया, आदिवासी समुदाय की भलाई के लिए किया. वह भी मेरी तरह संथाल हैं और उन्होंने हमेशा समाज के उत्थान के लिए काम किया है. हमें उम्मीद है कि वह भारत के राष्ट्रपति के रूप में हमारे लिए और अधिक काम करेंगी’

राजनीति से अध्यात्म तक

कला स्नातक मुर्मू ने ओडिशा के रायरंगपुर के एक कॉलेज में सहायक प्रोफेसर के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी और फिर राज्य सिंचाई विभाग में जूनियर असिस्टेंट के पद पर काम किया.

1997 में उन्होंने नगर निगम का चुनाव लड़ा और रायरंगपुर नगर पंचायत में पार्षद बनीं. तीन साल बाद उन्होंने रायरंगपुर से विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. वह इस सीट से दो बार विधायक रह चुकी हैं.

2000 और 2004 के बीच उन्हें ओडिशा में बीजद-भाजपा गठबंधन सरकार में मंत्री पद दिया गया. 2015 में उन्होंने झारखंड के राज्यपाल के रूप में शपथ ली और राज्य के लिए सबसे लंबे समय तक छह साल तक इस पद पर बनी रहीं.

हालांकि उनका कार्यकाल 2020 में समाप्त हो गया था, लेकिन कोविड महामारी के चलते उनके कार्यकाल को एक और साल के लिए बढ़ा दिया गया था.

देव ने कहा, ‘झारखंड राज्य के गठन के बाद से राज्यपाल बदलते रहे. लेकिन मुर्मू वह है जो सबसे लंबे समय तक इस पद पर बनीं रहीं. उनके प्रशासनिक कौशल, सरकार और राजभवन के बीच संतुलन बनाए रखने के तरीके उनके लंबे कार्यकाल को दर्शाते हैं. उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान दो सरकारें देखीं’

एक राजनेता और प्रशासक के रूप में आगे आते हुए मुर्मू को कई व्यक्तिगत त्रासदियों से भी गुजरना पड़ा. उन्होंने 2009 में अपने 25 साल के बेटे को खो दिया था.

एक रात वह दोस्तों के साथ खाना खाने निकला और लौटते हुए एक रिश्तेदार के घर चला गया. वह उस रात सोया और फिर उसके बाद कभी नहीं उठा.

ओडिशा के एक वरिष्ठ भाजपा राजनेता ने बताया कि कुछ साल बाद उनके छोटे बेटे की भी एक दुर्घटना में मौत हो गई. कहा जाता है कि मुर्मू ने बाद में मन को शांत करने के लिए आध्यात्म की ओर रुख कर लिया. वह ब्रह्म कुमारी आंदोलन के साथ जुड़ गईं और उसकी एक सक्रिय सदस्य बन गईं. ,

एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद मुर्मू ने हैरानी जताई थी.

उन्होंने कहा था, ‘मैं हैरान भी हूं और खुश भी. सुदूर मयूरभंज जिले की एक आदिवासी महिला के रूप में मैंने कभी इस शीर्ष पद के लिए उम्मीदवार बनने के बारे में नहीं सोचा था’

उन्होंने आगे कहा, ‘मुझे इसकी उम्मीद नहीं थी. मैं पड़ोसी राज्य झारखंड का राज्यपाल बनने के बाद छह साल से अधिक समय से किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम में शामिल नहीं हो रही हूं’ वह कहती हैं ‘मुझे उम्मीद है कि सभी मेरा समर्थन करेंगे.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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