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Friday, 16 January, 2026
होममत-विमतदिल्ली में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए बहुत ज़्यादा खिलाड़ी हैं, बीजिंग एक दूसरा रास्ता दिखाता है

दिल्ली में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए बहुत ज़्यादा खिलाड़ी हैं, बीजिंग एक दूसरा रास्ता दिखाता है

भारत बीजिंग के राजनीतिक मॉडल की नकल सीधे नहीं कर सकता, लेकिन उसके शासन से जुड़े अहम सिद्धांत अपनाए जा सकते हैं.

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दिल्ली की वायु प्रदूषण की समस्या सिर्फ धुएं और उत्सर्जन की नहीं है, यह संस्थाओं की भी समस्या है. दिल्ली का “एयरपोकैलिप्स” अब कोई बड़ी खबर नहीं रह गई है, बल्कि यह बार-बार होने वाली शासन की विफलता बन चुकी है. हर सर्दी में शहर वही पुराने कदम दोहराता है — GRAP अलर्ट, ऑड-ईवन योजना, कंस्ट्रक्शन पर रोक, स्कूल बंद और अस्पतालों में सांस के मरीजों की भीड़, लेकिन प्रदूषण की असली वजहें अब भी जस की तस बनी रहती हैं. इसके उलट, बीजिंग, जो कभी जहरीली धुंध का प्रतीक था, उसने 2013 के बाद से PM2.5 स्तर को 50 प्रतिशत से ज्यादा घटा लिया है और अब वहां साल में 300 से ज्यादा “अच्छी हवा वाले दिन” होते हैं. बीजिंग ने अपनी संस्थाओं और निवेश को समस्या के स्तर के हिसाब से बदला, जबकि दिल्ली की व्यवस्था आज भी बिखरी हुई, कमज़ोर और संकट के समय चलने वाली बनी हुई है.

एक सोच, एक ढांचा, कई साधन

बीजिंग में बदलाव तब शुरू हुआ, जब हवा की गुणवत्ता को किसी एक विभाग का मामला न मानकर विकास का मुख्य लक्ष्य बनाया गया. राष्ट्रपति शी जिनपिंग के “खूबसूरत गार्डन सिटी” बनाने के आह्वान को साफ हवा कार्ययोजनाओं (2013–2017, 2018–2022) में बदला गया और हाल में बीजिंग गार्डन सिटी प्लान (2023–2035) लाया गया, जिसमें रहने लायक शहर, स्वास्थ्य और पर्यावरण की मजबूती को जोड़ा गया है. इन योजनाओं में PM2.5 कम करने के साफ लक्ष्य तय किए गए और सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रिक ऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसे प्रदूषकों के लिए समयसीमा रखी गई. हर साल रिपोर्टिंग और शहर व प्रांत के नेताओं की जवाबदेही भी तय की गई.

नीतियों का यह पैकेज व्यापक और आपस में जुड़ा हुआ था:

  • उद्योगों पर सख्ती और स्थानांतरण: हज़ारों कोयला आधारित बॉयलर और ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियां बंद की गईं या शहर से बाहर भेजी गईं. जो फैक्ट्रियां रहीं, उन्हें सख्त नियमों के तहत साफ तकनीक अपनानी पड़ी.
  • ऊर्जा में बदलाव: घरों में हीटिंग और बिजली उत्पादन के लिए कोयले से गैस पर जाने में 20 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च किए गए. साथ ही पास के प्रांतों से पवन और सौर ऊर्जा का ज्यादा इस्तेमाल किया गया.
  • परिवहन सुधार: बीजिंग ने चीन VI (यूरो VI जैसे) वाहन उत्सर्जन मानक लागू किए. इलेक्ट्रिक वाहनों को तेज़ी से बढ़ावा दिया गया — सड़कों पर 5 लाख से ज्यादा ईवी उतारे गए और चार्जिंग नेटवर्क बनाया गया. एक दशक में करीब 200 किमी मेट्रो लाइन और 183 किमी उपनगरीय रेल लाइन जोड़ी गई.
  • हरियाली और धूल नियंत्रण: 10 लाख म्यू (करीब 66,700 हेक्टेयर) से ज्यादा इलाके में पेड़ लगाए गए, जिससे जंगल क्षेत्र बढ़कर 44.8 प्रतिशत हो गया. निर्माण स्थलों पर धूल रोकने के सख्त नियम और गैर-मोटर चालित यातायात ढांचे को बेहतर किया गया, जिससे उड़ने वाली धूल कम हुई.

इस बहुस्तरीय कार्यक्रम पर कुल खर्च करीब 120 अरब डॉलर से ज्यादा आंका गया है, जिसमें उद्योगों का सुधार, ऊर्जा बदलाव, परिवहन निवेश और हरित ढांचा शामिल है. लेकिन इसके फायदे भी बड़े रहे. 2013 में बीजिंग में औसत PM2.5 स्तर 70 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से ज्यादा था, जो 2021–2023 तक घटकर करीब 30 माइक्रोग्राम रह गया. शहर ने लगातार कई सालों तक चीन के राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों को पूरा किया. सबसे अहम बात यह रही कि सख्त कानूनों — पर्यावरण संरक्षण कानून और वायु प्रदूषण रोकथाम व नियंत्रण कानून के ज़रिए नियमों को लागू किया गया. इन कानूनों ने स्थानीय सरकारों को भारी जुर्माना लगाने, रियल टाइम में उत्सर्जन पर नजर रखने और नियम तोड़ने वालों पर तुरंत कार्रवाई करने की ताकत दी.

बहुत सारे जिम्मेदार, लेकिन अधिकार बहुत कम

दिल्ली की व्यवस्था बिल्कुल अलग दिखती है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) देश के स्तर पर नियम तय करता है, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) राज्य स्तर पर लागू करती है और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) को दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बीच तालमेल बनाना होता है. कागज़ों पर यह व्यवस्था मजबूत लगती है, लेकिन हकीकत में जिम्मेदारियां बंटी हुई हैं और अधिकार कमज़ोर हैं.

ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) सबसे अहम योजना है, लेकिन यह ज़्यादातर हालात बिगड़ने के बाद ही लागू होती है. ऑड–ईवन योजना, कुछ दिनों के लिए कंस्ट्रक्शन पर रोक और स्कूल बंद करने जैसे कदम तभी उठाए जाते हैं जब एक्यूआई “बहुत खराब” या “गंभीर” स्तर पर पहुंच जाता है. यानी वायु प्रदूषण को लगातार रहने वाली समस्या मानने के बजाय, इसे कभी-कभार आने वाली आपात स्थिति की तरह देखा जाता है. 2022 में GRAP में बदलाव कर कम एक्यूआई स्तर पर पहले से कार्रवाई का वादा किया गया था, लेकिन कमज़ोर पूर्वानुमान, सरकारी देरी और असमान अमल के कारण नवंबर 2025 में GRAP-III तब लागू हुआ, जब कई स्टेशनों पर एक्यूआई पहले ही 350 से ऊपर जा चुका था.

नियमों को लागू करने में बड़ी खामियां हैं. सीएक्यूएम और दूसरी जांच रिपोर्टें बार-बार बताती हैं कि निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण और कचरा जलाने पर रोक के नियमों का बड़े पैमाने पर पालन नहीं हो रहा है. जांच टीमें सिर्फ कुछ ही प्रदूषण वाले इलाकों तक पहुंच पाती हैं. बीएस-III और बीएस-IV वाहनों पर रोक की घोषणाएं अक्सर होती हैं, लेकिन पूरी तरह लागू नहीं होतीं, जिससे भरोसा कमज़ोर होता है. वहीं, पराली जलाने जैसी मूल समस्याएं—जो फसल कटाई और बुवाई के कम समय, मशीनों की कमी और वैकल्पिक योजनाओं के लिए कम फंड से जुड़ी हैं—2018 से हज़ारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद लगभग जस की तस बनी हुई हैं.

दिल्ली में साफ तकनीकों की ओर बदलाव भी धीमा है. इलेक्ट्रिक वाहनों के नए रजिस्ट्रेशन की संख्या अभी भी बहुत कम हैं, उद्योगों में ईंधन बदलने का लक्ष्य पीछे है और मशीन से सड़क साफ करने की व्यवस्था बजट और क्षमता की कमी से सीमित है. बीजिंग के उलट, जहां वायु गुणवत्ता के लक्ष्य ऊर्जा, उद्योग और परिवहन नीतियों में साफ समय-सीमा के साथ जोड़े गए, दिल्ली में इन्हें अलग-अलग क्षेत्रों के एजेंडे की तरह देखा जाता है, जिनके लिए कोई मजबूत साझा आदेश नहीं है.

शासन में कमी

यह फर्क “मजबूत” और “कमज़ोर” सरकारों का नहीं है, बल्कि साफ जिम्मेदारी और सही तालमेल का है. बीजिंग की क्लीन एयर एक्शन प्लान ने एक ऐसा एकीकृत ढांचा बनाया, जिसके तहत अलग-अलग क्षेत्रों की नीतियों में तालमेल हुआ, संसाधन जुटाए गए और अधिकारियों का आकलन किया गया. वायु गुणवत्ता स्थानीय नेताओं के प्रदर्शन का पैमाना बन गई, जिसे राष्ट्रीय कानून और बड़े सरकारी निवेश का समर्थन मिला. इससे सारी समस्याएं खत्म नहीं हुईं—पारदर्शिता और भागीदारी को लेकर चिंताएं अब भी हैं, लेकिन इससे यह तय हुआ कि प्रदूषण कम करना सिस्टम का मुख्य लक्ष्य बने, न कि बाद में याद आने वाली बात.

दिल्ली और एनसीआर में ऐसी व्यवस्था नहीं है. सीएक्यूएम के पास जिम्मेदारी तो बड़ी है, लेकिन उसके पास इतने मजबूत साधन नहीं हैं कि वह अलग-अलग विभागों और पड़ोसी राज्यों को साझा लक्ष्यों को पूरा करने के लिए मजबूर कर सके. अदालतों और ट्रिब्यूनल के आदेश कागज़ों पर मजबूत दिखते हैं, लेकिन अमल में अक्सर कमज़ोर पड़ जाते हैं. जब तक पूरे क्षेत्र के लिए तय समयसीमा वाले PM2.5 लक्ष्य नहीं होंगे और लगातार नाकामी पर बजट या करियर से जुड़ा असर नहीं होगा, तब तक व्यवस्था छोटे-छोटे तात्कालिक उपायों पर ही टिकी रहेगी, जो सुर्खियों में तो अच्छे लगते हैं, लेकिन सालाना औसत प्रदूषण पर बहुत कम असर डालते हैं.

भारतीय संदर्भ के लिए सबक

भारत सीधे-सीधे बीजिंग का राजनीतिक मॉडल नहीं अपना सकता, लेकिन उसके शासन से जुड़े कुछ अहम सिद्धांत अपनाए जा सकते हैं.

  • कानूनी क्षेत्रीय लक्ष्य: राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों को दिल्ली-एनसीआर के लिए कानूनी रूप से तय PM2.5 और PM10 घटाने के लक्ष्यों में बदला जाए, जो 5 और 10 साल की अवधि के लिए हों और हर साल सार्वजनिक प्रगति रिपोर्ट जारी हो.
  • सीएक्यूएम को मजबूत अधिकार: सीएक्यूएम को यह साफ अधिकार दिया जाए कि वह परिवहन, बिजली, कृषि और उद्योग जैसे क्षेत्रों की योजनाओं को इन लक्ष्यों के साथ जोड़ सके और नियमों के पालन को बजट आवंटन और प्रदर्शन मूल्यांकन से जोड़ा जाए.
  • पायलट से कार्यक्रम की ओर: सीमित क्लाउड-सीडिंग जैसे छोटे प्रयोगों या कभी-कभार लगने वाली पाबंदियों से आगे बढ़कर, उद्योगों की जगह तय करने, स्वच्छ ऊर्जा, सार्वजनिक परिवहन और फसल अवशेष प्रबंधन पर कई साल चलने वाले कार्यक्रम बनाए जाएं, जिनकी लागत बीजिंग के 120 अरब डॉलर वाले पैकेज की तरह साफ-साफ बताई जाए.
  • नीतियों में स्वास्थ्य को जोड़ना: बीजिंग के “गार्डन सिटी” विचार की तरह, वायु गुणवत्ता को स्वास्थ्य, रहने लायक शहर और लंबे समय के विकास से जोड़ने पर राजनीतिक इच्छाशक्ति बनी रहती है. दिल्ली में भी नीतियों के आकलन में स्वास्थ्य प्रभाव अध्ययन और अस्पतालों के आंकड़ों का नियमित इस्तेमाल इसी तरह मदद कर सकता है.

ये कोई तकनीकी सुविधाएं नहीं हैं, बल्कि स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार के लिए जरूरी शर्तें हैं. जब तक वायु गुणवत्ता प्रबंधन बिखरा रहेगा, दिल्ली के अस्पताल शासन की इस समस्या की कीमत चुकाते रहेंगे.

दिल्ली में साफ हवा अंत में आपात योजनाओं की चालाकी पर कम और इस बात पर ज्यादा निर्भर करेगी कि भारत एक समन्वित और जवाबदेह शासन प्रणाली बना पाता है या नहीं, जो वायु गुणवत्ता को एक बुनियादी सार्वजनिक जरूरत माने—जैसा बीजिंग को करना पड़ा. यही दोनों शहरों के बीच असली अंतर है और यही असली मौका भी है.

(वाणी अर्चना, पहले इंडिया फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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