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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर पत्रकारों के उनके और उनकी पार्टी के खिलाफ पक्षपाती होने की शिकायत करते हैं. वह ये भी कहते हैं कि पत्रकार विपक्षी दलों, खास कर कांग्रेस और गांधी परिवार के प्रति नरम हैं. इस संबंध में अपने विचारों को और स्पष्ट करने के लिए अब उन्होंने चुनाव के आखिरी चरण के अपने साक्षात्कारों में से एक का उपयोग किया है.

गत सप्ताह इंडियन एक्सप्रेस को अपने बहुत ही विस्तृत साक्षात्कार में मोदी ने पत्रकारों के बारे में ये प्रमुख बातें कही हैं:

-वे तटस्थ होने का दिखावा भले ही करें, पर ऐसा हैं नहीं.

-अच्छे और निष्पक्ष पत्रकारों को तटस्थ होना चाहिए.

-पहले, संपादक/पत्रकार अपने झुकाव को छुपा कर रख सकते थे. संपादक हमेशा गुमनाम रहते थे, कभी-कभार ही बोलते थे, वो भी सेमिनारों में. अब वे हरदम बोलते रहते हैं. आज उनमें से अधिकांश, सोशल मीडिया (मुख्यत: ट्विटर) पर बकबक करते रहने के कारण बेपर्दा हो चुके हैं.

-‘खान मार्केट गैंग’ के हिस्से के रूप में वे उनकी छवि खराब करने के सामूहिक प्रयास में शामिल हैं.

पत्रकारिता में अच्छा खासा समय बिताने के कारण, मुझे उनके साथ इस बहस में अपने तर्क पेश कर खुशी होगी. मैं सात छोटे बिंदुओं के रूप में अपनी बात प्रस्तुत करता हूं.


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पत्रकारीय तटस्थता नामुमकिन है. यह मांग गैरवाजिब भी है. जीवित प्राणी, वो मनुष्य हों या कुत्ते-बिल्ली, हमेशा स्थिति या मुद्दा विशेष पर एक नज़रिया रखेंगे. अपनी राय देते समय पत्रकार इतना ज़रूर कर सकते हैं, और उन्हें करना भी चाहिए, कि अपनी रिपोर्टिंग की वस्तुनिष्ठता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए वे पेशेवर साधनों और कसौटियों का उपयोग करें.

पत्रकारों के लिए सोशल मीडिया, खास कर ट्विटर, अपनी पहुंच और प्रभाव बढ़ाने का एक नया माध्यम है. ये एक फांस भी साबित हो सकता है, और प्रधानमंत्री मोदी का कहना सही है कि पत्रकार जब अपनी तरजीहों को और पसंदगी-नापसंदगी को खुलकर ज़ाहिर कर रहे हों, तो आप भला उनकी संपादकीय निष्पक्षता पर कैसे भरोसा करेंगे. ये एक समस्या है और मीडिया इससे निपटना सीख रहा है. अमेरिका में, न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट जैसे पुराने दिग्गज अपनी सोशल मीडिया नीतियों को काफी दृढ़ बना चुके हैं, और उन्होंने अपने पत्रकारों के पूर्वाग्रह वाले निजी विचारों के प्रकाशन को लेकर पाबंदियां भी लगा रखी हैं.

दिप्रिंट की आचार संहिता इसके पूर्णकालिक पत्रकारों को सोशल मीडिया पर वही सब लिखने की अनुमति देती है जो कि संपादित मंच पर प्रकाशन योग्य हो. मसलन, आप सोशल मीडिया पर या सार्वजनिक भाषणों में किसी को जनसंहारक या चोर नहीं कह सकते, यदि आपके पास खबर में भी ऐसा कह सकने लायक तथ्य उपलब्ध नहीं हो.

यह कहना सही नहीं है कि सोशल मीडिया के आगमन से पहले संपादक के विचार ज्ञात नहीं होते थे. ये बात व्यक्ति विशेष या काल विशेष पर निर्भर करती है. अतीत में भी फ्रैंक मोरेस, बी.जी. बर्गीज़, गिरिलाल जैन, अरुण शौरी, प्रभाष जोशी और राजेंद्र माथुर (मैं जिन भाषाओं को पढ़ता हूं, उन्हीं तक खुद को सीमित कर रहा हूं) जैसे अनेक प्रतिष्ठित संपादकों ने पाठकों से अपने विचार खुलकर ज़ाहिर किए थे, और वो भी किसी तरह के पाखंड या निरापद निष्पक्षता के ढोंग के बिना.


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प्रधानमंत्री अधिकांश पत्रकारों को अपने खिलाफ बता कर भारतीय मीडिया के उस बड़े हिस्से के साथ नाइंसाफी कर रहे हैं जो कि तहेदिल से उनका समर्थन करता है. यदि आप शाम के वक्त समाचार चैनलों को देखते हों, तो कुछेक अपवादों को छोड़कर उनमें से अधिकांश मोदी की तारीफ के कसीदे पढ़ते दिखेंगे, और उनके मुश्किल सवाल सिर्फ विपक्ष के लिए होते हैं. मैंने 1977 के बाद से किसी नेता का इतना बड़ा मीडिया फैन क्लब नहीं देखा है. इसी तरह, कुछेक अपवादों को छोड़कर, अधिकांश भाषाओं के अखबार उन्हें कोई परेशानी नहीं देते हैं.

कुछ मीडिया संस्थान अब भी उनसे सवाल करते हैं और उनकी आलोचना करते हैं. पर ऐसा भी नहीं है कि वह इस परिस्थिति का सामना करने वाले अकेले सत्ताधारी नेता हैं. हर नेता को इस स्थिति से गुजरना होता है, और खास कर अपने दूसरे कार्यकाल में डॉ. मनमोहन सिंह ने भी इसका सामना किया था. मोदी को भारत का ‘डिवाइडर-इन-चीफ’ बताकर चिढ़ाने वाली इसी ‘टाइम’ पत्रिका ने कवर पर मनमोहन सिंह की तस्वीर छापते हुए ‘अंडरएचीवर’ का शीर्षक लगाया था. प्रधानमंत्री ने यूपीए काल के दो मुद्दों का खास तौर पर ज़िक्र किया है- राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) का गठन जो कि मंत्रिमंडल के फैसले को भी दरकिनार कर सकती थी, और राहुल गांधी का अध्यादेश की प्रति को फाड़ना. दोनों की ही आलोचना हुई थी. आप ‘एनएसी, संविधानेत्तर’ और ‘यूपीए का ऑटोइम्युन आत्मविनाश’ गूगल कर मेरे आलेख देख सकते हैं. इसका यही सबक हो सकता है कि सत्ता में रहने के दौरान आप आलोचनाओं के लिए तैयार रहें. कम-से-कम थोड़ी आलोचना के लिए.

सबसे दिलचस्प है उनका अपने आलोचकों को ‘खान मार्केट गैंग’ बताना, जिसमें हम समझते हैं उन्होंने पत्रकारों और उदारवादी बुद्धजीवियों को साथ रखा है. मानो ‘कुटिल’ लुटियंस दिल्ली के लिए इस छोटे से पुराने बाज़ार की वही हैसियत हो, जो ‘आतंकवादी’ पाकिस्तान के लिए बालाकोट की, यानि विरोधियों का अड्डा. मैं कहूंगा कि मोदी भले ही उन्हें परेशान करने वाला मानते हों, पर वह उनकी क्षमता और प्रभाव को बहुत बढ़ाचढ़ा कर बता रहे हैं. वास्तव में वह उनकी तारीफ कर रहे हैं. इससे ये भी ज़ाहिर होता है कि वह ट्विटर कुछ ज़्यादा ही देख रहे हैं. वह एक पत्रकार/बुद्धिजीवी के 50 ट्वीट पढ़कर उसकी असलियत जानने की बात करते हैं. प्रधानमंत्री जी, आप ट्विटर को कुछ ज़्यादा ही समय दे रहे हैं. पढ़ने के लिए आपके पास कहीं अधिक महत्वपूर्ण सामग्री होनी चाहिए.

और आखिर में, इस परिस्थिति में हम पत्रकार क्या करें? मैंने 1977 में दिल्ली से प्रकाशित एक छोटे-सी साप्ताहिक पत्रिका ‘डेमोक्रेटिक वर्ल्ड’ से पत्रकारिता शुरू की थी. हमलोगों ने पत्रिका के लिए एक विज्ञापन तैयार किया था जिसमें लिखा था: ‘द लेफ्ट थिंक्स वी आर राइट, द राइट थिंक्स वी आर लेफ्ट, सो वी मस्ट बी डूइंग समथिंग राइट.’ (वामपंथी हमें दक्षिणपंथी मानते हैं, दक्षिणपंथी हमें वामपंथी मानते हैं, यानि हम कुछ तो सही कर रहे होंगे.) मैं कहूंगा, यही दृष्टिकोण रखें. अपनी राय और रुझान को साथ रखें, कोई बात नहीं. बस, इतना पेशेवर ज़रूर बनें कि अपने पाठकों/दर्शकों को अपनी निष्पक्षता का यकीन करा सकें. हम महज पत्रकार हैं. हम कोई राजनीति विज्ञानी नहीं हैं. और राजनीतिक विचारक तो हरगिज नहीं. हमारी चाहत, हमारी पत्रकारिता का हिस्सा नहीं हो सकती.


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इसलिए, इस बात की चिंता नहीं करें कि सोशल मीडिया पर आपके साथ होने वाला दुर्व्यवहार आपके पाठकों/दर्शकों के मन में पूर्वाग्रह भरेगा. क्योंकि ऐसा नहीं होगा. आपको पढ़ने-सुनने वाले स्मार्ट हैं. और आप चाहें तो उस पुराने विज्ञापन को नए ज़माने के अनुरूप अपडेट कर सकते हैं: ‘वामपंथी हमें दक्षिणपंथी मानते हैं, दक्षिणपंथी हमें वामपंथी मानते हैं, इसलिए हम दोनों के द्वारा ट्रोल किए जाते हैं.’

अब मोटी चमड़ी भी (खबर सूंघने वाली) साफ नाक और तनी हुई रीढ़ की तरह पत्रकारिता की पेशेवर ज़रूरत बन चुकी है.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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