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पटना के गांधी मैदान में एक रैली के दौरान राहुल, कमलनाथ, तेजस्वी और मीरा कुमार/पीटीआई
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मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने हाल ही में राज्य में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण करके सामाजिक न्याय की दिशा में अहम कदम उठाया है. अब तक वहां ओबीसी आरक्षण सिर्फ 14 प्रतिशत था. इस तरह मध्य प्रदेश में ओबीसी की बहुत बड़ी मांग पूरी हुई है. राज्य में ओबीसी आबादी 50 प्रतिशत के आसपास होने का अनुमान है.

कमलनाथ के इस ऐतिहासिक कदम को भुनाने के बजाय कांग्रेस इस मामले में खुद संकट में फंसती नजर आ रही है. राजनीतिक लाभ लेने के लिए जरूरी है कि जिस वर्ग को लाभ दिया जा रहा है, उसे आक्रामक तरीके से बताया जाए. खासकर ओबीसी जैसे तबके को बताना जरूरी है, जो इस कदर पिछड़ा हुआ है कि उसे अपने हित-अहित की समझ नहीं दिखती.

कमलनाथ के इस कदम से कांग्रेस शरमाती हुई नजर आ रही है. राहुल गांधी या प्रियंका गांधी ने इस मसले पर कोई ट्वीट नहीं किया. कोई प्रेस कान्फ्रेंस नहीं हुई, इसकी कोई चर्चा नहीं हुई. पार्टी की ओर से कमलनाथ के इस कदम की कोई सराहना नहीं हुई. ऐसा लगता है कि पार्टी यह दिखाना चाह रही हो कि कमलनाथ ने अच्छा काम न करके, कोई अपराध कर दिया हो.


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इसके अलावा कांग्रेस ने पार्टी शासित अन्य राज्यों में भी इस मामले में कोई कदम नहीं उठाया. पंजाब में ओबीसी को सीधी भर्ती में 12 प्रतिशत जबकि शैक्षणिक संस्थानों में महज 5 प्रतिशत आरक्षण है. राजस्थान में राज्य सेवाओं में महज 21 प्रतिशत जबकि छत्तीसगढ़ में राज्य सेवाओं में महज 14 प्रतिशत आरक्षण है.

होना तो यह चाहिए था कि कांग्रेस मध्य प्रदेश सहित राजस्थान, पंजाब और छत्तीसगढ़ में एक साथ ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा करती. साथ ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासित राज्यों उत्तराखंड, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र सरकारों को चौतरफा घेरती कि इन राज्यों में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण के लिए भाजपा क्या कर रही है, इसका जवाब दें.

अब लगता है कि कांग्रेस ने कमलनाथ को फंसा दिया है. देश का सवर्ण मतदाता जागरूक है और उसे सूचना पहुंच चुकी है कि पार्टी ने सवर्णों के खिलाफ कदम उठाया है. वहीं ओबीसी तबके को लाभ देने का श्रेय भी पार्टी नहीं ले पा रही है. ऐसा संदेश जा रहा है कि कमलनाथ ने यह फैसला अपने स्तर पर किया है और इसके लिए कांग्रेस अपराधबोध से ग्रसित है.

इस फैसले से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को कमलनाथ से भी ज्यादा नुकसान हो सकता है, क्योंकि वह पिछड़े वर्ग के नेता के रूप में स्थापित हैं. यह कहते हुए सुना जा रहा है कि कांग्रेस में उनकी कोई औकात नहीं रह गई है और सिर्फ दिखावटी मुख्यमंत्री हैं. भूपेश उतना भी साहस नहीं दिखा सके, जितना कमलनाथ ने दिखाया, कांग्रेस ने उनके हाथ, पांव बांधकर मुख्यमंत्री पद पर बिठाया है.


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अन्य पिछड़े वर्ग से जुड़े और भी तमाम मसले हैं, जिस पर कांग्रेस सरकारों ने काम किया है. लेकिन पार्टी की ओर से ऐसा संकेत दिया जाता है, जैसे उनके दल के किसी नेता ने वंचित तबके को लाभ पहुंचाकर व्यक्तिगत स्तर पर यह अपराध किया है और पार्टी का उसमें कोई दोष नहीं है. इससे भाजपा जैसे आक्रामक दल को कांग्रेस को पटखनी देने का मौका मिल जाता है. मिसाल के तौर दो उदाहरणों को देखें.

1. देश में मंडल कमीशन लागू करने की घोषणा बेशक विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने की, लेकिन इसे लागू करने का श्रेय नरसिंह राव सरकार को जाता है. इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी आरक्षण तत्कालीन कल्याण मंत्री और बाद में कांग्रेस अध्यक्ष बने सीताराम केसरी ने लागू किया. केंद्रीय सेवाओं में पहली ओबीसी नियुक्ति इसी समय हुई. लेकिन न तो कांग्रेस इस बारे में बात करती है और न ही सीताराम केसरी का नाम लेती है. कांग्रेस के इतिहास में सीताराम केसरी हाशिए पर धूल खा रहे हैं.

2. केंद्र सरकार के उच्च शिक्षा संस्थानों में ओबीसी आरक्षण यूपीए-1 के समय में लागू हुआ. तब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे और इसकी पहल उस समय के मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने की. इस वजह से आज लाखों ओबीसी छात्र-छात्राएं उच्च शिक्षा पा रहे हैं. लेकिन कांग्रेस इस बात का जिक्र तक नहीं करती. अर्जुन सिंह का तो वो नाम तक नहीं लेती.


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जातीय जनगणना, विश्वविद्यालयों में 200 प्वाइंट रोस्टर से नियुक्ति, सीधी भर्ती में साक्षात्कार खत्म किए जाने, क्रीमी लेयर खत्म किए जाने, निजी क्षेत्र में साफ सुथरी भर्ती और सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व सहित तमाम ऐसे मसले हैं, जिन पर कांग्रेस ने काम किया है या प्रियंका गांधी के रुख से लगता है कि पार्टी का ऐसा करने का मन है. कांग्रेस इन मसलों पर बेहतर करने के बाद भी इन आक्रामक नहीं है.

पार्टी का सूट-बूट की सरकार वाला जुमला मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात में लाभ देने के बाद पुराना पड़ गया है. राफेल सौदे पर सीएजी की रिपोर्ट के बाद वह मसला कुंद पड़ा है. पुलवामा-बालाकोट मसले पर भाजपा से भिड़ने का मतलब फिर से उसे सत्ता सौंप देने जैसा है और इस मसले पर कांग्रेस का मुंह बंद होने का नाम ही नहीं ले रहा है. देश के ओबीसी तबके से जुड़े किसानों के संकट और बेरोजगारी के मुद्दे पर कांग्रेस लौट ही नहीं पा रही है.

अब ऐसा लगता है कि हाल में कांग्रेस की 3 राज्यों में धमाकेदार वापसी के बाद राहुल गांधी मौके गंवा रहे हैं. नरेंद्र मोदी सरकार ने उन्हें तमाम मुद्दे थाली में परोस दिए, लेकिन कांग्रेस आक्रामक होकर सरकार से सीधे तौर पर दो-दो हाथ करने के बजाय अपने किए पर भी पानी फेर रही है.

(लेखिका राजनीतिक विश्लेषक हैं.)


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