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Sunday, 23 June, 2024
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हिंद महासागर में चीन का बढ़ता प्रभाव चिंताजनक है, इससे क्षेत्र की स्थिरता खतरे में पड़ सकती है

जहां श्रीलंका आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, वहीं हंबनटोटा को 99 साल के लिए चीन को पट्टे पर दिया जाना दिखाता है कि बीजिंग किस तरह से बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव को हथियार के रूप में प्रयोग कर रहा है.

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अमेरिकी नौसैनिक अधिकारी और इतिहासकार अल्फ्रेड महान ने एक बात कही थी जो कि काफी लोकप्रिय है: “जो कोई भी हिंद महासागर को नियंत्रित करेगा वह एशिया पर राज करेगा. यह महासागर 21वीं सदी में सातों समुद्रों में सबसे महत्त्वपूर्ण होगा की कुंजी होगा. दुनिया की नियति इस बात से निर्धारित होगी कि समुद्र में कौन कितना ताकतवर है.” हमेशा से कही जाने वाली यह कहावत हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की मौजूदा गतिविधियों को देखते हुए काफी प्रासंगिक लगती है

हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सैन्य उपस्थिति और बढ़ते प्रभाव ने भारत, ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों को चिंतित कर दिया है. 2017 में पूर्वी अफ्रीका के जिबूती में चीन के सैन्य अड्डा बनाने के साथ-साथ पाकिस्तान के ग्वादर में दोहरे-उपयोग वाली फेसिलिटीज़ का डेवलेपमेंट इस क्षेत्र पर हावी होने की उसकी इच्छा को स्पष्ट रूप से उजागर करता है.

2010 के अंत से ही, श्रीलंका, म्यांमार और मालदीव जैसे रणनीतिक महत्त्व के देशों के आस-पास के एरिया में चीन जासूसी जहाजों को तैनात कर रहा है, हालांकि वह कहता रहा है कि यह समुद्री रिसर्च के लिए तैनात किए गए जहाज़ हैं. थिंक टैंक और मीडिया हाउस की रिपोर्ट्स इन बारे में पुष्टि करती हैं. वे समुद्र पर प्रभुत्व के लिए अपनी नौसैनिक क्षमताओं को मजबूत करने के चीन के व्यवस्थित प्रयासों के साथ-साथ अपनी समुद्री क्षमताओं को मजबूत करते हुए महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपने प्रभाव का विस्तार करने के देश के प्रयास पर प्रकाश डालते हैं. विशेष रूप से ध्यान देने योग्य बात यह है कि चीन के पास दोहरे उद्देश्य वाले नागरिक अनुसंधान जहाजों के दुनिया के सबसे बड़े बेड़े का कब्ज़ा है, जो स्पष्ट रूप से वैज्ञानिक और वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए तैनात किया गया है, लेकिन इसके व्यापक रणनीतिक उद्देश्यों के साथ भी जुड़ा हुआ है.

चीन-भारत रणनीतिक मुकाबला

श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पर चीनी बैलिस्टिक मिसाइल और उपग्रह ट्रैकिंग और सर्वेक्षण जहाज युआन वांग 5 की उपस्थिति से भारत विशेष रूप से परेशान था.

श्रीलंका की आर्थिक चुनौतियों के बीच, चीन को हंबनटोटा का 99 साल का पट्टा, हिंद महासागर क्षेत्र में अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के बीजिंग के हथियारीकरण को रेखांकित करता है. वुहान विश्वविद्यालय के लियांग मेंग ने बीआरआई और हिंद महासागर के द्वीप और तटीय देशों के साथ संबंधों को बढ़ावा देने की अनिवार्यता के बीच परस्पर क्रिया को रेखांकित किया.

युआन वांग 5 के अलावा, जियांग यांग होंग 3 को पिछले महीने माले में डॉक किया गया था. जियांग यांग होंग 1 को इस महीने की शुरुआत में बंगाल की खाड़ी में देखा गया था जब भारत ने दो परमाणु-सक्षम बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण किया था: K4 सबमरीन लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) और मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल रि-एंट्री वीकल (MIRV) से सुसज्जित अग्नि-5.

हाल ही में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस बात पर जोर दिया कि भारत और चीन के बीच मतभेद सीमा विवाद से कहीं आगे तक जाते हैं. यह निर्विवाद रूप से हिंद महासागर क्षेत्र तक विस्तृत है. पिछले साल सितंबर में, विदेश मंत्री ने कहा था: “चीनी नौसेना के आकार [और हिंद महासागर क्षेत्र में तैनाती] में बहुत तेज वृद्धि हुई है… भारतीय दृष्टिकोण से, हमारे लिए तैयारी करना बहुत उचित है. हमने पहले की तुलना में कहीं अधिक बड़ी चीनी उपस्थिति देखी है.”

भारत और चीन दोनों समुद्री क्षेत्र में प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं. और यह प्रतिद्वंद्विता दोनों देशों को हिंद महासागर क्षेत्र में छोटे राज्यों के साथ सक्रिय रूप से जुड़ने के लिए प्रेरित कर रही है. उदाहरण के लिए मालदीव को लें, जहां मोहम्मद मुइज्जू (अपने भारत विरोधी रुख के लिए जाने जाते हैं) के चुनाव ने चीन की महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा दिया है. इसके अलावा, जैसे ही बीजिंग और माले ने एक सैन्य सहायता समझौते को अंतिम रूप दिया, भारतीय सैन्य कर्मियों को मालदीव से वापस बुला लिया गया.


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चीनी सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से चल रहे पोस्ट में कहा जा रहा है कि चीन को हिंद महासागर में ऑपरेट करने का अधिकार है. यह जापान सागर के जैसी स्थिति है जिसमें, जिस पर जापान का खास नियंत्रण नहीं है. इसी तरह, यह तर्क दिया जाता है कि हिंद महासागर भारत का महासागर नहीं है. मालदीव के राष्ट्रपति के ‘इंडिया आउट’ चुनाव अभियान को भी इन प्लेटफार्मों पर काफी प्रशंसा मिली, साथ ही द्वीप राष्ट्र से भारतीय सैन्य कर्मियों को बाहर करने के उनके फैसले की भी इन प्लेटफार्मों पर काफी प्रशंसा हुई.

आज, भारत और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा केवल क्षेत्रीय प्रभाव और सैन्य कौशल तक ही सीमित नहीं है. और सेशेल्स, मेडागास्कर व मॉरीशस जैसे देशों का रणनीतिक महत्व दिखाता है कि यह प्रतिद्वंद्विता कितनी गंभीर है. चीन तेजी से मालदीव और श्रीलंका में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है और भारत भी इसमें पीछे नहीं है. भारतीय तट से कुछ ही दूरी पर जिस तरह से भारत ने सोमाली समुद्री डाकुओं से एक जहाज़ को बचाया वह भारत के किसी भी मुश्किल वक्त में सबसे पहले मदद करने वाले और सुरक्षा प्रदान करने वाले एप्रोच को दिखाता है. इसके सक्रिय प्रयासों से तीन महीने से अपहरण किए गए बुल्गारिया के बल्क कैरियर एमवी रुएन को छुड़ाया जा सका.

फरवरी 2024 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जुगनौथ ने संयुक्त रूप से हिंद महासागर के पश्चिमी भाग में स्थित दो द्वीपों, अगालेगा पर एक हवाई पट्टी और एक जेटी का उद्घाटन किया. इसके अतिरिक्त, उन्होंने विभिन्न भारत-वित्त पोषित सामुदायिक विकास परियोजनाओं का अनावरण किया, जिससे इस क्षेत्र में नई दिल्ली की उपस्थिति और मजबूत हुई.

क्या चीन के विस्तार को रोका जा सकता है?

चीन सक्रिय रूप से समुद्री पर अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिश कर रहा है. आख़िरकार, इसके पास दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना है (जिसे वह ज़ोर-शोर से आधुनिक बनाने की कोशिश कर रही है) और इसने एडमिरल डोंग जुन को अपना रक्षा मंत्री नियुक्त किया है. हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती उपस्थिति को हल्के में नहीं लिया जा सकता. यह चीन के समुद्री प्रभाव को बढ़ाने, अन्य देशों की नौसैनिक संपत्तियों पर कब्ज़ा करने और पूरे क्षेत्र में भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के प्रभाव को सीमित करने के लिए एक रणनीतिक कदम है.

बीआरआई (बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव) हिंद महासागर में चीन के हितों को आगे बढ़ाने का एक ज़रिया है. बीजिंग ने बंदरगाहों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर नियंत्रण हासिल करने और महत्वपूर्ण सैन्य स्तर का लाभ हासिल करने के लिए ऋण-जाल (Debt-Trap) कूटनीति की विशेषता वाले निवेश का लाभ उठाने की क्षमता का प्रदर्शन किया है.

एक जैसे विचार रखने वाले देशों का एक गठबंधन हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य उपस्थिति को काउंटर करने या संतुलित करने के लिए तैयार है. इस संदर्भ में, पूरे क्षेत्र में चीन की गतिविधियों को रोकने में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है. यह अन्य देशों के हितों की रक्षा और हिंद महासागर में स्थिरता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है.

(सना हाशमी, पीएचडी, ताइवान-एशिया एक्सचेंज फाउंडेशन और यूएस-चीन संबंधों के लिए जॉर्ज एचडब्ल्यू बुश फाउंडेशन में फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @sanahashmi1 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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