scorecardresearch
Sunday, 23 June, 2024
होममत-विमतभारत को कमतर करके देखना बंद करे चीन, इसके अपने स्कॉलर दिल्ली को 'मजबूत' कहते हैं

भारत को कमतर करके देखना बंद करे चीन, इसके अपने स्कॉलर दिल्ली को ‘मजबूत’ कहते हैं

चीन सिर्फ भारत के इरादों को गलत नहीं समझ रहा है; यह ऐतिहासिक रूप से मैत्रीपूर्ण रिश्ते को शत्रुतापूर्ण रिश्ते में बदलकर एक रणनीतिक गलती कर रहा है, जिससे मौजूदा विश्वास की खाई और गहरी हो रही है.

Text Size:

सीमा पर जारी तनाव को लेकर भारत और चीन की अपनी-अपनी व्याख्याएं हैं, और फिलहाल मेल-मिलाप के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं. हाल ही में एक मासिक प्रेस वार्ता के दौरान, चीन के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता वू कियान ने जोर देकर कहा कि “सीमा विवाद चीन और भारत के बीच काफी लंबे समय से चलने वाला एक मुद्दा है, लेकिन यह द्विपक्षीय संबंधों की पूरी तस्वीर का खाका नहीं खींचता है.” उन्होंने सीमा की स्थिति को द्विपक्षीय संबंधों से जोड़ने के भारत के प्रयास को “अनुचित” बताया और नई दिल्ली को “नासमझ” बताया.

ऐसा प्रतीत होता है कि चीन का नैरेटिव ज़मीनी हकीकत से अलग है. वायरल हो रहे एक वीडियो में चीनी सैनिकों को लद्दाख के काकजंग क्षेत्र में भारतीय चरवाहों को रोकते हुए दिखाया गया है. यह घटना चीनी सरकार द्वारा दिखाई जा रही वास्तविकता के विपरीत है.

सीमा विवाद को रिश्ते के अन्य पहलुओं से अलग करने की वकालत करने वाली यह लंबे समय से चली आ रहा नैरेटिव, चीन द्वारा दशकों से लगातार प्रचारित की जा रही है. हालांकि, भारत ने अब मतभेदों के समाधान को प्राथमिकता देने का विकल्प चुना है, खासकर 2020 के गलवान संघर्ष के बाद से, सीमा मुद्दे को रिश्ते में विवाद का सबसे चुनौतीपूर्ण और अनसुलझा मुद्दा बना दिया है.

मतभेदों को सुलझाने में चीन की अनिच्छा को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते हुए, भारत ने चीन पर समझौतों और विश्वास-निर्माण उपायों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है. भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने संबंधों की स्थिति को ‘असामान्य‘ बताया है. ऐसी धारणा प्रचलित है कि विवाद वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की धारणाओं में अंतर से आगे निकल गया है. यह तेजी से माना जा रहा है कि चीन का लक्ष्य रणनीतिक लाभ के लिए, दबाव डालकर और भारत को व्यस्त रखने के लिए संघर्ष को लम्बा खींचना है.


यह भी पढ़ेंः दक्षिण पूर्व एशिया में चीन के लिए सब कुछ ठीक नहीं है, शी की वियतनाम यात्रा में इसकी झलक देखने को मिली


चीन भारत की चिंताओं का समाधान नहीं करना चाहता

यह विवाद क्षेत्रीय मुद्दों से आगे बढ़कर उन व्यापक उद्देश्यों पर केंद्रित है जिन्हें चीन हासिल करना चाहता है.
ऐतिहासिक रूप से, चीन ने मुख्य रूप से आर्थिक और सैन्य असमानताओं के कारण भारत को अपने से कमतर करके देखा है, चीन अक्सर इसे अपने व संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच की बड़ी प्रतिद्वंदिता के बीच एक मोहरा मानता रहा है.

भारत की बढ़ता महत्त्व चीन के लिए एक चुनौती पेश करता है, जो कि पावर डायनमिक्स के पुनर्मूल्यांकन के लिए जरूरी है. इस संदर्भ में, सीमा विवाद में तनाव का बढ़ना चीन के लिए भारत का ध्यान भटकाने और संसाधनों को बर्बाद करने के लिए एक रणनीतिक उपकरण के रूप में कार्य करता है.

गलवान झड़प के बाद, भारत के प्रति चीन के रुख में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया है, जो जून-अगस्त 2017 में डोकलाम गतिरोध के बाद उसके दृष्टिकोण से बिल्कुल अलग है. जब भारत उस वर्ष के अंत में फिर से जीवित हुए क्वॉड में शामिल हो गया, तो चीन ने अस्थायी रूप से एक मेल-मिलाप दिखाने वाली चाल चली, जिसकी वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच अनौपचारिक शिखर वार्ता की गईं.

हालांकि, गलवान के बाद, ऐसे कूटनीतिक कदमों का कोई स्पष्ट संकेत नहीं है. इस बदलाव को मुद्दे के सार्थक समाधान पर भारत के लगातार जोर देने और इस मोर्चे पर ठोस प्रगति के बिना उच्च स्तरीय बातचीत फिर से शुरू करने की अनिच्छा के लिए भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.

चीनी मीडिया और एक्सपर्ट्स के भीतर भारत के प्रति अपमानजनक विचारों से लेकर तारीफ करने जैसा व्यापक दृष्टिकोण दिखता है. एक खास विश्लेषण में बताया गया है कि भारत केवल चीन के शीत युद्ध के रुख की ही नकल कर रहा है, जो भू-राजनीतिक डायनमिक्स को आकार देने में भारत की भूमिका के प्रति ज्यादा विश्वासजनक देता है.

कुछ चीनी टिप्पणीकारों के बीच एक प्रचलित गलत धारणा यह है कि भारत-अमेरिका संबंधों की लगातार विकसित और गतिशील प्रकृति को नजरअंदाज करते हुए, अमेरिका केवल चीन के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के रूप में भारत के साथ घनिष्ठ संबंध को बढ़ावा दे रहा है.

इन दृष्टिकोणों के बिल्कुल विपरीत, फुडन विश्वविद्यालय के झांग जियाडोंग ने भारत को “मुखर, रूपांतरित और मजबूत” बताया है.

उनका तर्क है कि विदेश नीति में भारत की रणनीतिक सोच स्पष्ट रूप से एक ग्रेट पावर स्ट्रेटजी की ओर बढ़ रही है. दिलचस्प बात यह है कि ये भावनाएं भारत में सत्तारूढ़ दल के कुछ सदस्यों के बीच भी दिखती हैं.

वीबो पर भारत के प्रति प्रचलित भावनाएं काफी हद तक नकारात्मक हैं. हालांकि, इस नकारात्मकता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भारत द्वारा देश में आने वाले चीनी निवेश की कड़ी जांच से जुड़ा है.

विशेष रूप से, एक प्रभावशाली अकाउंट ने जयशंकर के भारत में चीनी निवेश की जांच करने की रणनीति को समाधान और मतभेदों से बचने के आह्वान को गलत तरीके से प्रस्तुत किया, ताकि कथित तौर पर चल रहे विवाद में थोड़ी नरमी  लाई जा सके. कुछ यूज़र्स ने मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में चीन की जगह लेने की भारत की महत्वाकांक्षा में बुनियादी ढांचे की अपर्याप्तता को सबसे बड़ी बाधा बताया और इसे काफी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया.

बढ़ती बयानबाजी के बीच, कुछ लोगों का तर्क है कि भारत मीडिया के माध्यम से कथित चीन के खतरे को बढ़ा चढ़ाकर पेश कर रहा है, चीन को “काल्पनिक दुश्मन” के रूप में बता रहा है और अपनी प्रतिस्पर्धी स्थिति को बेहतर बनाने के लिए भारत-प्रशांत रणनीति में अपनी भागीदारी का रणनीतिक उपयोग कर रहा है.

भारत की चीन नीति सुसंगत बनी हुई है

यह हमें इस बात पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है कि क्या भारत सरकार ने चीन की गलत व्याख्या की या चीन द्वारा उत्पन्न खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर बताया. प्रतिक्रिया नकारात्मक है. चीन ने जानबूझकर मौजूदा मतभेदों का फायदा उठाया है और रणनीतिक फायदे के लिए उन्हें कायम रखा है. नतीजतन, व्यापक सैन्य निर्माण और बार-बार होने वाले गतिरोध के कारण भारत-चीन संबंध लगातार नाजुक स्थिति में बने हुए हैं.

भारत का लक्ष्य अपनी क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता से समझौता किए बिना चीन के साथ संबंधों को मैनेज करने लायक बनाए रखना है. यह नीतिगत रुख कम से कम 2020 से लगातार बना हुआ है. तनावपूर्ण संबंधों के बावजूद, जो 1970 के दशक के बाद से सबसे निचले स्तर के रूप में चिह्नित हैं, भारत ने सैन्य वार्ता को समाप्त नहीं किया है और विदेश मंत्रालय (एमईए) सक्रिय रूप से लगा हुआ है.

हालांकि, दोनों देशों के सर्वोच्च नेतृत्व ने 2019 के बाद से कोई द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन में नहीं बुलाया है. जाहिर तौर पर, शी ने पिछले साल सितंबर में नई दिल्ली में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने से भी परहेज करने का फैसला किया था.

चीन सिर्फ भारत के इरादों को गलत नहीं समझ रहा है; यह ऐतिहासिक रूप से मैत्रीपूर्ण रिश्ते को प्रतिकूल रिश्ते में बदलकर एक रणनीतिक गलती कर रहा है, जिससे मौजूदा विश्वास की खाई और गहरी हो रही है.

चीन को भारत को केवल अमेरिका के साथ अपने संबंधों के चश्मे से देखने से दूर जाना होगा और यह समझना होगा कि नई दिल्ली के पास अपने हितों को आगे बढ़ाने की स्वायत्तता है, जैसा कि उसने लगातार अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय संप्रभुता की रक्षा करके प्रदर्शित किया है.

संबंधों को सामान्य बनाने के लिए चीन एलएसी पर अपनी सैन्य उपस्थिति में वृद्धि को तुरंत रोक दे, वास्तव में भारत की चिंताओं को समझे, और मौजूदा मतभेदों को हल करने में सक्रिय रूप से संलग्न हो. बीजिंग की ओर से वास्तविक प्रयासों की वर्तमान कमी ही भारत-चीन संबंधों में इस तनावपूर्ण अवधि को लम्बा खींचने का काम करती है.

(सना हाशमी, पीएचडी, ताइवान-एशिया एक्सचेंज फाउंडेशन और जॉर्ज एच.डब्ल्यू. अमेरिका-चीन संबंधों के लिए फाउंडेशन में फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @sanahashmi1 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

(संपादनः शिव पाण्डेय)
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


यह भी पढ़ेंः मालदीव लंबे समय तक भारत-चीन प्रतिस्पर्धा का फायदा नहीं उठा सकता, मुइज्ज़ू को श्रीलंका से सीखना चाहिए


 

share & View comments