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चौरी-चौरा स्मारक स्थल/गोरखपुर एनआईसी
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4 फरवरी 1922 की चौरी-चौरा की घटना न केवल भारतीय इतिहास, बल्कि विश्व इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है. चौरी-चौरा के डुमरी खुर्द के लाल मुहम्मद, बिकरम अहीर, नजर अली, भगवान अहीर और अब्दुल्ला के नेतृत्व में किसानों ने ज़मींदारों और ब्रिटिश सत्ता के प्रतीक चौरी-चौरा थाने को फूंक दिया. इसमें अंग्रेज़ी सरकार के 23 सिपाही मारे गए.

आधुनिक भारत का इतिहास चौरी-चौरा के संदर्भ के बिना पूरा नहीं होता. लेकिन अक्सर इस घटना को ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ आमजन के असंतोष की स्वत: स्फूर्त अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है. बहुत कम इतिहासकारों ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि यह घटना पिछड़े, दलित और मुस्लिम गरीब किसानों की स्थानीय उच्च जातीय ज़मींदारों और ब्रिटिश सत्ता के गठजोड़ के खिलाफ बगावत थी, जिसकी लंबे समय तक तैयारी की गई थी. थाना जलाने की योजना इसमें शामिल नहीं थी.

शाहिद अमीन जैसे सबल्टर्न इतिहासकारों ने अपनी किताब ‘इवेंट, मेटाफर, मेमोरी चौरी-चौरा 1922-1992 (2006) में घटना के पीछे आमजन में स्थानीय ज़मींदारों और ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ असंतोष-आक्रोश को रेखांकित करने की कोशिश की है. इसके पहले राममूर्ति ने ‘चौरी-चौरा-1922 (1982) और अनिल कुमार श्रीवास्तव ने चौरी-चौरा स्वातंत्र्य समर (1986) में इस दिशा में कोशिश की थी. लेकिन इस संदर्भ में सबसे प्रामाणिक किताब पेंगुइन बुक्स से ‘चौरी-चौरा: विद्रोह और स्वाधीनता आंदोलन’ (2014) सुभाष चंद्र कुशवाहा की आई.

उन्होंने तथ्यों, देशी-विदेशी दस्तावेज़ों और लोक में चौरी-चौरी की स्मृति को आधार बनाकर एक विश्वसनीय इतिहास लिखा. चौरी-चौरा की घटना को देखने परंपरागत नज़रिए को चुनौती दी और पूरे घटनाक्रम को बहुजन परिप्रेक्ष्य के साथ प्रस्तुत किया.

इस किताब में तथ्यों के साथ इस बात को स्थापित किया गया कि चौरी-चौरा विद्रोह मुख्यत: दलित, पिछड़े, और मुस्लिम गरीब किसानों की क्रांतिकारी बगावत थी. 4 फरवरी 1922 के दिन दलित बहुल डुमरी खुर्द गांव के गरीब और सामाजिक तौर पर अपमानित दलितों-बहुजनों और मुसलानों ने उच्च जातीय जमींदारों और ब्रिटिश सत्ता के गठजोड़ को खुलेआम चुनौती दी और कुछ समय के लिए ही सही चौरी-चौरा के इलाके पर अपना नियंत्रण कायम कर लिया.

इस घटना की तुलना बास्तील के किले पर फ्रांस की जनता के हमले और कब्ज़े से की जाती है. 14 जुलाई 1789 को फ्रांस की विद्रोही जनता ने फ्रांसीसी राजसत्ता के गढ़ बास्तील के किले पर पर कब्ज़ा कर लिया था. इसी घटना ने फ्रांसीसी क्रांति का आगाज़ किया था.

स्वतंत्रता आंदोलन के सभी इतिहासकारों ने चौरी-चौरा की घटना का उल्लेख किया है. लेकिन प्रमाणिक तथ्यों, इतिहास के सभी दस्तावेज़ों और जनता के बीच इस घटना की स्मृतियों को आधार बनाकर सुभाष चंद्र कुशवाहा ने एक मुकम्मल इतिहास प्रस्तुत किया. उन्होंने बताया है कि ये बगावत अंग्रेज़ों के खिलाफ तो थी है. साथ ही मोहनदास करमचंद गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस की ज़मींदार समर्थक नीतियों के भी खिलाफ लोगों का गुस्सा फूट पड़ा था.

जिन किसानों ने इस विद्रोह में भाग लिया और खासकर जिन लोगों ने इसका नेतृत्व किया वे लोग स्वयं को कांग्रेस का स्वयंसेवक मानते थे और गांधी जी के स्वराज का अर्थ ज़मींदारों और पुलिस के अन्याय और अत्याचारों से मुक्ति भी मानते थे. ग्रामीण आबादी के सबसे नजदीक ब्रिटिश सत्ता के केंद्र के रूप में थाना ही था, जहां वे अपना विद्रोह जता सकते थे. 4 फरवरी, 1922 को उन्होंने उस सत्ता को न केवल चुनौती दी, बल्कि विद्रोह की रात, चौरी चौरा रेलवे स्टेशन और डाकघर पर तिरंगा फहरा कर, अपने संघर्ष का मकसद समाज के सामने रखा.

इस विद्रोह में चौरी-चौरा के 40 किलोमीटर के दायरे के 60 गांवों के गरीब किसान शामिल हुए थे. इनकी संख्या 2 से 3 हज़ार के बीच थी. इस बगावत के नेता अब्दुल्ला चूड़ीहार, भगवान अहीर, बिकरम अहीर, नजर अली, रामस्वरूप बरई आदि थे. चौरी-चौरा की बगावत के लिए 19 लोगों को फांसी दी गई थी. इन 19 लोगों में अब्दुल्ला, भगवान अहीर, बिकरम अहीर, दुधई, कालीचरन कहार, लवटू कहार, रघुबीर सुनार, रामस्वरूप बरई, रूदली केवट, संपत चमार आदि को फांसी दी गई थी. जाति के आधार पर देखें तो अहीर जाति के 4, कहार 3, मुसलमान 3 और केवट जाति के 2 लोगों को फांसी दी गई. 19 लोगों को फांसी देने के साथ ही, 14 लोगों को आजीवन कारावास और 96 लोगों को अलग-अलग तरह की सज़ाएं दी गई थी.

इस घटना ने उच्च जातीय ज़मींदारों-राजा, नवाबों और ब्रिटिश सत्ता को हिला दिया. यह खबर पूरी दुनिया में फैल गई. जहां एक ओर दुनिया भर के जनपक्षधर क्रांतिकारी ताकतों ने इसका स्वागत किया और भारत में क्रांतिकारी तूफान की शुरुआत के रूप में देखा, वहीं उच्च जातीय ज़मींदारों को अपने संगठन की रीढ़ मानने वाली कांग्रेस पार्टी और उसके नेता गांधी इस विद्रोह से घबरा उठे. उन्होंने मेहनतकश गरीब जनता की इस बगावत को ‘गुंडों का कृत्य’ या ‘उपद्रवियों का कृत्य’ कहा. ऐसा कह कर वे सीधे-सीधे उच्च जातीय ज़मींदारों और ब्रिटिश सत्ता के पक्ष में खड़े हो गए.

चौरी-चौरा संघर्ष की हकीकत को ज़्यादातर इतिहासकारों ने छिपाया और तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया. हम सभी जानते हैं कि भारत के ज़्यादातर इतिहासकार उच्च जातीय और उच्चवर्गीय इतिहास दृष्टि के शिकार रहे हैं, इसमें बहुत सारे वामपंथी इतिहासकार भी शामिल हैं.

दलित-बहुजन समाज के सघर्षों और उसके नायकों की निरंतर द्विज इतिहासकारों द्वारा उपेक्षा की जाती रही है, यह चीज़ चौरी-चौरा की घटना के संदर्भ में भी हुई. इस संदर्भ में सुभाष चंद्र कुशवाहा कहते हैं, ‘मेरे जेहन में जब भी चौरी-चौरा विद्रोह का स्मरण आता है, तो सोचता हूं कि आज़ादी की लड़ाई में ब्रिटिश सत्ता को नेस्तानाबूद करने वाले इस इकलौते कृत्य को गौरवान्वित करने के बजाय, उपेक्षित करने का कारण भारतीय सामंती समाज के उस वर्ग चरित्र का हिस्सा तो नहीं, जहां गरीब किसानों, मुसलमानों और कथित निम्न जातियों को हमेशा उपेक्षित और तिरस्कृत किया गया है.’

कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन के वर्गीय चरित्र पर तो वामपंथी इतिहासकार एक हद तक प्रश्न उठाते हैं, लेकिन ये आंदोलन उच्च जातियों के नेतृत्व में जातीय वर्चस्व का भी संघर्ष था, इसे देखने की कोशिश नहीं करते. डॉ. आंबेडकर ने निरंतर स्वतंत्रता आंदोलन के उच्च जातीय चरित्र को अपने विमर्श और संघर्ष के केंद्र में रखा. यही काम प्रेमचंद ने अपने उपन्यास गोदान में किया है. गोदान का केंद्रीय निष्कर्ष यह है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की नेतृत्वकारी शक्तियां उच्च जातीय और उच्च वर्गीय हैं.

सुभाषचंद्र कुशवाहा चौरी-चौरा के किसानों की बगावत को किसी स्थानीय कांड के रूप में नहीं लेते. वे इसके विश्वव्यापी और देशव्यापी फलक को प्रस्तुत करते हैं. दुनिया भर की जनता के संघर्षों के इतिहास के साथ चौरी-चौरा के इतिहास को जोड़ते हुए वे लिखते हैं, ‘चौरी-चौरा का किसान विद्रोह भारतीय इतिहास की कई फंतासियों, मिथकों और कुलीनतावादियों के दोगले चरित्र का पर्दाफाश करते हुए, इस तथ्य को भी रूपायित करता जान पड़ता है कि किसी गुलाम देश की आजादी, सिर्फ किसी व्यक्ति विशेष के प्रयासों से नहीं मिलती. आजादी के लिए हमेशा जनसंघर्ष की जरूरत पड़ती है. ऐसे संघर्षों में कई बार हिंसा की उपस्थिति अधिनायकवादियों द्वारा अनिवार्य बनी दी जाती है तो कई बार स्वयं की हिफाज़त के लिए भी हिंसा ज़रूरी हो जाती है. आत्मरक्षार्थ शस्त्र लाइसेंस देने के पीछे दुनिया भर में यही सिद्धांत अपनाया जाता है.’

इस विद्रोह के सामाजिक चरित्र को उजागर करते हुए सुभाष कुशवाहा लिखते हैं, ‘गोरखपुर के गरीब और अस्पृश्यों का यह विद्रोह, अंग्रेजों से लोहा लेने और प्राणों की आहुति देने वाले दक्षिण के मोपला विद्रोह और राजस्थान के भील विद्रोह के समान उच्च आदर्श प्रस्तुत करता है’. स्वंयसेवकों ने अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए, इस विद्रोह को अंजाम देने के लिए एक हद तक रणनीति भी बना ली थी. 4 फरवरी की सभा को सफल बनाने के लिए मात्र दो दिन की तैयारी में 40 किलोमीटर की परिधि के लगभग 60 गांवों के स्वयंसेवकों को बुलाकर एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत की थी. गोरखपुर के कांग्रेसी मुख्यालय का नेतृत्व न मिलने के बावजूद उन्होंने अपना नेतृत्व विकसित किया और उसके निर्देशों का पालन भी किया.’

चौरी-चौरा के 60 गांवों के गरीब किसानों के विद्रोह के कारणों का विश्लेषण करते हुए लेखक लिखता है, ’किसान विद्रोहों के पीछे थानेदार गुप्तेश्वर सिंह और अंग्रेजों द्वारा पोषित जमींदारों के जुल्म, जनता में आक्रोश पैदा कर रहे थे. दूसरी ओर गांधी, ‘महात्मा’, ‘फकीर’, ‘देवता’ और ‘चमत्कारिक पुरुष’ के रूप में समाचार पत्रों तथा देख अभिजात्यों द्वारा स्थापित किए जाने के बावजूद, किसानों की किसी भी समस्या का हल, कांग्रेसी आंदोलन के पास नहीं दिख रहा था. यहां तक कि ज़्यादातर जुल्म ढाने वाले ज़मींदार कांग्रस के समर्थक थे.’

आधुनिक भारत के इतिहास में दो समानांतर धाराएं चल रही थी. एक उच्च जातीय धारा थी, जिसका लक्ष्य सिर्फ ब्रिटिश सत्ता को हटाकर उसका स्थान स्वयं लेना था. जबकि दूसरी धारा बहुजनों की थी, जो ब्रिटिश सत्ता से मुक्ति के साथ उच्च जातियों की सत्ता से भी मुक्ति चाहती थी. चौरी-चौरा को लेकर इसलिए दो तरह का इतिहास लेखन हुआ है.

(लेखक फारवर्ड प्रेस हिंदी के संपादक हैं.)


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