एमके स्टालिन काफी जोर देकर यह कह रहे हैं कि भारत में संघीय व्यवस्था का संतुलन बिगड़ गया है. उनकी मुख्य शिकायत समझना मुश्किल नहीं है. केंद्र सरकार ने सालों में ऐसे काम करने की आदत बना ली है जिसमें सब कुछ केंद्रीकृत योजनाओं और सख्त शर्तों वाली स्कीमों के जरिए चलता है, जिससे राज्य सरकारें सिर्फ बड़े अमल करने वाले विभाग बनकर रह जाती हैं.
श्रेय ऊपर जाता है, और दोष नीचे आता है. स्टालिन का सुझाया हुआ हल कमजोर केंद्र नहीं है. वह यह बात साफ कहते हैं. वह “सही आकार का” केंद्र चाहते हैं. यह जो आम जवाब दिया जाता है कि राज्यों में प्रशासनिक क्षमता की कमी है, वह सच में खुद ही सच साबित हो जाने वाली बात है. अगर किसी सरकार को लंबे समय तक असली अधिकारों से दूर रखा जाए, तो वह उन अधिकारों का इस्तेमाल करने की ताकत भी खो देती है.
अब तक की बात ठीक लगती है. लेकिन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की दलील को संविधान की कुछ असुविधाजनक बातों के सामने परखने की जरूरत है, जिन पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता.
संविधान क्या कहता है
राजनीतिक चर्चा, अकादमिक लेखन और अब तो अदालतों के फैसलों में भी भारत की “संघीय संरचना” या “संघीय व्यवस्था” की बात करना काफी आम हो गया है. लेकिन “फेडरेशन” या उसका कोई भी रूप भारत के संविधान में कहीं भी नहीं लिखा है. यह जानबूझकर किया गया फैसला था. संविधान बनाने वालों ने भारतीय गणराज्य को ऐसे राज्यों का समझौता नहीं माना जो पहले से संप्रभु थे और बाद में मिलकर एक हुए. उन्होंने एक यूनियन बनाई, और यह फर्क बहुत मायने रखता है.
जब 15 अगस्त 1947 की आधी रात को ब्रिटिश राज खत्म हुआ, उसी समय जवाहरलाल नेहरू ने अपना मशहूर “नियति से मुलाकात” वाला भाषण दिया. उस समय 565 रियासतें, जो तकनीकी रूप से संप्रभु थीं, उन्हें तय करना था कि वे किसके साथ जाएंगी. मुश्किल से दो साल के भीतर, 562 रियासतें भारतीय संघ में शामिल हो गईं. यह कूटनीति, राजनीतिक दबाव और जरूरत पड़ने पर ताकत के इस्तेमाल से हुआ, जैसे हैदराबाद के मामले में. यह स्वेच्छा से बना कोई संघीय गठबंधन नहीं था, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया थी, जिसका नेतृत्व मुख्य रूप से सरदार वल्लभभाई पटेल और वी. पी. मेनन ने किया. आज जो राज्य मौजूद हैं, उन्होंने मिलकर यूनियन नहीं बनाई. ज्यादातर मामलों में यूनियन ने ही उन्हें बनाया.
संविधान के अनुच्छेद 2 और 3 इस ढांचे को साफ करते हैं. संसद साधारण कानून बनाकर नए राज्य बना सकती है, मौजूदा राज्यों की सीमाएं बदल सकती है और किसी राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदल सकती है. इसके लिए संविधान संशोधन की जरूरत नहीं होती. तेलंगाना का निर्माण, पंजाब पुनर्गठन अधिनियम 1966 और हाल ही में जम्मू कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटना, यह सब साधारण संसदीय कानून से किया गया. अनुच्छेद 256, 257 और 356 इस तस्वीर को पूरा करते हैं. अगर केंद्र सरकार तय शर्तों में किसी राज्य सरकार को प्रभावी रूप से निलंबित कर सीधे दिल्ली से शासन कर सकती है, तो परंपरागत अर्थ में इसे बराबर इकाइयों का संघ कहना मुश्किल है.
वित्तीय शिकायतें
इन बातों से यह तय नहीं हो जाता कि केंद्र और राज्यों के बीच अभी जो वित्तीय और विधायी ताकत का संतुलन है, वह सही या बेहतर है या नहीं. मेरी राय में, यह सही नहीं है.
सेस और सरचार्ज का बढ़ता इस्तेमाल बड़ी शिकायत का कारण रहा है, और सही भी है. इन्हें उस हिस्से में नहीं रखा जाता जो राज्यों के साथ बांटा जाता है, और न ही वित्त आयोग के जरिए इनका बंटवारा होता है. इससे केंद्र सरकार अपनी आय बढ़ा लेती है और ऊपर से ऐसा दिखाती है जैसे उसने राज्यों को उदारता से ज्यादा हिस्सा दिया हो. जीएसटी व्यवस्था के अपने फायदे हो सकते हैं, लेकिन इसने राज्यों की खुद से राजस्व जुटाने की ताकत और कम कर दी है. जब टैक्स और कर्ज लेने दोनों पर केंद्र का नियंत्रण हो, तो राज्यों की असली वित्तीय स्वतंत्रता सिर्फ नाम की रह जाती है. केंद्र प्रायोजित योजनाएं, जिनमें सख्त शर्तें होती हैं, राज्य सरकारों को स्वतंत्र लोकतांत्रिक सरकार की जगह सिर्फ केंद्रीय मंत्रालयों के फील्ड ऑफिस जैसा बना देती हैं.
समय के साथ राज्य सूची के विषयों को समवर्ती सूची में लाया गया है, जिसमें शिक्षा सबसे बड़ा उदाहरण है. इससे समस्या और बढ़ी है. नतीजा यह हुआ है कि व्यवहार में ज्यादा केंद्रीकरण हो गया है, चाहे संविधान का ढांचा कुछ भी कहता हो.
राजनीतिक चेतावनी की घंटी
दक्षिण के पांच राज्यों, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच केंद्र राज्य संबंधों पर बढ़ती एकजुटता एक बड़ा संकेत है. उनकी खास शिकायतें जानी पहचानी हैं, परिसीमन, वित्तीय हस्तांतरण और सबसे ज्यादा भावनात्मक मुद्दा, भाषा.
परिसीमन को लेकर चिंता सही है. 1971 से सीटों के बंटवारे पर लगी रोक खुद एक राजनीतिक समझौता था. जिन राज्यों ने परिवार नियोजन को अच्छे से लागू किया, उन्हें चुनावी रूप से सजा नहीं दी जाएगी. अगर इस समझौते को बिना किसी संतुलन के फिर से खोला जाता है, तो यह जनसंख्या नीति पर गलत संदेश देता है. लोकसभा की कुल सीटें बढ़ाने का विकल्प, बजाय मौजूदा सीटों को बांटने के, गंभीरता से सोचा जाना चाहिए.
वित्तीय हस्तांतरण के मामले में, जो राज्य अच्छा प्रदर्शन करते हैं और राष्ट्रीय कर संग्रह में ज्यादा योगदान देते हैं, लेकिन जिन्हें पैसा मुख्य रूप से पिछड़ेपन के आधार पर मिलता है, वे हमेशा इस व्यवस्था को प्रदर्शन के खिलाफ मानेंगे. इसके पीछे तकनीकी वजहें चाहे जो हों, यह धारणा समय के साथ संघीय भरोसे को कमजोर करती है.
भाषा तीनों मुद्दों में सबसे ज्यादा भावनात्मक है और इस पर तर्क से बात करना सबसे मुश्किल है. प्रशासनिक और संस्थागत व्यवस्था अगर हिंदी को बिना किसी साफ नीति के भी धीरे धीरे राष्ट्रीय भाषा जैसी स्थिति दे, तो भी कड़ी राजनीतिक प्रतिक्रिया होना तय है. तमिलनाडु का हिंदी थोपने के खिलाफ इतिहास यहां दोहराने की जरूरत नहीं है.
इसमें विडंबना साफ दिखती है
लेकिन इस बहस का एक पहलू ऐसा भी है, जिस पर दक्षिणी राज्यों को ईमानदारी से सोचना चाहिए. 73वां और 74वां संविधान संशोधन, जो 30 साल से ज्यादा पहले लागू हुए थे, उसी तरह के विकेंद्रीकरण के लिए बनाए गए थे, जिसकी मांग ये राज्य आज केंद्र सरकार से कर रहे हैं, बस यह विकेंद्रीकरण राज्य के अंदर, यानी नीचे के स्तर पर होना था.
ज्यादातर राज्यों में, जिनमें दक्षिणी राज्य भी शामिल हैं, इसका नतीजा मिला जुला रहा है. स्थानीय निकायों को अक्सर सिर्फ काम लागू करने वाली इकाई की तरह देखा जाता है. राज्य वित्त आयोग की सिफारिशें अक्सर ठंडे बस्ते में पड़ी रहती हैं. यह विडंबना साफ है कि एक राज्य सरकार दिल्ली से वित्तीय स्वतंत्रता की मांग करे, लेकिन अपने ही नगर निगमों और ग्राम पंचायतों को न पैसा दे और न ही फैसले लेने का अधिकार. इसे सही ठहराना और भी मुश्किल है. अगर सहकारी संघवाद का कोई मतलब है, तो वह सबसे नीचे तक लागू होना चाहिए.
क्या बदलना जरूरी है
भारत को जिस बदलाव की जरूरत है, वह न तो उतना बड़ा है जितना स्टालिन बताते हैं, और न ही उतना गैर जरूरी है जितना दिल्ली मान लेती है. जो सेस और सरचार्ज राज्यों के साथ बांटे जाने वाले हिस्से से बाहर रखे जाते हैं, उनके लिए साफ और पारदर्शी ढांचा होना चाहिए, जिसमें राज्यों की असली भागीदारी हो. केंद्र प्रायोजित योजनाओं की सख्त शर्तों की पूरी व्यवस्था पर गंभीरता से फिर से सोचने की जरूरत है. परिसीमन के मामले में, जनसंख्या के गणित से ज्यादा राजनीतिक समझदारी को महत्व मिलना चाहिए. और भाषा के मुद्दे पर, केंद्र अगर थोड़ा संस्थागत विनम्रता दिखाए, तो उससे काफी फर्क पड़ सकता है.
संघ तभी मजबूत रहेगा जब उसे न्यायसंगत माना जाएगा. और राज्यों को भी याद रखना चाहिए कि यही बात उतनी ही मजबूती से उनकी अपनी स्थानीय सरकारों के साथ संबंधों पर भी लागू होती है.
दिल्ली में कौन सुन रहा है? और राज्यों की राजधानियों में कौन सुन रहा है?
के बी एस सिद्धू पंजाब के पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और स्पेशल चीफ सेक्रेटरी के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं. उनका एक्स हैंडल @kbssidhu1961 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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