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दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन और रणबीर कपूर | दिप्रिंट
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नई दिल्ली: अक्सर कहा जाता है फिल्में हमारे समाज का आईना होती है. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के 100 साल पूरे हो चुके हैं. बॉलीवुड ने पीछे बज रहे बैकग्राउंड म्यूजिक और आगे एक पेड़ के इर्द-गिर्द  हो रहे नृत्य से लेकर रिमिक्स के दौर तक न जाने कितने रंगों को देखा है. ऐसे में पूरे भारत में धूमधाम से मनाए जाने वाले त्योहार होली का ‘रंग’ कैसे अछूता रहता. 1940 में आई फिल्म ‘औरत’ से लेकर 2014 में रिलीज हुई ‘रामलीला’ तक होली का त्योहार समाज के बदलते परिवेश, कपड़े, और गानों में बदले सुर-लय-ताल को भी दर्शाता है. एक नजर डालते हैं बॉलीवुड के कुछ रंग-बिरंगे गीतों पर. जिनके बिना हमारी होली अधूरी है.

होली को जिसने हिंदी फिल्मों में इंट्रोड्यूस कराया

1940 में भारतीय सिनेमा को फलक तक पहुंचाने वाले महमूद की एक फिल्म आई थी ‘औरत’.  जिस समय यह फिल्म आई थी, वो ब्लैक एंड व्हाईट सिनेमा का दौर था. होली के सारे रंग, अबीर-गुलाल, नायक-नायिकाओं के रंग-बिरंगे कपड़े सब कुछ केवल दो ही रंग में नजर आ रहे थे. काला और सफेद. फिल्म में एक अदम्य औरत राधा को दिखाया गया है, जो तमाम संघर्षों और चुनौतियों से गुजरती है. ये उस वक्त के हमारे समाज का प्रतिबिंब था. तीन घंटे की इस फिल्म में लगभग 2 मिनट का होली का एक गाना है. इस गाने में पारंपरिक कपड़े पहने लोग एक दूसरे पर रंग उड़ेल रहे हैं. गाने के बोल हैं- ‘जमुना तट होली खेले श्याम.’ महमूद ने बाद में चलकर इस फिल्म का रिमेक बनाया, ‘मदर इंडिया’, जो कि भारत के सिनेमाई इतिहास की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक है.

 

आया कलरफुल होली का दौर

40-50 के दशक में हिंदी सिनेमा में होली पर एक से बढ़कर एक गीत लिखे गए. शुरुआत 1950 में आई फिल्म जोगन का गीत ‘डारो रे रंग, डारो रे रसिया’ जिसे गीता दत्त ने अपनी सुरीली आवाज में गाया था और यह मीरा के भजन पर आधारित था. लेकिन होली को सबसे बड़ा पहचान मिलनी शुरू हुई 1953 में आई दिलीप कुमार अभिनित फिल्म ‘आन’ के गाने ‘खेलो रंग, हमारे संग.’ गाने की खास बात यह थी कि पहली बार होली के रंगों को बॉलीवुड में दिखाया गया था.  उस समय रंगीन फिल्मों का दौर लगभग शुरू हो चुका था और महबूब खान ने अपनी इस फिल्म में उसे बखुबी इस्तेमाल किया. इस गाने के बोल शकील ने लिखे थे और संगीत नौशाद ने दिया था. जिससे हमें समझ सकते कि बॉलीवुड और होली में किसी मजहब का बैरियर बीच में नहीं आता है.

शाही होली भी है हिंदी फिल्म के इस गाने में  

अपने जमाने के सुपरस्टार और मेथड एक्टिंग से अपनी अलग पहचान बनाने वाले दिलीप कुमार पर 60 के दशक तक आते-आते ट्रेजडी किंग का तमगा लग चुका था. लेकिन अपनी जानदार अभिनय के लिए याद किए जाने वाले दिलीप कुमार ने 1960 में एक फिल्म की ‘कोहिनूर’. जिसमें दिलीप और मीना कुमारी ने राजा-रानी का रोल निभाया है. इसी फिल्म का एक गीत है ‘तन रंग लो जी, आज मन रंग लो.’ इसमें आम जनमानस की होली से हटकर रजवाड़े की शाही होली को दिखाया गया है.

प्रेम की अभिव्यक्ति को प्रदर्शित करते होली के गीत

ऐसा नहीं है कि केवल फिल्में हमारे समाज से ली गई कहानियों को गढ़ता है, कई बार रुपहले पर्दे पर होने वाली चीज़ों से समाज के बड़े तबके को एक संदेश पहुंचता है. जिसमें होली को केवल रंगों का ही नहीं प्रेम की अभिव्यक्ति और समाज द्वारा होली के दिन उपेक्षित की जा रही विधवाओं को साथ में लेने का भी त्योहार है. 1970 में आई फिल्म ‘कटी पतंग’ के गाने ‘आज न छोड़ेगे हमजोली, खेलेंगे हम होली’ में  विधवा आशा पारेख और राजेश खन्ना के प्रेम को इस सदाबहार गाने से दिखाया गया है.

दुश्मन भी दोस्त बन जाते हैं

इसके बाद 1975 में रमेश सिप्पी की फिल्म आई ‘शोले’. जिस तरह इस पिक्चर के बिना हिंदी सिनेमा की कल्पना करना गुनाह है वैसे ही होली पर इस फिल्म का गाना ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं, रंगों में रंग मिल जाते हैं’ के बिना सबकुछ अधूरा है. इस गाने में हेमा मालिनी और धर्मेंद्र होली की हुल्लड़बाजी से सराबोर जमकर नाच-गा रहे हैं वहीं शर्मिले अमिताभ और आंखें झुकाकर मंद-मंद मुस्कान के साथ खड़ी विधवा जया बच्चन एक दूसरे से इशारों-इशारों में प्रेम की अभिव्यक्ति प्रकट करते हुए देखे जा सकते हैं. गाने के बीच की लाइन..’दुश्मन भी दोस्त बन जाते हैं.’ होली के त्योहार का एक सरल संदेश देता है.

होली के गानों में प्रेम का एक अलग रूप अगर किसी गीत में दिखा तो वो यश चोपड़ा की ‘सिलसिला’ फिल्म के गाने ‘रंग बरसे भीगे चुनर वाली’ में. इस गीत में एक पति (अमिताभ बच्चन) अपनी पत्नी(जया बच्चन) के सामने अपनी पूर्व प्रेमिका (रेखा) से हंसी ठिठोली करते हुए होली खेलते दिखाई देता है.

 

परिवारों को जोड़ती होली

साल 2000 तक आते-आते हिंदी सिनेमा और भारतीय समाज में काफी कुछ बदल चुका था. 70 और 80 के दशक में बॉलीवुड पर एकछत्र राज करने वाले अमिताभ 90 के दशक में आते-आते काफी उबाऊ लगने लगे थे और देखते-देखते वो सीन से कुछ सालों के लिए गायब हो गए. लेकिन फिर 2003 में अमिताभ ने वापसी की फिल्म ‘बागबान’ से. इसमें फिल्माए गए एक होली गीत ‘होली खेले रघुबीरा’ में अपने मां-बाप को छोड़ अपनी पत्नी के साथ कहीं और बस जाने वाले लोगों को वापस मां-बाप के साथ होली खेलते दिखाया गया है. कैसे ये त्योहार परिवारों को जोड़ने का और टूट के बिखरने से बचाता है.

और आई शहरी युवाओं की होली

2010 आते-आते होली के गानों से गांव का देशी कलचर गायब हो चुका था. शहरी में रहने वाले लोग या फिर कॉलेज के युवा-युवतियां होली के दिन मिली छुट्टी को किस तरह इस्तेमाल करते यह गानों मे दिखाया जाने लगा. गानों के अल्फाज़ों में आम-बोल चाल की भाषा का धड़ल्ले से इस्तेमाल होने लगा.  चाहे अक्षय कुमार और प्रियंका चोपड़ा पर फिल्माया ‘वक्त द रेस अगेंस्ट टाइम’ का गीत ‘डू मी फेवर लेट्स प्ले होली ‘ हो या फिर रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण की फिल्म ‘जवानी दिवानी’ का गाना ‘बल्म पिचकारी.’

होली पर बने ढ़ेरों फिल्मी गीतों से एक बात तो साफ है कि बॉलीवुड और होली का गहरा नाता है और दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं. अपने दौर का कोई भी बड़ा सितारा हो दिलीप कुमार, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान और रणबीर कपूर सबकी फिल्मों में होली का गाना जरूर रहा है. चाहे वो खुद की छवि गढ़ने के लिए हो या फिर अपनी बनी बनाई इमेज से बाहर निकलने के लिए. होली बाकि भारतीय त्योहारों के सामने थोड़ा इठला जरूर सकता है कि अन्य सारे त्योहारों के बीच सबसे ज्यादा भाव उसी को मिला है.


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