यह एक सोचने की आदत है: बीते वर्षों में आपने नेशनल हेराल्ड मामले की जितनी भी कवरेज देखी है, उसे याद कीजिए—प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच, चौंकाने वाले आरोप, राहुल गांधी से 50 घंटे से ज्यादा की पूछताछ, वगैरह. अभियोजन पक्ष के इशारों और बिना जांचे दावों को, बचाव पक्ष की तुलना में, कितना ज्यादा स्थान मिला?
अगर साफ नज़र से देखें, तो बचाव पक्ष खुद ही सब कह देता है. जब कोई पैसा हाथों-हाथ गया ही नहीं, तो मनी-लॉन्ड्रिंग कैसे हो सकती है? जो गैर-लाभकारी संस्था एक डूबती कंपनी को अपने हाथ में लेकर उसे फिर से खड़ा करती है—जो नेशनल हेराल्ड चलाती है, उसे धोखाधड़ी का दोषी कैसे ठहराया जा सकता है, जब कानून में लंबे समय से यह तय है कि शेयरधारक मालिक नहीं होते? जिन 1,057 शेयरधारकों को ईडी ने “गलत नुकसान” झेलने वाला बताया, उनमें से एक ने भी कानूनी शिकायत दर्ज नहीं की.
लेकिन यह कॉलम नेशनल हेराल्ड केस के बारे में नहीं है (पूरी जानकारी के लिए: लेखक का संबंध आरोपियों में से एक से है), बल्कि “घोटाला” कवरेज उद्योग के बारे में है—प्रेरित लीक, चीखते एंकर और झुकी हुई खबरें, जिनका मकसद सच बताना नहीं, बल्कि धारणाओं को धुंधला करना है.
ED की ज़रूरत से ज्यादा दखलअंदाज़ी
जब आखिरकार फैसले आते हैं, तो वे अक्सर मीडिया के शोर के उलट होते हैं. बोफोर्स, 2जी और अब नेशनल हेराल्ड में, अदालतों के फैसले मीडिया-ट्रायल और जांच एजेंसियों की ज़रूरत से ज्यादा दखल दोनों पर सवाल उठाते हैं. फिर भी, एजेंसियों या मीडिया संस्थानों पर कोई ठोस सजा न होने से यह चक्र फिर से शुरू हो जाता है.
दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट द्वारा नेशनल हेराल्ड मामले में ईडी की चार्जशीट खारिज किए जाने को देखिए. अदालत ने कहा कि धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत कार्यवाही बिना किसी “मूल अपराध” के, जिसे एफआईआर का समर्थन हो—चल ही नहीं सकती और खासकर बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की निजी शिकायत के आधार पर तो बिल्कुल नहीं.
यह बात “तकनीकी” लग सकती है, लेकिन असली कहानी फैसले के शब्दों में है और वह अभियोजन के लिए अच्छी नहीं है. फैसले में कहा गया कि 2014 से 2021 के बीच ईडी के अलग-अलग स्तरों के कानून अधिकारियों को कोई “मूल अपराध” नहीं मिला. सीबीआई, जिसे डॉ. स्वामी के आरोप कम से कम 28.07.2014 से पता थे, ने भी सहमति जताई और इन आरोपों पर एफआईआर दर्ज न करने का फैसला किया. मतलब साफ है, दोनों एजेंसियों को इस मामले में दम नहीं दिखा. यह वह बात नहीं थी जो टीवी एंकर चिल्ला-चिल्ला कर बता रहे थे, है न?
फिर 2021 में ईडी ने अचानक स्वामी की आठ साल पुरानी शिकायत को फिर से खोल दिया. अदालत ने इसे “एकतरफा ज़रूरत से ज्यादा दखल” और पीएमएलए की “गलत समझ” बताया और तंज कसते हुए कहा कि “शायद ईडी को भी सीबीआई की तरह संयमित रहना चाहिए था”. यह समझना मुश्किल नहीं कि यह यू-टर्न किन ऊंचे दबावों में लिया गया.
पहले ऐसे फैसले पर हफ्तों तक मीडिया में हंगामा मच जाता, लेकिन आज ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग सरकार के प्रवर्तक की तरह काम करते हैं और एनडीटीवी से लेकर बेनेट कोलमैन और इंडिया टुडे तक को निशाना बनाते हैं. ऐसे में कौन सिर्फ औपचारिक कवरेज से आगे जाने की हिम्मत करेगा?
वही पुराना पैटर्न फिर सामने आता है: सनसनीखेज लीक से उन्मादी कवरेज होती है, मामले अदालत में ढह जाते हैं और आरोपियों को जनता की अदालत में पहले ही दोषी ठहरा दिया जाता है. राजनीतिक फायदा—लगभग हमेशा—बीजेपी को ही मिलता है.
जनता की धारणा जीतना
2जी मामले में, पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा और अन्य लोगों पर 2007 में 2जी टेलीकॉम लाइसेंस के आवंटन को लेकर आपराधिक साजिश, जालसाजी और भ्रष्टाचार के आरोप लगे. मीडिया में जबरदस्त हंगामा हुआ, जिससे यूपीए सरकार को भारी राजनीतिक नुकसान हुआ, लेकिन आठ साल बाद, सीबीआई की विशेष अदालत को किसी भी तरह की आपराधिकता का कोई सबूत नहीं मिला. अदालत ने कहा कि सीबीआई की चार्जशीट “सरकारी रिकॉर्ड को गलत पढ़ने, चुनिंदा पढ़ने, न पढ़ने और संदर्भ से बाहर पढ़ने” पर आधारित थी.
न्यायमूर्ति ओ.पी. सैनी के 21 दिसंबर 2017 के फैसले का यह पैराग्राफ सब कुछ कह देता है:

आप में से कुछ लोगों को बोफोर्स घोटाला याद होगा, जो 1987 में तब सामने आया था, जब एक स्वीडिश अखबार ने खुलासा किया कि भारत द्वारा बोफोर्स एफएच-77बी तोपों की खरीद में एजेंटों को अवैध कमीशन दिया गया था. चुनावों में इसका असर यह हुआ कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को राजनीतिक रूप से भारी नुकसान हुआ. 1984 में ऐतिहासिक जीत के बाद उन्हें संसद में 414 सीटें मिली थीं.
अब 4 फरवरी 2004 पर आइए, जब दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि 16 साल की जांच के बाद भी “देश की प्रमुख एजेंसी” राजीव गांधी के खिलाफ “रत्ती भर भी सबूत” नहीं खोज पाई. अदालत ने कहा कि “सीबीआई के सारे प्रयास विफल रहे, क्योंकि वह किसी भी गुप्त या ज्ञात खाते तक नहीं पहुंच सकी, जहां कथित पैसा हो सकता था”. अदालत का तीखा निष्कर्ष था: “सीबीआई डूबते आदमी की तरह तिनकों का सहारा ले रही थी.”
यह वह नतीजा नहीं था, जिसकी उम्मीद उन लोगों को थी, जो सालों तक फैले लीक, इशारों और बदनामी भरे आरोपों को देखते आए थे और फरवरी 2004 में न्यायमूर्ति जे.डी. कपूर के फैसले में जांच एजेंसियों और मीडिया-ट्रायल के व्यवहार पर यह कहा गया था:

लेकिन कुछ भी नहीं बदलता. बोफोर्स के बाद से, मीडिया का एक आज्ञाकारी हिस्सा, जिसे जांच एजेंसियों से चुनिंदा लीक मिलते रहे, जो शायद राजनीतिक निर्देशों पर थे—दर्शकों को गुमराह करता रहा है, जबकि उन लोगों को दोषी ठहराया गया, जो कानूनी बचाव करने की मजबूरी में बंधे थे.
अदालतों ने आरुषि तलवार और सुशांत सिंह राजपूत मामलों में मीडिया-ट्रायल की आलोचना की, लेकिन कानूनी कार्रवाई करने तक नहीं गईं. जब तक दोषियों पर वास्तविक कीमत नहीं चुकाई जाती, तब तक यह पैटर्न दुर्भाग्य से चलता रहेगा.
(लेखक अमिताभ दुबे कांग्रेस के सदस्य है. व्यक्त विचार निजी हैं. उनका एक्स हैंडल @dubeyamitabh है.)
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