“घंटा”—यह हिंदी का एक स्लैंग शब्द है, जो मध्य प्रदेश के कुछ नेताओं के लिए जवाबदेही का मतलब बताता है या कम से कम इंदौर में दूषित पानी की त्रासदी पर उनकी प्रतिक्रियाओं से तो ऐसा ही लगता है. एनडीटीवी के एक संवाददाता ने मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से पूछा कि पीड़ितों को इलाज के खर्च की भरपाई क्यों नहीं मिल रही है और पीने के पानी की व्यवस्था ठीक क्यों नहीं है. इस पर मंत्री ने इस सवाल को “फोकट” यानी बेकार बताया और “घंटा” कहकर टाल दिया.
अब तक सरकार कह रही है कि मरने वालों की संख्या आठ है, जबकि जिला प्रशासन 18 लोगों के परिवारों को 2-2 लाख रुपये का मुआवजा दे चुका है.
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मौत के आंकड़ों में फर्क को लेकर पूछे जाने पर दार्शनिक अंदाज़ में जवाब दिया. उन्होंने कहा, “हमारे लिए एक भी जान जाना बहुत दुखद है…हम आंकड़ों में नहीं जाते.” यह बात सुनने में भावुक लग सकती है, लेकिन इस त्रासदी पर सरकार की प्रतिक्रिया काफी कमज़ोर रही है. सरकार ने कुछ नगर निगम अधिकारियों को निलंबित और स्थानांतरित तो किया है, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व ने जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया है.
सीएम हेल्पलाइन के आंकड़ों के मुताबिक, इंदौर के लोगों ने दूषित पानी को लेकर 100 शिकायतें दर्ज कराईं, जैसा कि भास्कर इंग्लिश ने रिपोर्ट किया. भागीरथपुरा इलाके में, जहां दूषित पानी से कई लोगों की जान गई, मुख्यमंत्री को पहले ही 11 शिकायतें भेजी जा चुकी थीं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई. इंदौर से जुड़ी सीवर की करीब 550 शिकायतें अब भी सीएम हेल्पलाइन पर लंबित हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, मेयर हेल्पलाइन की स्थिति और भी खराब थी. तो फिर जिम्मेदारी किसकी है? ज़ाहिर तौर पर सिर्फ गैर-निर्वाचित अधिकारियों की. तो फिर चुने हुए जनप्रतिनिधियों का काम क्या है? खैर, आखिरी बार खबर यह थी कि यादव इंग्लैंड के ग्रीनविच से प्राइम मेरिडियन को उज्जैन स्थानांतरित करने पर काम कर रहे थे.
वह लोगों को श्री कृष्ण को ‘माखन चोर’ कहने से रोकने के अभियान पर भी काम कर रहे थे, क्योंकि यह उनके मामा कंस के खिलाफ विद्रोह का प्रतीक था.
क्या मध्य प्रदेश में डबल इंजन सरकार से यही उम्मीद की गई थी? और इंदौर जैसे स्मार्ट सिटी में ट्रिपल इंजन सरकार से भी? अगर लोग इस कमज़ोर शासन व्यवस्था से निराश हो रहे हैं, तो वे किसे दोष देंगे? ज़ाहिर है, यादव को नहीं. उन्होंने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के लिए वोट नहीं दिया था. उनका जनादेश शिवराज सिंह चौहान के लिए था. तो फिर यादव अपनी नींद क्यों खराब करें? चिंता तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हो सकती है—और सिर्फ इसलिए नहीं कि मध्य प्रदेश में क्या हो रहा है.
सीएम धामी और गुप्ता का मामला
देखिए ‘देवभूमि’ उत्तराखंड में डबल इंजन सरकार का क्या हाल है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी विधानसभा चुनाव से करीब एक साल पहले ही बीजेपी की चिंता बढ़ा रहे हैं. युवाओं का सड़कों पर उतरकर विरोध करना एक चिंताजनक चलन बनता जा रहा है—पहले 2025 में पेपर लीक को लेकर और अब अंकिता भंडारी हत्याकांड में एक ‘वीआईपी’ की कथित भूमिका को लेकर. ये स्वतःस्फूर्त विरोध प्रदर्शन सत्तारूढ़ दल के नेताओं को परेशान कर रहे हैं. बीजेपी और कांग्रेस के वोट शेयर का अंतर 2017 में 13 प्रतिशत अंक से घटकर 2022 के विधानसभा चुनाव में 6 प्रतिशत अंक रह गया था. धामी ने लिव-इन रिश्तों, ‘लैंड जिहाद’, ‘थूक जिहाद’ और अब हरिद्वार के 105 घाटों से गैर-हिंदुओं पर प्रस्तावित प्रतिबंध को अपना मुख्य शासन एजेंडा बना लिया है.
यह बीजेपी के लिए मददगार नहीं दिख रहा है, जैसा कि लगातार हो रहे युवा विरोध प्रदर्शनों से साफ है. देहरादून में नस्लीय हमले में त्रिपुरा के छात्र एंजल चकमा की हत्या ने ‘देवताओं की भूमि’ में बीजेपी के शासन को लेकर और सवाल खड़े कर दिए हैं. यादव की तरह, धामी भी शायद ज्यादा परेशान नहीं होंगे. 2022 के विधानसभा चुनाव में जनादेश उनके लिए नहीं था. चुनाव से सिर्फ छह महीने पहले ही उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया था. मौजूदा मुख्यमंत्री होने के बावजूद वह खटीमा से अपना चुनाव हार गए, लेकिन फिर भी उन्हें पद पर बनाए रखा गया—एक ऐसा फैसला जिसे आज उनकी पार्टी के कई साथी अफसोस के साथ याद करते हैं. उत्तराखंड में नेतृत्व बदलने की ज़रूरत को लेकर फुसफुसाहटें सुनाई देना कोई हैरानी की बात नहीं है.
हालांकि, रेखा गुप्ता को सिर्फ 11 महीनों में आंकना ठीक नहीं होगा, लेकिन दिल्ली में उनकी सरकार अब तक सिर्फ बातों तक ही सीमित रही है. सत्ता में आने के कुछ हफ्तों बाद ही उन्होंने बड़े प्रचार-प्रसार के साथ ‘एयर पॉल्यूशन मिटिगेशन प्लान 2025’ लॉन्च किया था. इसके बाद से सरकार गलत वजहों से सुर्खियों में रही है—चाहे वह 3 करोड़ रुपये के बहुचर्चित कृत्रिम बारिश प्रयोग की नाकामी हो या प्रदूषण निगरानी केंद्रों के पास पानी का छिड़काव कर एयर क्वालिटी इंडेक्स को कम दिखाने की कोशिश. एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) को “एक तरह का तापमान” बताने पर उन्हें सार्वजनिक तौर पर मज़ाक का पात्र बनाना थोड़ा अनुचित था, जिसे किसी भी उपकरण से मापा जा सकता है. कोई भी सब कुछ नहीं जानता, लेकिन प्रदूषण कम करने के बड़े-बड़े वादे करने से पहले दिल्ली की मुख्यमंत्री से यह ज़रूर उम्मीद की जाती है कि वह बुनियादी बातें पढ़ें और समझें. साथ ही, यह कहना कि ब्राह्मण ज्ञान की ज्योति जलाते हैं, राजनीतिक रूप से बहुत उपयुक्त कथन नहीं था.
चुनावों को गलत तरीके से समझना
यह सिर्फ यादव, धामी और गुप्ता की बात नहीं है. 14 बीजेपी मुख्यमंत्रियों में से आधे भी ऐसे नहीं लगते जो पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा उन पर जताए गए भरोसे को सही साबित करने की कोशिश कर रहे हों. योगी आदित्यनाथ, देवेंद्र फडणवीस और हिमंत बिस्वा सरमा अच्छे फैसले साबित हुए. बाकी में से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ऐसे प्रशासक बनकर उभर रहे हैं जो बदलाव लाना चाहते हैं. पूर्व नक्सल प्रभावित इलाकों को पर्यटन स्थल बनाने और राज्य में निवेश लाने पर उनका ध्यान सराहनीय है. अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू तो एक तरह से ‘वन मैन पार्टी’ हैं, जिन्हें छुआ भी नहीं जा सकता.
बाकी लोगों में क्या गड़बड़ है? उनके शब्दों और काम को ध्यान से देखिए. उनका ढीला-ढाला शासन शायद इस सोच से आता है कि बीजेपी की चुनावी जीत तीन ‘एम’ की वजह से हुई—Modi, majoritarianism, and money (मोदी, बहुसंख्यकवाद और पैसा). यानी मोदी का करिश्मा, हिंदुओं की लामबंदी और मतदाताओं को सीधे आर्थिक मदद (जैसे बिहार में महिलाओं को 10,000 रुपये) या कल्याणकारी/लोकलुभावन योजनाएं. चुनाव नतीजों की यह व्याख्या पूरी तरह गलत नहीं हो सकती, लेकिन वे बड़ी तस्वीर को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं.
पहली बात, अगर उनकी सोच सही है, तो तीन ‘एम’ उन्हें पूरी तरह गैर-ज़रूरी बना देते हैं. बीजेपी ने गुजरात, उत्तराखंड और हरियाणा समेत कई राज्यों में ऐसा किया भी है. दूसरी बात, इन मुख्यमंत्रियों को यह ध्यान से देखना चाहिए कि उनके कुछ साथी कैसे ताकतवर और अपरिहार्य बने. योगी आदित्यनाथ को दूसरा कार्यकाल सिर्फ उनकी ध्रुवीकरण वाली राजनीति की वजह से नहीं मिला. यह उनके विकास कार्यों और कानून-व्यवस्था की बहाली की वजह से भी था. फडणवीस अपने पहले कार्यकाल में ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर मैन’ के रूप में उभरे, जिसने उन्हें महाराष्ट्र में बीजेपी का निर्विवाद चेहरा बना दिया.
सबसे अहम बात यह है कि इन बीजेपी मुख्यमंत्रियों को याद रखना चाहिए कि वे ‘ब्रांड मोदी’ को नुकसान पहुंचाने लगे हैं. जब प्रधानमंत्री डबल इंजन सरकार का वादा करते हैं, तो वह विधानसभा चुनाव में भी अपने लिए जनादेश मांगते हैं. इसलिए अगर कोई राज्य सरकार काम करने में नाकाम रहती है, तो इसका सीधा असर ब्रांड मोदी पर पड़ता है. यानी काम न करने वाले बीजेपी मुख्यमंत्री अंततः पीएम मोदी की लोकप्रियता को कमजोर कर सकते हैं. और यह ऐसी चीज है जिसे मोदी के तीसरे कार्यकाल में बीजेपी वहन नहीं कर सकती. अगर पहला ‘एम’ चमक खो देता है, तो बाकी दो भी उतने प्रभावी नहीं रहेंगे.
(डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)
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