Monday, 17 January, 2022
होममत-विमततालिबान से संभावित खतरे को बाइडन गंभीरता से नहीं ले रहे, ये दूसरे 9/11 को न्योता देना है

तालिबान से संभावित खतरे को बाइडन गंभीरता से नहीं ले रहे, ये दूसरे 9/11 को न्योता देना है

भीख का कटोरा लेकर घूमने से पहले हालांकि तालिबान नेतृत्व अपनी एके 47 रायफलें छिपा लेंगे, लेकिन बात-बात पर गोली चलाने पर उतारू कट्टरपंथी समूहों पर, उनका कोई नियंत्रण नहीं होगा.

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अमेरिका पर हुए 9/11 आतंकी हमले को, उसकी बीसवीं वर्षगांठ पर याद करके किसी को ख़ुशी नहीं होगी. लेकिन व्हाइट हाउस में जो बाइडन प्रशासन ने लगता है तय किया हुआ है, कि वो सामान्य रूप से पूरी दुनिया, और विशेष रूप से अमेरिका को, उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना की याद दिलाकर रहेगा. यही वो घटना थी जिसने तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश को, आतंक के खिलाफ जंग छेड़ने को मजबूर कर दिया था, जिसे अफगानिस्तान की घरती पर लड़ा जाना था. उसके साथ ही एक सिलसिलेवार कार्रवाई शुरू हो गई, जिसके तहत तालिबान बलों को काबुल से बाहर निकाल दिया गया, सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया गया, और प्रशासन को अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा सहायता बल ने अपने हाथ में ले लिया.

बीस साल बाद, अमेरिका हड़बड़ाहट के साथ काबुल से निकल आया है, और अफगानिस्तान को उन्हीं तालिबान के हवाले कर दिया, जिन्हें उसने हटाया था. दो ख़ूंख़ार आतंकी संगठन-तालिबान और हक़्क़ानी नेटवर्क, जिन्हें नेटो देशों का वतन मानी जाने वाली पश्चिमी दुनिया, और अमेरिका की आतंक के खिलाफ जंग के क़रीबी समझे जाने वाले बहुत से दूसरे निशानों पर, ज़्यादातर आतंकी हमलों के लिए अकेले ज़िम्मेदार माना जाता है, अब काबुल में वापस आ गए हैं.


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खतरा और बढ़ गया है

2001 में भू-राजनीतिक परिदृश्य अलग था, और पीड़ित अमेरिका के पक्ष में था, जिसने आतंक पर क़ाबू पाने के लिए, तुरंत लोकतांत्रिक दुनिया की मदद मांग ली थी. लेकिन उस समय भी लॉजिस्टिक सहायता के लिए, अमेरिका पाकिस्तान पर बहुत निर्भर था, एक ऐसा मुल्क जो ख़ुद आतंकवाद को अंजाम देने वालों के साथ गहराई से लिप्त था. 9/11 के बीस साल बाद, विश्व अर्थव्यवस्था कोविड-19 से बुरी तरह प्रभावित हुई है, लोकतांत्रिक दुनिया ने अपनी प्राथमिकताएं फिर से तय की हैं, चीन अमेरिका के वैश्विक नेतृत्व को गंभीर चुनौती दे रहा है, हर महाद्वीप में संघर्ष के बिंदुओं की संख्या बढ़ रही है, और सबसे ख़राब स्थिति में, अमेरिकी ताक़त के पतन को लेकर बहस बढ़ने लगी है.

ऐसा लगता है कि व्हाइट हाउस के मौजूदा निवासी, और अमेरिकी कांग्रेस में सत्ता के गलियारों में भीड़ लगाए सुरक्षा विशेषज्ञों ने, तालिबान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद के ख़तरे को घटाकर, ग़ैर-प्राथमिकता वाली सूची में कर दिया है, और हमें यक़ीन दिलाना चाहते हैं, कि कट्टर आतंकवाद का दौर ख़त्म हो गया है. पूरी तरह समझना मुश्किल है कि वो ऐसा किसलिए कहते हैं, और उनपर यक़ीन करना तो और भी मुश्किल है. ये समझने के लिए आतंकवाद विरोध में माहिर होने की ज़रूरत नहीं है, कि आत्मसंतोष आतंकी हमलों के परिणामों को और बढ़ा देता है.

अफगानिस्तान से अपने सैनिकों की वापसी की योजना पर फैसला लेते हुए, जुलाई 2021 में राष्ट्रपति बाइडन ने दावा किया था, कि अमेरिका अल-क़ायदा (ओसामा बिन लादेन को ख़त्म करके) के साथ इंसाफ करने में कामयाब रहा, और उसने ये सुनिश्चित करके अपने उद्देश्य को हासिल कर लिया, कि अफगानिस्तान का इस्तेमाल एक ठिकाने के तौर पर नहीं किया जाएगा, जहां से अमेरिका पर हमले किए जा सकते हैं.

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विडंबना ये है कि अमेरिकी राष्ट्रपति इस बात से सहमत थे, कि पिछले साल जनवरी में जब उन्होंने सत्ता संभाली, तो तालिबान सैन्य रूप से 2001 से ज़्यादा मज़बूत थे. उन्होंने ये भी दलील दी कि अफगानिस्तान से निकलने का फैसला लागू होने के बाद, अमेरिकी और नेटो कर्मियों के खिलाफ हमले बहुत कम हो जाएंगे. लेकिन जो बात अमेरिका दुनिया को नहीं बता रहा, वो ये है कि काबुल में चुनी हुई सरकार के हाथ से सत्ता छीनने, और वहां की स्थिति में सुधार के लिए, अमेरिका के मित्रों ने जो कुछ किया था, उस सब को नष्ट कर देने के पीछे तालिबान का छिपा हुआ एजेण्डा क्या है.


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पूरी तस्वीर को न देखना

जो चीज़ अमेरिकी राष्ट्रपति समझ नहीं रहे हैं, या जिसका संज्ञान न लेने का वो ढोंग कर रहे हैं, वो दो बुनियादी तथ्य हैं.

एक ये है कि तालिबान 2.0 अपनी विचारधारा, अपने नज़रिए, और चाल-चलन में, 25 साल पहले के तालिबान 1.0 से बहुत अलग नहीं हैं. बदले की कार्रवाइयों और आदेशों की जो भी ख़बरें काबुल से आ रही हैं, वो पुष्टि करती हैं कि तालिबान के शीर्ष नेतृत्व के दिलों में न के बराबर बदलाव आया है. दूसरा पहलू है अमेरिकी और नेटो फौजों को हराने, और उन्हें लगभग बिना शर्त वापस लौटने को मजबूर करने का उल्लास. इस बार चीन और पाकिस्तान उनके साथ हैं, दो देश जो अमेरिका को अपना विरोधी समझते हैं.

हालांकि तालिबान नेतृत्व (जिसमें क़रीब तीन दर्जन मुल्ला, और अमेरिका की प्रतिबंधित सूची में शामिल, चार-पांच आतंकवादी शामिल हैं) भीख का कटोरा लेकर निकलने से पहले, अपनी एके-47 और कलाशनिकोव रायफलों को छिपाना चाहेंगे, लेकिन भाड़े के सैनिकों और उनसे संबद्ध, बात-बात पर गोली चलाने पर उतारू कट्टरपंथी समूहों पर, उनका कोई नियंत्रण नहीं होगा. उनमें से कुछ ने अपना जाल अफ्रीका तथा दूर दराज़ के अन्य ऐसे क्षेत्रों तक फैला लिया है, जो सामाजिक कलह से जूझ रहे हैं.

विडंबना ये है कि जो बाइडन ने अफगानिस्तान को छोड़ने की ज़रूरत पर बल देते हुए, वैश्विक आतंकी नेटवर्क का आंकलन करते हुए कहा, ‘पिछले 20 वर्षों में ये ख़तरा और ज़्यादा बिखर गया है, और पूरी दुनिया में फैल गया है: सोमालिया में अल-शबाब, अरबी द्वीप में अल-क़ायदा; सीरिया में अल-नुसरा, सीरिया और इराक़ में ख़िलाफत तथा अफ्रीका और एशिया के कई देशों में उससे संबद्ध इकाइयां स्थापित करने की कोशिश करता आईएसआईएस’. इस आंकलन को देखते हुए क्या ये पूर्वानुमान लगाना मुश्किल है, कि तालिबान और उनके मित्रों का अगला क़दम क्या होगा?

अमेरिकन राष्ट्रपति की ‘साथ जाएंगे, साथ निकलेंगे’ वाली टिप्पणी ‘मुसीबत में साथ’ में बदल सकती है. अमेरिका शेख़ी बघार सकता है कि उसके पास सर्वश्रेष्ठ आतंकवाद-विरोधी फ्रेमवर्क है. लेकिन पश्चिमी यूरोप में उनके लोकतांत्रिक सहयोगियों, और अफगान क्षेत्र में उनके मित्रों का क्या? हालिया कोविड-19 महामारी जैविक युद्ध की संभावनाओं की एक चेतावनी होनी चाहिए. ग़ैर-राज्य कर्त्ताओं के द्वारा छोटे कम क्षमता वाले सामरिक परमाणु हथियारों (धमाके के केंद्र से 500 फीट के दायरे में हर चीज़ को भस्म कर देने में सक्षम) की तैनाती के ख़तरे की संभावना को ख़ारिज नहीं किया जा सकता.

कोविड-19 पर बोलते हुए जो बाइडन ने आह्वान किया, कि समान विचारधारा वाले साथी साथ मिलकर ‘इस महामारी को परास्त करें, और और अगली की तैयारी के लिए विश्व स्वास्थ्य प्रणाली को मज़बूत बनाएं, क्योंकि एक महामारी और आएगी. काश उन्होंने 9/11 के लिए भी यही बात कही होती, क्योंकि भगवान न करे, ऐसी एक और घटना हो सकती है.

(शेषाद्रि चारी ‘ऑर्गेनाइज़र’ के पूर्व संपादक हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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