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Wednesday, 28 February, 2024
होममत-विमतक्या भारत जोड़ो यात्रा ने सांप्रदायिक नफरत को कम किया या यह बचपने से भरा मेरा कोरा आशावाद है?

क्या भारत जोड़ो यात्रा ने सांप्रदायिक नफरत को कम किया या यह बचपने से भरा मेरा कोरा आशावाद है?

मैं यह सवाल कुछ घबराहट के साथ पूछ रहा हूं. लेकिन जहां कहीं भी यात्रा का संदेश पहुंचा है, इससे स्थानीय साम्प्रदायिक तनाव कम हुआ है.

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क्या भारत जोड़ो यात्रा ने सांप्रदायिक गुस्से को कम किया है? मैं यह सवाल कुछ घबराहट के साथ पूछ रहा हूं. मैं लंबे समय से आंकड़ो के साथ खेलने और गुणा-भाग वाला व्यक्ति रहा हूं मैंने किसी कारण-प्रभाव के दावे को साबित करने के लिए हमेशा से ठोस सबूत भी मांगा है. लेकिन यह प्रश्न कठिन सबूत को भी स्वीकार नहीं कर रहा है. कम से कम इतने कम समय में तो नहीं. फिर भी यह पूछना तो बनता है, क्योंकि यह वास्तव में किसी बड़ी चीज से जुड़ा हुआ सवाल है. यदि यह सच है कि इस यात्रा ने वास्तव में सांप्रदायिक तनाव को मामूली रूप से भी कम किया है, तो इसका समर्थन करने और जश्न मनाने का सबसे बड़ी वजह हो सकता है. यह एक ऐसे युग में राजनीति की रचनात्मक संभावना के बारे में है जब राजनीति ‘बुराई’ के रूप में देखी और पेश की जा रही हो.

यह उस युग में राजनीति की रचनात्मक क्षमता के बारे में है जब राजनीति को ही ‘बुराई’ के रूप में देखा और प्रस्तुत किया जा रहा है.

तो, मैं इसे सावधानी से बता दूं. मैं केवल एक सवाल खड़ा कर रहा हूं, फाइनल जवाब नहीं दे रहा हूं. जैसा कि सामाजिक विज्ञान में कहते हैं न कि यह एक परिकल्पना है जिसकी जांच की जानी है. साथ ही, मैं साम्प्रदायिकता के संगठित या पूर्व नियोजित कृत्यों जैसे दंगों, हिंसा और हेट क्राइम के बारे में नहीं बोल रहा. अगर इन कृत्यों को घृणा की राजनीति से प्रेरित समूहों द्वारा डिजाइन और अंजाम नहीं दिया गया है, जिसका कि यह यात्रा विरोध करना चाहती है.

मैं उनके दिल में अचानक बदलाव की उम्मीद नहीं करता, और वह भी भारत जोड़ो यात्रा से. मुझे रोज़मर्रा के सांप्रदायिक तनाव में दिलचस्पी है जो कि अव्यक्त शत्रुता और अविश्वास, अपशब्द, अपमान, पड़ोस के विवाद में मौजूद है – मुझे इस बात में दिलचस्पी है कि क्या यात्रा ने सांप्रदायिक कट्टरता में आम लोगों के शामिल होने को कम किया है. यह केवल उन क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है जिसे यात्रा ने कवर किया है.और ये मेरा अनुमान है कि यात्रा का संदेश जहां भी पहुंचा है, इसने स्थानीय सांप्रदायिक तनाव में कमी लाने की भरसक कोशिश की है.


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मजबूत अपील तक

मेरे इस अनुमान के बारे में मुझे सबसे पहले एकता परिषद के मेरे सह-यात्री पुष्पराग ने सचेत किया था. यह नवंबर महीने का आखिरी सप्ताह रहा होगा जब हमने मध्य प्रदेश के एक बड़े से गांव (या यह एक छोटा शहर था?) में यात्रा पूरी की थी. वह वापस आए और स्थानीय ग्रामीणों – कुछ मुस्लिम परिवारों के साथ हुई बातचीत के बारे में बताया, जिन्होंने यात्रा के बारे में अपने निवास स्थान पर पहुंचने से बहुत पहले सुना था. उन्होंने कहा कि जब से यात्रा की खबरें आने लगीं हैं तब से उनके गांव में साम्प्रदायिक तनाव कम हो गया है. एक ने कहा: ‘सुकून सा महसूस हो रहा है.’ उन्होंने कहा कि उन्होंने ऐसी ही कहानियां अन्य जगहों पर भी सुनी हैं.

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मुझे यकीन नहीं था. जब अच्छी खबर आती है तो हम कार्यकर्ता जल्दी से विश्वास नहीं करते हैं. जब मैंने एक मित्र से इसका जिक्र किया, तो उन्होंने भी कहा कि उन्हें एक राज्य के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से भी ऐसा ही कुछ सुनने को मिला था, कि पहले ही यात्रा पहले ही गुजर चुकी थी.

खुफिया रिपोर्टों ने राज्य में सांप्रदायिक घटनाओं में भी गिरावट दिखाई है. लेकिन उन्होंने मुझे इसके बारे में तुरंत न लिखने की सलाह भी दी, क्योंकि इससे नफरत की राजनीति से फायदा उठाने वालों से पलटवार झेलना पड़ सकता था. दरअसल, कर्नाटक के मेरे दोस्तों ने राज्य में यात्रा की सफलता के बाद घृणा फैलाने वाले अभियानों में बढ़ोत्तरी की जानकारी दी है. तब से मैंने अलग-अलग इलाकों में जहां पर अलग-अलग सरकारेंं हैं वहां अपने कई दोस्तों के साथ जांच की. प्रतिक्रियाएं मेरी परिकल्पना को हल्के से लेकर मजबूत पुष्टि करती हैं. यह सच है कि हेट क्राइम नाटकीय ढंग से कम नहीं हुए हैं. न ही जहरीले प्रचार के मीडिया संचालित अभियान हैं. लेकिन जैसा कि मैंने कहा, मुझे उम्मीद नहीं है कि नफरत गढ़ने वाले निराश होंगे. मैं घृणा में शामिल आम लोगों पर यात्रा के असर का पता लगाने में दिलचस्पी रखता हूं.

तो, मैं इस परिकल्पना को कुछ भावी सामाजिक वैज्ञानिकों को प्रस्तुत करता हूं. इस बीच, मैं राष्ट्रव्यापी जनमत सर्वेक्षणों के अगले दौर की प्रतीक्षा करता हूं, यह देखने के लिए कि क्या वे सांप्रदायिक दृष्टिकोण में किसी मामूली बदलाव को देखते हैं. या कुछ केस स्टडी के लिए जो चुनाव से परे यात्रा के प्रभाव को जांचती हो.

नफरत के समय में प्यार

एक अच्छी परिकल्पना को दो प्रभावित करने वाली चीजों के बीच संबंध बताने को लेकर बंद नहीं करना चाहिए. हमें इस तरह के संबंध की अपेक्षा करने का कारण भी बताना चाहिए. यहां मेरा यह कहना है. ऐसा लगता है कि भारत जोड़ो यात्रा ने साम्प्रदायिक कट्टरता को कम किया है, इसलिए नहीं कि इसने साम्प्रदायिकता का मुकाबला करने के लिए एक सक्रिय ताकत का निर्माण किया है. इसने जिन क्षेत्रों को पार किया है वे राष्ट्रीय प्रभाव दर्ज करने के लिए बहुत छोटे हैं. यहां तक कि उन क्षेत्रों में भी यात्रा ने अभी तक एक स्वयंसेवी बल नहीं बनाया है जो किसी भी संघर्ष में प्रभावी रूप से हस्तक्षेप कर सकें.

हमारे पास यात्रा का संदेश है, सामान्य और फैला हुआ. फिर भी, ‘जोड़ो’ का भारी आह्वान ही एकता के संदेश को याद करने और फिर से जोड़ने का कार्य करता है. नफरत की राजनीति के खिलाफ राहुल गांधी की बेबाक पॉजिशन, विपक्ष के अधिकांश मुख्यधारा के राजनेताओं द्वारा गोलबंदी या रणनीतिक चुप्पी को एक ताज़ा बदलाव ने अचानक प्यार के बारे में बोलना स्वीकार्य बना दिया है. ‘मैं नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान खोलने आया हूं’ जैसे बयानों की शेल्फ लाइफ हमारी कल्पना से ज्यादा लंबी होती है.

अगर नफरत फैलती है, तो प्यार भी

जब यात्रा उत्तर पूर्वी दिल्ली को पार कर रही थी तो मैं इसके बारे में सोचता रहा. जाफराबाद मेट्रो स्टेशन से शिव विहार तक, हम उन इलाकों से गुजरे, जहां 2020 में सांप्रदायिक दंगे हुए थे, मार-काट हुई थी. सड़क के दोनों ओर, सांप्रदायिक तौर से विभाजित दोनों तरफ के लोगों ने हमारा स्वागत किया. यात्रा के साथ साथ एक देशभक्ति गीत बज रहा था सारे जहां से अच्छा, मैं उसे अच्छे से सुन रहा था: ‘मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना (धर्म आपको नफरत नहीं सिखाता). इस गीत और नजारे को देख कर आंखों में आंसूं भर आगे बढ़ता जा रहा मैं अकेला नहीं था.

मुसलमान अधिक दिखाई दे रहे थे जो बहुत खुश थे, उत्साहित थे, बल्कि यात्रा में स्थानीय हिंदुओं की भी पर्याप्त उपस्थिति थी. राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने कांग्रेस में मुस्लिम मतदाताओं की वापसी की भविष्यवाणी करने की जल्दबाजी दिखाई, अगर यह गैर-मुस्लिम वोटों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सुरक्षित करने का कोई रास्ता खोज सकें तो . लेकिन मैं उनके चेहरों में कुछ और पढ़ने की कोशिश कर रहा था. क्या इस क्षेत्र में उनकी संख्या की ताकत थी या यात्रा की उपस्थिति जिससे मुसलमान भयभीत या चिंतित नहीं दिखे? या मैं बस इसकी कल्पना कर रहा था?

मैं फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की उन पंक्तियों को याद करता रहा: ‘खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद’. क्या महज बयानबाजी से खून के धब्बों को साफ किया जा सकता है. लेकिन अगर खून के धब्बे नफरत से पैदा होते हैं, जो शब्दों से पैदा होते हैं, तो शब्दों से इसका उलटा क्यों नहीं शुरू हो सकता? या यह सिर्फ बचपने से परीपूर्ण कोरा आशावाद है? जैसा की हो भी सकता है, इससे पहले कि कोई मेरी परिकल्पना का खंडन करे, मैं उस क्षण का आनंद लेना चाहता हूं.

(संपादन: इंद्रजीत)

(योगेंद्र यादव जय किसान आंदोलन और स्वराज इंडिया के संस्थापकों में से हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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