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Friday, 10 April, 2026
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आसिया अंद्राबी महिलाओं के अधिकारों की पैरोकार नहीं, वह भारतीय मुसलमानों की आवाज़ भी नहीं

अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा आसिया अंद्राबी को महिलाओं के अधिकारों की रक्षक बताना दिखाता है कि कैसे नैरेटिव बनाए जाते हैं और क्या चीज़ें छोड़ दी जाती हैं.

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कश्मीरी अलगाववादी आसिया अंद्राबी के बेटे ने मार्च में (मां को) उम्रकैद की सज़ा मिलने के बाद एक संदेश लिखा. कुछ लोगों ने इसे उसकी मां की तरफ से अपील बताया, लेकिन उसने इसे अपील नहीं बल्कि उस चीज़ की याद दिलाना बताया जिसे उसने राजनीतिक असहमति को दबाने की एक व्यवस्थित कोशिश कहा.

इसमें एक विडंबना साफ दिखती है. अंद्राबी के बेटे अहमद को पढ़ाई वगैरह के लिए विदेश भेजा गया, जबकि उसके द्वारा बनाई गई संगठन दुख्तरान-ए-मिल्लत ने कई युवाओं को आंदोलन और हिंसा के चक्र में खींच लिया—कुछ कट्टरपंथी बन गए, तो कुछ ने इस प्रक्रिया में अपनी जान गंवा दी.

जो लोग नहीं जानते, उनके लिए एक उदाहरण है कि 2010 के “क्विट जम्मू एंड कश्मीर” अभियान में अंद्राबी एक प्रमुख चेहरा थी. अशांति के दौरान उसने अपने नेटवर्क के जरिए समर्थन जुटाया, जिसमें 100 से ज्यादा लोग मारे गए. इनमें कई युवा थे.

आसिया अंद्राबी का धार्मिक नज़रिया

मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि इस मामले पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा कवरेज नहीं हुई. लगातार रिपोर्ट या राय बहुत कम देखने को मिली—कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों में लेख छपे, जिनमें कुछ उसके बेटे ने लिखे और कुछ अल जज़ीरा जैसे प्लेटफॉर्म पर आए. कुछ लोग अंद्राबी को ऐसी शख्सियत के रूप में पेश करते हैं जिसने अपना जीवन महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करते हुए बिताया.

मैं इस दावे पर रुक गई और समझने की कोशिश की. उसके द्वारा बनाए गए संगठन कश्मीर में उग्रवाद के शुरुआती दौर में सक्रिय थे और वो उन महिलाओं को धमकी देते थे जो बुर्का या पर्दा नहीं पहनती थीं. कुछ महिलाओं पर एसिड से हमले भी किए गए.

ऐसी शख्सियत को महिलाओं के अधिकारों की रक्षक बताना दिखाता है कि नैरेटिव कैसे बनाए जाते हैं और किन बातों को छोड़ दिया जाता है. मैं यह लेख इसलिए लिख रही हूं क्योंकि किसी को सच साफ-साफ कहना ज़रूरी है. आने वाली पीढ़ी और जिस समुदाय से मैं जुड़ी हूं, उसके लिए ज़रूरी है कि हम आसान और ‘हम बनाम वे’ जैसी कहानी से आगे का सच जानें.

अंद्राबी सिर्फ एक एक्टिविस्ट या अलगाववादी नेता नहीं थी. उसकी राजनीति असहमति से आगे बढ़कर हिंसा के खुले समर्थन तक जाती है. उसने द गार्जियन को दिए इंटरव्यू में कहा था कि वह भारतीय पुलिस और सैनिकों पर हमलों का समर्थन करती है और राजनीतिक नेताओं के खिलाफ भड़काऊ बयान देती है जिनमें भारत के प्रधानमंत्री की हत्या जैसी बातें भी शामिल हैं.

उसे दूसरे अलगाववादी नेताओं से अलग बनाता है उसका नज़रिया. वह कश्मीर मुद्दे को सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि धार्मिक दृष्टिकोण से देखती थी, जो अलगाववादी आंदोलन को उसी आधार पर बदलना चाहता है.

इसके अलावा, जो लोग मानते हैं कि वह न्याय या आत्मनिर्णय के लिए लड़ रही है, उसे ध्यान से देखना चाहिए कि वह वास्तव में क्या चाहती है. यह एक न्यायपूर्ण या बराबरी वाले समाज की कल्पना नहीं है, बल्कि ऐसा नज़रिया है जिसमें अधिकार और स्वतंत्रता धर्म की सख्त व्याख्या से तय होते हैं.

ऐसी व्यवस्था में व्यक्तिगत आज़ादी के लिए बहुत कम जगह होती है. खासकर महिलाओं से तय नैतिक नियमों का पालन करने की उम्मीद की जाती है—जैसा कि बुर्का न पहनने वाली महिलाओं के खिलाफ उसके संगठन द्वारा दी गई धमकियों में देखा गया. उसके नजरिए में ऐसा जम्मू-कश्मीर नहीं है जो सभी धर्मों, पहचान और विश्वास के लोगों का बराबर हो. यह ऐसा समाज दिखाता है जो साथ रहने के बजाय अलगाव पर आधारित है. ऐसा समाज जो सोच में पाकिस्तान जैसा, लेकिन शायद विचारधारा में और ज्यादा सख्त हो.

अलगाव वाली राजनीति

भारतीय मुसलमानों के रूप में हमें खुद से पूछना चाहिए कि क्या हम किसी ऐसे विचार के साथ खड़े हो सकते हैं जो भारत में हमें बराबरी से वंचित करता है. अगर जवाब नहीं है, तो हमें उसी मजबूती से आसिया अंद्राबी जैसे लोगों का विरोध करना चाहिए, जो दूसरों के लिए भी वैसा ही नज़रिया रखते हैं.

इसके अलावा, अंद्राबी जैसे लोग जो खुद को मुसलमानों के लिए न्याय की आवाज़ बताते हैं, करीब से देखने पर एक अलग सच्चाई दिखाते हैं. मुझे याद है कि कश्मीरी मुसलमानों में जाति व्यवस्था पर शोध करते समय पहली बार उनके बारे में पढ़ा. यह जानकर हैरानी हुई कि जो व्यक्ति मुस्लिम पहचान और अधिकारों की बात इतनी मजबूती से करता है, उसने कथित तौर पर अपने बेटे की शादी का विरोध किया क्योंकि लड़की दर्जी (टेलर) परिवार से थी.

यह बात मेरे मन में रह गई.

यह एक विरोधाभास दिखाता है जिसे हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं. सार्वजनिक रूप से समुदाय के हित की बात करना आसान है, “दूसरे” के खिलाफ मजबूत रुख लेना आसान है, लेकिन अपने अंदर की असमानताओं का सामना करना मुश्किल होता है. एक न्यायपूर्ण समाज की बात करना अलग है और उसे अपने जीवन में लागू करना अलग.

और यही कई ऐसे लोगों की हकीकत है. वे बाहर से न्याय की भाषा बोलते हैं, लेकिन अंदर वही अलगाव वाली सोच बनी रहती है.

आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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