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Friday, 1 March, 2024
होममत-विमतजस्टिस नज़ीर का राज्यपाल और वकील गौरी का जज बनना परंपरा अनुकूल और संविधान सम्मत है

जस्टिस नज़ीर का राज्यपाल और वकील गौरी का जज बनना परंपरा अनुकूल और संविधान सम्मत है

भारत ने आरएसएस से जुड़े एक वकील और एक पूर्व सीपीआई मंत्री को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में देखा है. एक पूर्व सीजेआई भी दो बार कार्यवाहक राष्ट्रपति रह चुके हैं.

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हाल में हुई दो नए न्यायाधीशों की नियुक्तियों को लेकर भारी विवाद हुआ. एडवोकेट एल. विक्टोरिया गौरी को मद्रास हाईकोर्ट में जज नियुक्त किया गया. वहीं, सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज एस. अब्दुल नज़ीर को आंध्र प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया.

एडवोकेट गौरी को जस्टिस बनाने को लेकर आपत्ति ये जताई गई कि वे बीजेपी की नेता रही हैं और सोशल मीडिया पर उन्होंने विवादित और सांप्रदायिक बातें लिखी हैं.

वहीं, जज नज़ीर की नियुक्ति को लेकर विवाद इस बात पर हुआ कि उनके रिटारमेंट के बाद सरकार, उनके सुनाए हुए फैसलों का इनाम दे रही है. गौरतलब है कि जज नज़ीर उन 5 न्यायाधीशों की उस बैंच में थे, जिन्होंने आम राय से राममंदिर के पक्ष में फैसला दिया था. वे उस पीठ का भी हिस्सा थे, जिसने नोटबंदी को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया था.

इस बारे में आए सभी तर्कों को संक्षेप में इस प्रकार रखा जा सकता है

  1. राजनीतिक दलों से जुड़े और राजनीतिक विचार व्यक्त करने वाले वकीलों को न्यायाधीश नहीं बनाया जाना चाहिए.
  2. रिटायरमेंट के बाद न्यायाधीशों को उच्च पदों पर नियुक्त करना नीति और सिद्धांतों के खिलाफ है.

इन दोनों तर्कों को हम तीन आधार पर जांचने की कोशिश करेंगे क्या ऐसा पहले से होता रहा है? क्या ऐसा किया जाना सही है और तीसरा, इस बारे में संविधान क्या कहता है और संवैधानिकता नैतिकता का क्या तकाज़ा है.

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आगे बढ़ने से पहले एक बात का ज़िक्र करना ज़रूरी है कि संविधान के अनुच्छेद 124 (7) में न्यायाधीशों पर इस बात की पाबंदी है कि वे रिटायर होने के बाद वकालत नहीं करेंगे. न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए ये प्रावधान किया गया है. हालांकि, ऐसी रोक बाकी कार्यों के बारे मे नहीं है.


यह भी पढ़ेंः 1992 में जज की नियुक्ति रद्द करना, विक्टोरिया गौरी मामले में हस्तक्षेप से SC के इनकार का क्या है कारण


ये ऐसी पहली नियुक्ति नहीं है

सबसे पहले इस बात की जांच करते हैं कि जस्टिस गौरी या न्यायाधीश नज़ीर की नियुक्ति क्या कोई अनूठा मामला है. तथ्य यही है कि राजनीतिक दलों से संबद्ध या राजनीतिक संपर्क रखने वाले वकीलों को पहले भी जज बनाया जाता रहा है.

जज आदर्श कुमार गोयल: न्यायमूर्ति बनने से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के महासचिव थे. इन्हें 2001 में न्यायाधीश बनाया गया. 2014 में वे सुप्रीम कोर्ट में जज बने.

जज पी.एन. भगवती: युवा दिनों में कांग्रेस से जुड़े थे और 1973 में सुप्रीम कोर्ट के जज बने.

जज बहरुल इस्लाम: कांग्रेस के सांसद थे. वे 1972 में गुवाहाटी हाईकोर्ट में जज बने. 1980 में सुप्रीम कोर्ट में जज बने. रिटायर होने के बाद फिर से कांग्रेस की ओर से राज्यसभा में पहुंच गए.

जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर: केरल की कम्युनिस्ट सरकार के प्रभावशाली मंत्री थे जज भी बने और सुप्रीम कोर्ट में भी रहे.

राजनीति से जुड़े वकीलों की एक लंबी फेहरिस्त सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट राजू रामचंद्रन ने छापी है. इसे आप यहां देख सकते हैं.

इसलिए, वकील एल. विक्टोरिया गौरी को जस्टिस बनाने से किसी परंपरा का उल्लंघन नहीं हुआ है, बल्कि ये परंपरा के अनुरूप ही है. इस आधार पर तो जज गौरी का विरोध नहीं किया जाना चाहिए.

जहां तक सही-गलत या नैतिकता की बात है तो राजनीति से जुड़ा होना या राजनीतिक विचार रखने से कोई आदमी बुरा जज नहीं हो जाएगा. अमेरिका समेत दुनिया के कई लोकतंत्र में राजनीतिक लोगों को जज बनाने का रिवाज़ है. अमेरिका में तो ज्यादातर ऐसे ही लोग जज बनते हैं तो सत्ताधारी दल से जुड़े होते हैं. इससे किसी व्यक्ति की न्याय क्षमता बाधित होती है, ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है, न ही ये कहा जा सकता है कि राजनीति से दूर रहने वाला शख्स बेहतर न्याय कर सकता है.

ब्रिटिश उपनिवेश के दौर में ढेर सारे वकील राजनीति से जुड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए थे. उन्हें न्याय व्यवस्था में फैसला लेने वाले पदों से दूर रखने का ख्याल संविधान निर्माताओं को कभी नहीं आया. इसलिए संविधान में ऐसी कोई पाबंदी नहीं लगाई गई. यहां तक कि इस बारे में संविधान सभा में चर्चा भी नहीं हुई.

अब दूसरे तर्क को देखते हैं कि रिटायर होने के बाद न्यायाधीशों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए. ऐसी किसी रोक को परंपरा के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता है. रिटायर न्यायाधीशों को तो बड़े पदों पर हमेशा बिठाया जाता रहा है.

संविधान लागू होने के फौरन बाद, 1952 में सुप्रीम कोर्ट के जज सय्यद फैज़ल अली को ओडिशा का राज्यपाल बनाया गया. सुप्रीम कोर्ट की जज फातिमा बीवी को 1997 में तमिलनाडु का राज्यपाल बनाया गया. इसी तरह मोदी सरकार के शुरुआती दिनों में सुप्रीम कोर्ट के जज पी. सदाशिवम को केरल का राज्यपाल बनाया गया. राज्यपाल ही नहीं, रिटायर जज को तमाम बड़े और महत्वपूर्ण पदों पर बिठाया जाता रहा है. बंबई हाईकोर्ट के जज एम.सी. छागला को 1958 में रिटायर होने के बाद अमेरिका में भारत का राजदूत बनाया गया. आगे चलकर वे देश के शिक्षा और विदेश मंत्री भी बने. दिलचस्प है कि वे पहले न्यायिक आयोग से सदस्य थे, जिसने ये सिफारिश की थी कि रिटायर होने के बाद जजों को उच्च सरकारी पदों पर नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए!

सुप्रीम कोर्ट के रिटायर चीफ जस्टिस एम हिदायतुल्ला को सरकार ने उप-राष्ट्रपति नियुक्त किया और वे बाद में कार्यवाहक राष्ट्रपति भी बने.

अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों को देखें तो सबसे दिलचस्प मामला तो अमेरिका का है. अमेरिकी राष्ट्रपति विलियम हावर्ड टाफ्ट को तत्कालीन राष्ट्रपति वारेन हार्डिंग ने अमेरिका का चीफ जस्टिस नियुक्त किया. वे रिपब्लिकन पार्टी के नेता थे और नौ साल तक अमेरिका के चीफ जस्टिस रहे!

स्पष्ट है कि परंपरा के आधार पर, जज नज़ीर को राज्यपाल बनाए जाने का विरोध करना सही नहीं है.


यह भी पढ़ेंः आंबेडकर ने कोलिजियम सिस्टम को बताया था खतरनाक, संविधान सभा द्वारा खारिज सिस्टम को 1993 में वापस ले आए जज


संविधान सभा की बहस और जज

इस मामले पर संविधान निर्माताओं ने व्यापक चर्चा की थी. आज जो मामले उठ रहे हैं, वे तब भी संविधान सभा के सामने थे और तब इसे हल कर लिया गया था. संविधान निर्माताओं ने न्यापालिका में नियुक्ति का अधिकार कार्यपालिका यानी राष्ट्रपति को दिया था और कोलिजिम के विचार को खारिज कर दिया गया था (जिसे न्यायपालिका ने कोलिजियम सिस्टम के जरिए 1993 में अपने हाथ में ले लिया). न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जजों को रिटायरमेंट के बाद पद का लाभ दिए जाने का मसला भी चर्चा में आया था.

24 मई, 1949 को संविधान सभा के तीन सदस्यों के.टी. शाह, जसपत राय कपूर और के. संथानम ने रिटायर जजों के पद लेने पर रोक लगाने का संविधान संशोधन पेश किया. शाह ऐसी नियुक्तियों पर पूर्ण पाबंदी चाहते थे. कपूर चाहते थे कि रिटायर न्यायाधीशों को लाभ के पदों पर नियुक्त न किया जाए जबकि संथानम की राय थी कि ऐसी हर नियुक्ति राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही की जाए. संविधान सभा में इस पर बहस भी हुई थी.

इस मामले में जवाहरलाल नेहरू और डॉ. बी.आर. आंबेडकर दोनों ने संशोधन का विरोध किया.

नेहरू ने कहा, “कई वैज्ञानिकों ने अपना श्रेष्ठ काम ऐसी ही उम्र में पहुंचकर किया है. आइंस्टीन का उदाहरण लीजिए. मुझे नहीं मालूम की उनकी उम्र क्या है, पर वे 60 के ऊपर तो होंगे ही. लेकिन वे सबसे बड़े वैज्ञानिक हैं. क्या कोई सरकार उनसे ये कहेगी कि अब आप 60 के हो गए, हम आपको नहीं रख सकते, अब आप जाकर निजी तौर पर वैज्ञानिक प्रयोग करें?”

इन्होंने कहा कि देश में उच्च कोटि के लोग ऐसे भी कम हैं. अगर प्रशासनिक कारणों से इन्हें बाहर रखा गया तो ये एक त्रासदी होगी.

डॉ. आंबेडकर ने इस बहस को ज़रूरी मानते हुए कहा कि इस बात में दो राय नहीं हो सकती कि “हमारी न्यायपालिका को कार्यपालिका (सरकार) से स्वतंत्र और सक्षम होना चाहिए.”

उन्होंने कहा, “अब मैं बहस के दौरान उठाए गए तीसरे पहलू पर आता हूं जो ये है कि रिटायर होने के बाद न्यायपालिका के सदस्य किसी पद पर लाए जाएं या नहीं. इस बारे में प्रो. शाह और जसपत राय कपूर के दो संशोधन आए हैं. मुझे निजी तौर पर लगता है कि इन संशोधनों को स्वीकार नहीं किया जा सकता.”

इसके बाद संशोधनों पर वोटिंग कराई गई और सदन ने ध्वनि मत से इन्हें खारिज कर दिया. यानी संविधान सभा ने ये राय बनाई कि रिटायर जजों को उच्च पदों पर नियुक्त करने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता बाधित नहीं होती.

हम दोनों लेखकों की राय है कि मौजूदा विवाद का समाधान इस लेख से हो जाना चाहिए.

(विभिन्न हाईकोर्ट में वकालत करने वाले नितिन मेश्राम ने रिटायर जस्टिस गोगोई के राज्यसभा में मनोनीत किए जाने के खिलाफ दायर केस में सुप्रीम कोर्ट में बहस की थी.)

(दिलीप मंडल इंडिया टुडे हिंदी पत्रिका के पूर्व प्रबंध संपादक हैं. उनका ट्विटर हैंडल @Profdilipmandal है. दोनों के विचार व्यक्तिगत हैं.)

(संपादन फाल्गुनी शर्मा)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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