Tuesday, 5 July, 2022
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UP फतह के लिए अखिलेश यादव की तीन रणनीति 

बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि अखिलेश यादव अपनी समाजवादी पार्टी को मोर्चा लेने के लिए किस तरह तैयार करते हैं और भाजपा के पाले में गए मतदाताओं को अपने पाले में कैसे लाते हैं.

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अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी (सपा) उत्तर प्रदेश में भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभर कर आई है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को राजनीतिक सत्ता की गद्दी से उतारने के लिए यह पार्टी तीन सूत्रीय रणनीति पर काम कर रही है.

जिताऊ उम्मीदवारों की तलाश

सपा की रणनीति का पहला सूत्र ऐसे उम्मीदवारों की तलाश करना है जो चुनाव जीत सकें और भरोसे के हों. इसके लिए तीन कसौटियां तय की गई हैं. विधानसभा चुनाव क्षेत्र में उम्मीदवार की लोकप्रियता, क्षेत्र के मतदाताओं में जातियों का समीकरण, और पार्टी के प्रति निष्ठा. अखिलेश यादव ने यह रणनीति मध्य प्रदेश और कर्नाटक में चुनाव के बाद हुए सियासी खेल के मद्देनजर अपनाया है, जहां भाजपा ने विपक्षी विधायकों का सामूहिक दल-बदल कराके अपनी सरकार बना ली थी। सपा में अब उम्मीदवारों की निष्ठा केवल पार्टी में से नहीं मापी जा रही है बल्कि अखिलेश यादव के प्रति भी निष्ठा होनी चाहिए। इस निष्ठा वाली कसौटी ने रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया जैसे नेताओं को परेशान कर दिया है, जिन्होंने अपनी जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) बनाई है और सपा के साथ गठबंधन करना चाहते हैं. लंबे समय से मुलायम सिंह यादव के करीबी होने के बावजूद राजा भैया अखिलेश यादव का भरोसा नहीं जीत पाए हैं.

पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने अगस्त में बताया था कि वे ऐसे उम्मीदवारों का पता लगाने के लिए हैदराबाद की दो सर्वे एजेंसियों की सेवाएं ले रहे हैं. उम्मीदवारी की जांच करने के लिए पार्टी ने उनसे अर्जी और अपना बायोडाटा भेजने को कहा है. लेकिन वर्तमान विधायकों से ऐसी मांग नहीं की गई है, यानी उनमें से ज़्यादातर को दोबारा टिकट दिया जा सकता है.


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अति पिछड़ी जाति (मोस्ट बैकवर्ड कास्ट्स) के मतदाताओं पर ज़ोर

सपा की रणनीति का दूसरा सबसे अहम सूत्र है अति पिछड़ी जातियों (मोस्ट बैकवर्ड कास्ट्स) के मतदाताओं को अपने पक्ष में करना. है क्योंकि उत्तर प्रदेश में किसी पार्टी की जीत पक्की कराने में इन जातियों के मतदाताओं का बड़ा हाथ होता है क्योंकि वे किसी पार्टी से बंधे नहीं हैं. ऊंची जातियों के मतदाता भाजपा के, जाटव/चमार बसपा के, और यादव सपा के पक्के वोटर्स माने जाते हैं. पहले, एमबीसी मतदाता बसपा के मजबूत समर्थक माने जाते थे, मगर 2014 के बाद वे भाजपा के साथ हो गए. इस बार सपा उन्हें रिझाने की पूरी कोशिश में जुटी है.

इसके लिए सपा ने तीन रणनीति बनाई है. पहली, यादव और मुसलमान ही पार्टी की जिला इकाई के अध्यक्ष और महासचिव हुआ करते थे. एक पद पर कोई यादव नेता होता, तो दूसरा पद पर मुसलमान नेता को दिया जाता था. मुझे बताया गया है कि अति पिछड़ी जाति के नेताओं को जगह देने के लिए अखिलेश यादव ने यह नीति बदल दी है. सपा ने दूसरी रणनीति छोटी ‘यात्राएं’ निकालने की बनाई है. प्रदेश में नरेंद्र मोदी द्वारा चुनाव अभियान शुरू करने से बहुत पहले ही सपा के संजय चौहान, नरेश उत्तम पटेल, इंद्रजीत सरोज, मिठाईलाल भारती, केशव देव मौर्य जैसे नेताओं ने प्रदेश के कई हिस्सों में यात्राओं का आयोजन शुरू कर दिया था. अंतिम रणनीति पिछले दो दशकों में उभरीं अति पिछड़ी जातियों में उभरी छोटी-छोटी  पार्टियों से चुनावी गठबंधन करने की है. ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ गठबंधन इस चुनावी रणनीति का ही एक उदाहरण है.

आरक्षित चुनाव क्षेत्र

सपा की रणनीति का तीसरा सूत्र है— ज्यादा से ज्यादा आरक्षित सीटों को जीतना. पार्टी इन सीटों पर पहले इसलिए ध्यान नहीं देती थी क्योंकि ऐसी सीटें बसपा के मजबूत गढ़ होती थी. बसपा के कमजोर पड़ते ही भाजपा उन पर मजबूत दावेदार बन गई. वास्तव में, आरक्षित सीटों को जीतने के मामले में भाजपा ने भारी बढ़त ले ली. पिछले विधानसभा चुनाव में उसने 85 में से 75 आरक्षित सीटें जीत ली थी. अब ज्यादा से ज्यादा इन सीटों को जीतने के लिए सपा, बसपा के प्रभावशाली नेताओं का ‘आयात’ कर रही है. आज तक सपा ऐसे कई बसपा नेताओं को अपने पाले में ले आई है. इनमें प्रमुख नाम हैं—मिठाई लाल भारती, इंद्रजीत सरोज, त्रिभुवन दत्त, तिलक चंद्र अहिरवार, के.के. गौतम, सर्वेश आंबेडकर, महेश आर्य, योगेश वर्मा, अजय पाल सिंह जाटव, वीर सिंह जाटव, फेरान लाल अहिरवार, रमेश गौतम, विद्या चौधरी, अनिल अहिरवार, सी.एल. पासी, आदि. ये नेता बसपा में विधायक, सांसद, मंत्री और वरिष्ठ पार्टी पदाधिकारी रह चुके हैं. सपा ने इन नेताओं को आरक्षित सीटों से चुनाव लड़ाने की योजना बनाई है. पहले, सपा इन सीटों पर अधिकतर गैर-जाटव/चमार उम्मीदवारों को खड़ा किया करती थी. लेकिन अब भाजपा ने यह रणनीति अपना ली है. इसलिए सपा इन सीटों पर जाटव/चमार उम्मीदवारों को खड़ा करने पर मजबूर हो गई है. बसपा पिछले 10 साल से सत्ता से बाहर है, इसलिए इसके नेता अपनी जीत का संभावना बढ़ाने के लिए पाला बदलने को बेताब हैं. इसके साथ ही सपा ने मिठाई लाल भारती के नेतृत्व में बाबासाहब अम्बेडकर वाहिनी का भी गठन किया है जिसकी मदद से अनुसूचित जाति के मतदाताओं को अपने साथ जोड़ सके।

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सपा की रणनीति के लिए चुनौतियां

सपा को अपने उपरोक्त रणनीति के लिए तीन बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. पहली यह कि पार्टी संगठन कभी कैडर आधारित नहीं रहा, वह संरक्षण और नेटवर्क वाली पार्टी रही है. मुलायम और उनके भाई शिवपाल सिंह यादव का स्थानीय नेताओं का एक बड़ा नेटवर्क था. ऐसा अखिलेश यादव के साथ नहीं है. दूसरे, भाजपा की तरह सपा के पास हर चुनाव क्षेत्र के मतदाताओं के जातीय और सामुदायिक समीकरण का विस्तृत डाटा उपलब्ध नहीं है. इस वजह से उसे व्यावहारिक तरीके से टिकट वितरण और चुनावी रणनीति बनाने में दिक्कत होती है. तीसरे, अखिलेश यादव की पिछली सरकार के कुछ फैसले सपा के लिए भारी पड़ रहे हैं, खासकर एससी/एसटी कर्मचारियों को पदावनत करने और उनके कल्याण की विशेष योजनाओं को बंद करने का फैसला. बसपा के जाटव/चमार मतदाताओं को नुकसान करने के लिए अखिलेश यादव ने 2012 में सत्ता में आने के बाद एससी/एसटी कर्मचारियों को पदावनत करने और उनके कल्याण की विशेष योजनाओं को बंद करने का फैसला किया था. लेकिन इस फैसले ने गैर-जाटव/चमार एससी/एसटी मतदाताओं को भी नुकसान पहुंचाया, जिन्होंने जातीय प्रतिद्वंद्विता के चलते सपा को वोट दिया था. सो, वे भाजपा की तरफ मुड़ गए. यह मुद्दा एससी/एसटी बुद्धिजीवियों की उस बैठक में भी उठा, जिसे अखिलेश यादव ने आयोजित किया था. जिस पर अखिलेश यादव ने यह वादा किया कि अगर वे सत्ता में आए तो ‘सुधार के उपाय’ करेंगे, लेकिन कैसे करेंगे, यह नहीं बताया?

अब अखिलेश यादव अपनी इन नयी रणनीतियों के साथ योगी आदित्यनाथ पर हमला कर रहे हैं कि उन्होंने एमबीसी और दलित समुदायों को नुकसान पहुंचाया है, तो योगी मतदाताओं को याद दिला रहे हैं कि अखिलेश यादव की सरकार ने भी क्या कुछ किया था. इन दोनों में कामयाब वही होगा जो अतिपिछड़ी जातियोंऔर दलित मतदाताओं को यह भरोसा दिला पाएगा कि उनके लिए सबसे कम हानिकारक कौन हैं.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(अरविंद कुमार(@arvind_kumar__) लंदन विश्वविद्यालय के राजनीति एवं आइआर विभाग रॉयल होल्लोवे के पीएचडी. उपरोक्त उनके निजी विचार हैं)

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