रात के 9 बजे थे और मैं एक बार फिर ‘कौन बनेगा करोड़पति’ का एक एपिसोड देखने बैथी. फर्क बस इतना था कि यह सीज़न 17 का फिनाले था. देश के अलग-अलग हिस्सों में रह रहा मेरा परिवार पिछले 25 सालों से यह शो देखता आ रहा है. मन में यह सवाल उठा कि क्या सोनी लिव पर अमिताभ बच्चन का यह सफर सच में खत्म हो रहा है और क्या अब हम उन्हें अपने टीवी पर इतने पास से नहीं देख पाएंगे. यह सोच ही मन को उदास कर देती है.
‘कौन बनेगा करोड़पति’ ने इतिहास रचा. हर सीज़न के साथ प्रतियोगियों और एंकर के बीच का रिश्ता और मजबूत होता गया. जो कंटेस्टेंट शुरुआत में स्टार को देखकर घबरा जाते थे, वे धीरे-धीरे अमिताभ बच्चन को अपने साथी की तरह मानने लगे. हर साल के साथ यह शो और बड़ा और ज्यादा फेमस होता गया.
अमिताभ बच्चन कैसे बने KBC के होस्ट
यह कहानी 1992 तक जाती है, जब ‘खुदा गवाह’ रिलीज़ हो चुकी थी और अमिताभ बच्चन ने कुछ टाइम का ब्रेक लिया था. वह तय नहीं कर पा रहे थे कि आगे किस तरह के रोल करना चाहते हैं. फिल्ममेकर और लेखक उन्हें वही पुरानी कहानियां पेश कर रहे थे, जिससे उनका मन ऊब गया था. फैंस उन्हें फिर से पर्दे पर देखने के लिए बेचैन थे, लेकिन बच्चन को लौटने की जल्दी नहीं थी. उन्होंने यश चोपड़ा की ‘मोहब्बतें’ (2000) के लिए हां कर दी थी, लेकिन उनका दिल कुछ और चाहता था.
इसी समय भारत में सैटेलाइट टीवी तेज़ी से बढ़ रहा था. इस सेक्टर की अग्रणी कंपनी स्टारप्लस ने सुपरस्टार से अंतरराष्ट्रीय गेम शो ‘हू वांट्स टू बी ए मिलियनेयर’ के देसी एडिशन का चेहरा बनने के लिए संपर्क किया. यह एक बड़ी चुनौती थी. विचार उन्हें पसंद आया, लेकिन यह कैसे होगा, इस पर वे निश्चित नहीं थे. उन्होंने परिवार से बात की और जवाब साफ ‘न’ था. जिन कुछ बाहरी लोगों से उन्होंने बात की, उन्होंने भी यही कहा कि एक सुपरस्टार के लिए टीवी पर आना ठीक नहीं है.
स्टारप्लस ने उन्हें मनाने के लिए खूब कोशिश की. शो बनाने वालों को यकीन था कि अमिताभ बच्चन के बिना यह शो नहीं चल पाएगा, इसलिए उनकी उनसे बार-बार मुलाकातें हुईं. वे उन्हें असली शो देखने, सेट और शूटिंग का एक्सपीरियंस दिलाने विदेश ले गए. जब बच्चन को भरोसा हो गया कि शो का लेवल और भव्यता वही रहेगी, तब उन्होंने कुछ हद तक हामी भरी, लेकिन कागज़ पर अभी भी कुछ तय नहीं था.
अधिकांश कलाकार अपने मन की सुनते हैं. 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद अमिताभ बच्चन ने अपने बचपन के दोस्त राजीव गांधी के समर्थन में राजनीति जॉइन की थी और इलाहाबाद (प्रयागराज) से बड़ी जीत हासिल की थी. तब किसी ने नहीं सोचा था कि बॉलीवुड का यह सुपरस्टार इतनी जल्दी राजनीति छोड़ देगा. उनके शुभचिंतकों ने उन्हें जल्दबाज़ी न करने की सलाह दी थी, लेकिन उन्होंने दिल की सुनी और शांति पाई.
अब वही शुभचिंतक उन्हें टेलीविजन से दूर रहने की सलाह दे रहे थे. उन्हें लगा था कि यह उनके करियर के लिए नुकसानदायक होगा. इस बार भी अमिताभ बच्चन ने अपने दिल की सुनी.
बेहद जबरदस्त सफलता
यह 1990 के दशक की एक धूप भरी दोपहर थी. मैं उनके दफ्तर में उनका इंटरव्यू ले रही थी. वे मेरे सवालों के जवाब ध्यान से दे रहे थे, लेकिन वे कुछ बेचैन और थोड़ा उलझे हुए लग रहे थे. तभी उनके मैनेजर रोज़ी सिंह कमरे में आए और अगले मेहमान की सूचना दी. कुछ ही पलों में चार ब्लेज़र पहने हुए सज्जन, फाइलें, फोल्डर और लैपटॉप उठाए, उनके दरवाज़े के बाहर खड़े थे. मेरे निकलने का वक्त हो गया था, लेकिन एक पत्रकार के तौर पर मुझे एहसास था कि कुछ बहुत बड़ा होने वाला है.
कुछ हफ्तों बाद, ‘कौन बनेगा करोड़पति’ का आधिकारिक ऐलान हुआ. कई महीनों बाद, 3 जुलाई 2000 को इसका पहला एपिसोड स्टारप्लस पर आया. प्रतिक्रिया जबरदस्त थी. तीन महीने बाद, 27 अक्टूबर को आदित्य चोपड़ा की ‘मोहब्बतें’ रिलीज़ हुई. तकनीकी रूप से शाहरुख खान फिल्म के हीरो थे और अमिताभ बच्चन एक किरदार अभिनेता, लेकिन फिल्म के दीवानों के लिए यह दिग्गजों की टक्कर थी. बच्चन के फैन्स अपने पसंदीदा सितारे को फिर से पर्दे पर देखकर बेहद खुश थे. जो बदला था, वह उनके प्रति दर्शकों का रवैया था. वे अब भी उनके आदर्श थे, लेकिन साथ ही गेम शो के कंटेस्टेंट भी बन चुके थे. भले ही फिल्म में बच्चन ने गुरुकुल के प्रिंसिपल नारायण शंकर का किरदार निभाया, लेकिन उनके फैन्स ‘कौन बनेगा करोड़पति’ की भाषा में ही प्रतिक्रिया दे रहे थे—‘सही जवाब’ और ‘लॉक किया जाए’.
इस शो ने पूरे देश को अपना बना लिया था. वे मशहूर विज्ञापन याद है—“9 बज गए क्या?” टीआरपी आसमान छूने लगी और दर्शक बच्चन के सूट, जूते, दाढ़ी और बालों तक के दीवाने हो गए. आपको याद होगा कि शो के शुरुआती एपिसोड में बच्चन इतने सहज या दोस्ताना नहीं लगते थे. वे थोड़े सख्त और गंभीर दिखते थे—शिष्ट तो थे, लेकिन कम मुस्कुराते थे. यह उनके लिए एक नया मीडियम था, उस माहौल से बिल्कुल अलग, जिसके वे आदी थे. एक अभिनेता के रूप में वे अपने किरदारों के उतार-चढ़ाव को जानते थे, लेकिन रियलिटी शो के एंकर के तौर पर हर दिन नई चुनौतियां थीं. उन्हें ढलने और अपनी अलग शैली बनाने में थोड़ा टाइम लगा. उन्होंने रूल्स का भी पालन किया और दिल की भी सुनी और एक नई भाषा गढ़ी. एक कामकाजी दिन में वे दो या कभी-कभी तीन एपिसोड की शूटिंग करते थे.
संगीतमय अंत
शो में बच्चन कंटेस्टेंट्स के साथ खुलकर घुलते-मिलते थे, उनके साथ हंसते-मज़ाक करते थे, कभी-कभी तारीफों पर शरमाते और हल्की-सी फ्लर्टिंग भी करते थे. वे गाते थे, पुरानी फिल्मों के डायलॉग सुनाते थे. यह पहली बार था जब कंटेस्टेंट किसी सुपरस्टार से इतने करीब से बात कर रहे थे. धीरे-धीरे कंटेस्टेंट शो पर अपनी दिल तोड़ देने वाली कहानियां सुनाने लगे. बच्चन उनके जख्मों पर मरहम लगाते थे. रोज़-रोज़ करुणा दिखाना बहुत थकाने वाला हो सकता है, लेकिन बच्चन दिन-दर-दिन बिना थके कंटेस्टेंट्स के साथ जुड़े रहे. कुछ ही पलों में, जब कोई नया कंटेस्टेंट अंधेरे से निकलकर रोशनी में आता था, तो बच्चन उनके बीते और मौजूदा मनोभाव को समझ लेते थे.
‘कौन बनेगा करोड़पति’ पैसे का शो है, लेकिन यह सपनों का शो भी है और एक साथ कई काम संभालने की कला का भी. एंकर बात करता है, मनोचिकित्सक बनता है, शादी-सलाहकार की भूमिका निभाता है. वह चेक पर साइन करता है, मोबाइल चलाता है, भावुक कंटेस्टेंट को पानी और टिश्यू देने के लिए बार-बार खड़ा होता है और ब्रांड्स के नाम लेने में कोई गलती नहीं करता. इस काम में सटीकता और पूरा फोकस चाहिए.
मुझे डर था कि सीज़न 17 का आखिरी एपिसोड एक भावुक विदाई के रूप में खत्म होगा, लेकिन मैं खुश थी कि वो मनोरंजक और चौंकाने वाला निकला. इसका अंत वैसे ही हुआ जैसा बच्चन को पसंद है—संगीत के साथ. उन्होंने अवधी लोक गीतों की एक मेडली पेश की और शो में जान डाल दी. किसी चीज़ का अंत हमेशा अनजान शुरुआत भी होता है. जब आप रुकते हैं, तभी किसी नई चीज़ के लिए जगह बनती है और मुझे लगता है कि बच्चन की यह संगीत मेडली एक नए सपने की शुरुआत बन सकती है.
(भावना सोमैया एक फिल्म समीक्षक और लेखिका हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
