Monday, 27 June, 2022
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दिल्ली विश्वविद्यालय के 100 साल: इबारत और इबादत की जगह को कट्टरता से बचाने की ज़रूरत

दिल्ली विश्वविद्यालय को अपने शताब्दी वर्ष में ठहर कर सबसे ज्यादा इस बात को सोचने की जरूरत है कि आने वाला वक्त विश्वविद्यालय को किस ओर ले जाएगा?

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो

दिल्ली विश्वविद्यालय 100 सालों का अपना मुकम्मल सफर एक मई को पूरा करने जा रहा है. अगले एक साल तक विश्वविद्यालय में जश्न मनाने के कई कार्यक्रम होंगे जिसकी शुरुआत रविवार से होने जा रही है.

विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर प्रोफेसर योगेश सिंह ने अपने संदेश में कहा कि अगले 25 साल काफी महत्वपूर्ण रहने वाले हैं. उन्होंने कहा, ‘मानवता की सेवा और भारत के निर्माण में दिल्ली विश्वविद्यालय का महत्वपूर्ण योगदान रहा है’.

लेकिन क्या शताब्दी वर्ष ठहर कर ये सोचने का वक्त नहीं है कि विश्वविद्यालय जो कि छात्रों के बीच विभिन्न विचारों को पनपने और उसे पोषित करने की एक जगह होती है, वो कैसे लगातार संकीर्ण होकर सिमटती जा रही है और एक ही विचार हावी होता जा रहा है जिसका परिणाम कट्टरता के रूप में सामने आने लगा है. ऐसे में प्रोफेसर योगेश सिंह जिस मानवता और सेवा की बात कर रहे हैं, क्या वो आने वाले समय में भी विश्वविद्यालय की पहचान बना रह पाएगा?

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दिल्ली विश्वविद्यालय अपने भीतर एक लंबी परंपरा समेटे हुए है, जिसकी तारीख ब्रिटिश काल तक जाती है.

दिल्ली विश्वविद्यालय का जो स्वरूप अभी हम देख रहे हैं उसकी नींव 100 बरस पहले 1922 में पड़ी, हालांकि उस दौरान दक्षिण कैंपस नहीं हुआ करता था, जो कि लगभग 50 सालों बाद 1973 में जाकर बना.

भारत में शुरुआती तौर पर जो तीन विश्वविद्यालय बनें उनमें कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास थे. दिल्ली में कोई विश्वविद्यालय नहीं हुआ करता था. हालांकि यहां तीन प्रतिष्ठित कॉलेज जरूर थे- जिनमें सेंट स्टीफंस, हिंदू कॉलेज और रामजस कॉलेज शामिल है. उस समय ये तीनों ही कॉलेज पंजाब विश्वविद्यालय से संबद्ध थे जिसे बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत लाया गया. क्योंकि 1911 में ब्रिटिश ने अपनी राजधानी कलकत्ता से बदलकर दिल्ली कर दी थी जिसके बाद यहां ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा.

दिल्ली विश्वविद्यालय कला संकाय | प्रतिनिधि छवि | कॉमन्स

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विचारों की संकीर्णता

विश्वविद्यालय एक ऐसी मूर्त तस्वीर होती है जिसके अक्स तले छात्रों की तकदीर लिखी जाती है. विश्वविद्यालय के चरित्र का एक मुख्य आकर्षण विचारों की स्वतंत्रता होती है लेकिन बीते कुछ दशकों और सालों में इसी स्वतंत्रता पर सबसे ज्यादा हमले हुए हैं और विचारों की एक ऐसी संकीर्णता की तरफ ले जाने की कोशिशें चली है जो देश और समाज के लिए घातक साबित हो रही है.

दिल्ली विश्वविद्यालय भले ही शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है और अपने खूबसूरत और समृद्ध इतिहास का जश्न मना रहा है लेकिन उसे ठहर कर इस वक्त सबसे ज्यादा इस बात को सोचने की जरूरत है कि आने वाला वक्त विश्वविद्यालय को किस ओर ले जाएगा? समावेशी रूप होगा या कट्टरता पनपेगी?

साफ शब्दों में कहें तो दिल्ली विश्वविद्यालय ‘हिंदुत्व की नई प्रयोगशाला’ बन चुका है जिसका पोषण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के जरिए हो रहा है. इसके पीछे की वजह ये है कि संघ ये मानता रहा है कि बौद्धिक जगत में उसकी स्वीकार्यता काफी कम रही है.

पत्रकार और लेखक संतोष कुमार ने अपनी किताब ‘संघ और सरकार’ में विस्तार से बताया है कि शिक्षण संस्थानों तक पहुंच बनाने के लिए आरएसएस ने 2017-18 के बाद काफी मेहनत की है जिससे बौद्धिक जगत में उनका प्रभाव बन पाए.

बीते दिनों ही नॉर्थ कैंपस के हंसराज कॉलेज में गौशाला खुलने को लेकर विवाद काफी बढ़ा था वहीं 2019 में सावरकर की मूर्ति भगत सिंह और सावरकर के साथ लगाने को लेकर भी एबीवीपी और एनएसयूआई आमने-सामने आ गई थी.

दिल्ली विश्वविद्यालय के एक असिस्टेंट प्रोफेसर ने नाम न छापने की शर्त पर दिप्रिंट को बताया कि अब विश्वविद्यालय में बात करने पर पहरेदारी है. उन्होंने कहा, ‘एक तरह का अकादमिक खतरा बन गया है कि किसी मुद्दे पर बात रखने के लिए किसे बुलाया जाए और किसे नहीं. खासकर ये ध्यान रखने पर जोर दिया जाता है कि कोई विवाद न हो.’

वे बताते हैं, ‘जिस तरह से विश्वविद्यालय में दक्षिणपंथ का उभार हुआ है उससे खुलकर बात करने वालों के बीच एक डर का माहौल है जिस वजह से प्रतिरोध की आवाज़ दब गई है.’ विश्वविद्यालय के सामने भविष्य में क्या चुनौती है इस पर उन्होंने कहा, ‘ये ऐसा समय है जब समाज का पतन हो रहा है. लोग आवाज़ उठाने से कतराने लगे हैं. विश्वविद्यालय भी समाज से अलग नहीं है, तो उसका प्रभाव वहां भी दिखेगा ही.’

गौरतलब है कि हाल ही में विश्वविद्यालय के आर्ट्स फैकल्टी में जाने-माने वकील प्रशांत भूषण को बोलने से रोक दिया गया था.

दिल्ली विश्वविद्यालय

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निराश करती छात्र राजनीति और विश्वविद्यालय के 100 साल

बीते साल सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश एनवी रमन्ना ने एक कार्यक्रम के दौरान एक महत्वपूर्ण विषय की ओर संकेत दिया था, जो विश्वविद्यालय के लोकतांत्रिक चरित्र के लिए काफी जरूरी है. उन्होंने कहा था कि अन्याय के खिलाफ सवाल उठाने के लिए छात्र हमेशा सबसे आगे रहे हैं लेकिन पिछले कुछ दशकों में छात्रों के बीच से कोई बड़ा नेता नहीं निकला है.

दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति की समृद्ध और मजबूत परंपरा रही है. खासकर 1970 से 1975 के बीच छात्रों ने इंदिरा गांधी सरकार के कदमों का जिस मुखरता के साथ विरोध किया, वो मानीखेज था. इमरजेंसी के दौरान तो तत्कालीन छात्र संघ अध्यक्ष अरुण जेटली समेत 300 से ज्यादा छात्र नेताओं को जेल में डाल दिया गया था, जो आंदोलन जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरू हुआ था.

लेकिन उसके बाद ये परंपरा कमजोर होती चली गई.

अब दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र संघ चुनाव बाहुबल और पैसे के जोर के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया है. चुनाव के दौरान महंगी गाड़ियों की कतारें, पोस्टरों और पर्चों से पटी सड़कें, हुड़दंग मचाती भीड़ ही छात्र नेताओं का शगल बन गया है.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के बरक्स वामपंथी छात्र संगठन लगातार दिल्ली विश्वविद्यालय में अपनी मजबूती बनाने की कोशिश तो कर रहे हैं लेकिन वो अभी तक सफल नहीं हो पाए हैं क्योंकि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) और एनएसयूआई की कैंपस की राजनीति में काफी पैठ है.

दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र बिजेंद्र चौधरी दिप्रिंट को बताते हैं कि छात्र चुनाव ज्यादातर नॉर्थ कैंपस तक ही सिमटा हुआ नज़र आता है. साथ ही बीते सालों में दक्षिणपंथी विचारों का बोलबाला काफी नज़र आने लगा है.

वो कहते हैं, ‘नॉर्थ कैंपस में जिस तरह के अवसर छात्रों को मिलते हैं वैसा साउथ कैंपस या कैंपस से अलग के कॉलेजों में नहीं मिलता है.’

हालांकि दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के ही आचार्य नरेंद्र देव कॉलेज (एएनडीसी) के एक पूर्व छात्र पवन कुमार इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं है कि साउथ कैंपस में अवसर नहीं मिलते हैं. वो दिप्रिंट को बताते हैं, ‘हमारे कॉलेज में कई सेमिनार होते थे और थिएटर ग्रुप भी था जिसका मैं सदस्य था. पढ़ाई के अलावा भी यहां करने को काफी कुछ था.’

हालांकि पवन कुमार कहते हैं कि विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में बदलाव करने की जरूरत है क्योंकि यहां से पढ़ाई करने के बाद नौकरी मिलने की संभावनाएं काफी कम है. वो कहते हैं, ‘मार्केट आधारित कोर्स शुरू किए जाने चाहिए, जो नौकरी दिला सके.’

पवन कहते हैं, ‘मेरे अंदर कभी नॉर्थ कैंपस में न पढ़ पाने को लेकर कोई बात नहीं रही है. कॉलेज तो कॉलेज होता है जो कि लोगों से बनता है, उन्हीं से मज़ा आता है. वरना तो बस सारे कॉलेज बिल्डिंग मात्र हैं.’

दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज की एक पूर्व छात्रा फाल्गुनी शर्मा बताती हैं, ‘आमतौर पर किसी भी छात्र के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के किसी भी कॉलेज में एडमिशन लेना ही एक चुनौती है. एक लड़की होने के नाते, यहां अपनी जगह बना पाना भी बड़ी बात है.’

वे बताती हैं, ‘जहां एक ओर बच्चे नॉर्थ और साउथ कैंपस की बात करते हैं वहीं दयाल सिंह कॉलेज ने मुझे बहुत सारे मौके दिए. तीन सालों में मैंने कॉलेज लाइफ को खुलकर जीया है. कोई भी कॉलेज उसके छात्रों से ही बनता है या बिगड़ता है.’

‘आज जब विश्वविद्यालय अपने सौ साल पूरे करने जा रहा है, उसके एक प्रमुख कॉलेज का हिस्सा होने के नाते मुझे गर्व महसूस हो रहा है.’


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इबारत और इबादत की जगह

विश्वविद्यालय के कॉलेज के कमरों के बाहर की दुनिया आजाद होती है जिसमें किसी का खलल नहीं होता. छोटे-छोटे गुटों में बैठे छात्र दुनिया जहां से बेपरवाह एक नई दुनिया के ख्वाब को बुनने की बात कर रहे होते हैं. तभी कोई चुपके से उनकी तस्वीर खींच लेता है और बैठ जाता है….अपने शब्दों की उधेड़बुन से एक अनकही और अपूर्ण कहानी लिखने. किरदार सामने होते हैं….लेकिन किसे कहानी का मुख्य चेहरा बनाए….इसे लेकर ही थोड़ी उलझन होती है.

ऐसी ही एक तस्वीर 2020 के फरवरी महीने की याद आती है जिसे अक्सर ज़ूम करके कई बार देखने लगता हूं. कैंपस में मौजूद लोहे की सलाखों के पार प्रेम भी पनप रहा है….शुरुआत न जाने किस ठौर से हुई होगी लेकिन हिंदू कॉलेज प्रेम की मुकम्मल कहानी का गवाह बन रहा है. अलसाई जवानी….फरवरी की धूप में मैदान में लेटी हुई है. बिना परवाह किए कि उस जैसे कितने ही प्रेम मैदान की रंगत बढ़ा रहे हैं. सच में बसंत विश्वविद्यालयों के मैदानों में उतर आया है. एक सरल रूप में, जो हर रोज़ एक नई कहानी लेकर नई तस्वीर बनाती है.

हिंदू कॉलेज का एक दृश्य | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

दिल्ली विश्वविद्यालय वाकई में बेहद खूबसूरत है लेकिन फरवरी महीने में कैंपस जिस रूप में खिल उठता है उसकी बात ही कुछ और है. हो भी क्यों न, बसंत का महीना जो होता है. खिले तो इबारत लिखते हैं वरना इबादत तो चलती ही है.


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घंटों का इंतज़ार और शाहरुख खान की एक झलक

जिन लोगों ने भी ‘चश्मे-बद्दूर‘ फिल्म देखी होगी, तो एक बात जरूर ध्यान में होगी कि फिल्म में दिल्ली विश्वविद्यालय बार-बार नज़र आता है. शायद हिंदी सिनेमा में विश्वविद्यालय पहली बार इतनी प्रमुखता से नज़र आया था लेकिन उसके बाद कई हिंदी फिल्में बनीं जिसकी कैंपस में शूटिंग हुई. ऐसी फिल्मों की फेहरिस्त काफी लंबी है.

हालांकि दिल्ली विश्वविद्यालय के कई पूर्व छात्र आज बॉलीवुड के चमकते सितारे हैं. जिन्हें लेकर छात्रों में एक गर्व का एहसास भी होता है और उन जैसा बनने की चाहत भी. अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, इम्तियाज़ अली सरीखे कई और नामी कलाकार दिल्ली विश्वविद्यालय से ही निकले हैं.

ऐसा ही एक वाकया 2016 का है जब दो दशकों से ज्यादा समय के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज में शाहरुख खान आए थे. हंसराज कॉलेज का बड़ा सा मैदान उस दिन छोटा पड़ गया था. पूरे मैदान में छात्रों की भीड़ इस कदर हो चुकी थी कि मेरे जैसे फिल्म के शौकीन व्यक्ति को घंटों तक दीवार के ऊपर लगे लोहे के सरिये को पकड़ कर खड़ा होना पड़ा था क्योंकि मैदान में पैर रखने की भी जगह नहीं थी. और दीवार से स्टेज काफी साफ दिख रहा था. करीब 4-5 घंटों के इंतजार के बाद जब शाहरुख खान आए तो वो मंज़र एकदम ही अलग था. सितारे की एक झलक जो नियति ने दीवार पर चढ़कर देखने की लिखी थी.

जो विश्वविद्यालय प्रेम की निगेहबानी न करता हो, वहां कट्टरता किसी रूप में भी प्रवेश करे उसकी मुखालफत हर कीमत पर होनी चाहिए. यही आने वाले समय में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के सामने चुनौती है. अपने कैंपस को कट्टरता से बचाकर आने वाले 100 सालों को और समृद्ध और ऐतिहासिक बनाने की.

(व्यक्त विचार निजी हैं)


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