नई दिल्ली: 30 साल की और कम आय वाले परिवार से आने वाली पूजा वर्मा अपने पति और आठ महीने के बच्चे के साथ लगभग 473 किलोमीटर का सफर तय कर झांसी से दिल्ली पहुंचीं हैं. राजधानी के बीचोंबीच, संसद से थोड़ी दूरी पर, उन्होंने सैकड़ों महिलाओं के साथ उस जनसभा में हिस्सा लिया जिसमें माइक्रोफाइनेंस कंपनियों (एमएफआई), नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (एनबीएफसी) और निजी बैंकों पर महिलाओं के शोषण का आरोप लगाया गया. महिलाओं ने कहा कि उन्हें आसान कर्ज देने के नाम पर फंसाया जाता है, और फिर उन पर बेहद ऊंचा ब्याज लगाया जाता है.
23-24 अगस्त को ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेंस एसोसिएशन (AIDWA) ने आईटीओ के हरकिशन सिंह सुरजीत भवन में आयोजित इस जनसुनवाई में देशभर से आई महिलाओं ने निजी क्षेत्र की संस्थाओं को अपने बढ़ते लोन का जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने केंद्र समेत राज्य सरकारों और भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) पर भी आरोप लगाया कि वे निजी बैंकिंग क्षेत्र को नियंत्रित करने, गड़बड़ियों को रोकने और उन्हें शोषण से बचाने में नाकाम रहे हैं.
AIDWA की महासचिव मरियम धवले के अनुसार, ये आरोप एक सर्वे पर आधारित है. इस सर्वे में 21 राज्यों और 100 जिलों की 9,000 लोन लेने वाली महिलाओं को शामिल किया गया. इसमें पाया गया कि महिलाएं जब निजी संस्थानों से कर्ज लेने के लिए फंसाई जाती हैं तो ऊंचे ब्याज की वजह से कर्ज जाल में फंस जाती हैं.
इसके बाद और शोषण शुरू होता है. AIDWA की धवले ने कहा, “लोन लेने वाली महिलाओं को उत्पीड़न, विस्थापन, संपत्ति का नुकसान झेलना पड़ता है और कभी-कभी कर्ज जाल के कारण आत्महत्या तक करनी पड़ती है.” उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर सार्वजनिक खर्च में कमी महिलाओं को कर्ज लेने के लिए मजबूर कर रही हैं, लेकिन निजी बैंकिंग, जिसे बढ़ावा मिला है पर ज्यादातर नियंत्रण नहीं है, ने महिलाओं की आर्थिक मुश्किलें और बढ़ा दी हैं.
धवले ने आगे कहा, “एनबीएफसी-एमएफआई और निजी बैंक ही मौखिक और शारीरिक उत्पीड़न और आत्महत्याओं की बढ़ती घटनाओं के जिम्मेदार हैं.”
दिप्रिंट ने भारत फाइनेंशियल इंक्लूजन लिमिटेड, जिसे पहले एसकेएस माइक्रोफाइनेंस के नाम से जाना जाता था, और आईआईएफएल समस्ता फाइनेंस लिमिटेड—इन दो निजी संस्थानों से फोन कॉल और ईमेल के जरिए संपर्क किया, जिन पर महिलाओं ने शोषण के आरोप लगाए. लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला है.
जवाब मिलने पर रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा.
कर्ज से लेकर उत्पीड़न तक
कत्थई और काले रंग की साड़ी में झिझकती हुई पूजा वर्मा मंच पर खड़ी हुईं. माइक लेकर उन्होंने महिलाओं और कार्यकर्ताओं से भरे हॉल में अपनी कहानी सुनानी शुरू की.
कुछ साल पहले, पूजा के पति ने ई-रिक्शा चलाना शुरू किया. कुछ समय बाद पूजा ने उसे ठीक कराने के लिए आईआईएफएल समस्ता फाइनेंस लिमिटेड से 40,000 रुपये का कर्ज लिया. 24 किस्तों में से 11 किस्तें उन्होंने चुका दीं, लेकिन पूजा ने कहा कि निजी संस्था ने सिर्फ 9 किस्तें ही दर्ज कीं.
एक सुबह, जब पूजा घर पर सिर्फ अपने बच्चों और सास के साथ थीं, तो रिकवरी एजेंट उनके घर आ पहुंचे. उन्होंने दोपहर तक किस्त जमा करने का दबाव बनाया. जब पूजा ने कहा कि उन्हें नहीं पता उनके पति कहां हैं, तो एजेंट्स ने उनकी सास को परेशान करना शुरू कर दिया.
पति के लौटने पर एजेंट्स ने दोनों से कहा कि वे उनके साथ स्थानीय शाखा चलें और वहीं मामला सुलझाएं. पूजा ने बताया, “हम गए और उन्होंने हमें बैंक में पांच घंटे तक बंधक बनाए रखा और मेरे पति से कहा, ‘पैसे लेकर आओ और अपनी बीवी को ले जाओ.’”

पूजा ने हॉल में माइक मजबूती से पकड़े हुए अपनी कहानी जारी रखी. उन्होंने कहा कि जल्द पैसे लौटाने का वादा करने के बावजूद कंपनी के कर्मचारियों ने उन्हें जाने नहीं दिया.
पूजा ने कहा, “मैंने उनसे कहा कि हमें जाने दें लेकिन उन्होंने कहा कि हम तुम्हें रस्सी दे देते हैं. सामने वाले कमरे में जाओ और फांसी लगा लो. हम तुम्हारे बीमा के पैसों से अपना पैसा ले लेंगे.”
पूजा की यह बात सुनकर हॉल में सन्नाटा छा गया. महिलाएं दुख भरे स्वर में बड़बड़ाने लगीं और सिर हिलाने लगीं. पूजा ने कहा, “ये माइक्रोफाइनेंस संस्थान किस्त भरने के लिए बहुत दबाव डालते हैं. मैंने बहुत मानसिक और शारीरिक यातना झेली है.”
पूजा ने आगे बताया कि जब उनके पति ने सोचा कि पुलिस मदद करेगी और उन्हें बुलाया, तो पुलिस भी निजी संस्था के साथ मिली हुई निकली.
पुलिस आई और उन्हें झांसी के मोंठ थाने ले गई. वहां पुलिस और कंपनी एजेंट्स ने मिलकर पूजा और उनके पति से खाली कागज पर जबरदस्ती दस्तखत करवा लिए. इस कागज का इस्तेमाल कर यह दावा किया गया कि कपल झूठ बोल रहा है और अपनी मर्जी से कंपनी के दफ्तर गया था, ताकि संस्था को बदनाम कर सके.
रात में पुलिस ने उन्हें छोड़ा और घर लौटते समय यह शर्त रखी कि 2:30 बजे तक पूरा कर्ज चुका दें, वरना खाली कागज के सहारे उन्हें फंसा देंगे.
पूजा अकेली नहीं थीं. जनसुनवाई में दर्जन भर से अधिक महिलाओं ने ऐसी ही कहानियां सुनाईं. शारीरिक, मानसिक, यौन और आर्थिक उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और बेरोजगारी ने महिलाओं को गहरी मुसीबत में डाल दिया है.
महाराष्ट्र के सांगली की आयशा नदफ ने कहा, “मैं कर्ज जाल में फंस गई.”

उन्होंने पहले एसकेएस माइक्रोफाइनेंस से कर्ज लिया. जिस कारोबार में उन्होंने पैसा लगाया, वह चल नहीं पाया. फिर कर्ज चुकाने के लिए उन्होंने ‘ग्रामीन कूटा’, एक विकास, आशीर्वाद और ग्राम शक्ति जैसी अन्य संस्थाओं से भी कर्ज लिया. थोड़े ही समय में उनका कुल कर्ज 15 लाख रुपये तक पहुंच गया.
नियमित आय न होने के कारण किस्तें चुकाना नमुमकिन हो गया. किस्त चुकाने के दबाव के बीच उन्हें घर खर्च और बच्चों की पढ़ाई भी संभालनी पड़ी.
कंपनी के कर्मचारियों ने बकाया किस्त पर उन्हें परेशान किया. जिन रिश्तेदारों और साहूकारों से उन्होंने मदद मांगी, उन्होंने भी उनका शोषण किया. आयशा ने कहा, “एक एजेंट ने मुझसे यौन उत्पीड़न की कोशिश की. उसने कहा, ‘एक रात मेरे साथ गुजार लो. उस महीने का ब्याज नहीं देना पड़ेगा.’”
आयशा ने बताया कि उन्होंने घर चलाने के लिए कर्ज लिया था, लेकिन उनके पति ने उन्हें छोड़ दिया और कहा कि “जाकर दूसरों से पैसे लेकर कर्ज चुकाओ.” दो बेटियों और एक बेटे के साथ अकेली रह गईं आयशा को एजेंट का उत्पीड़न सहना पड़ा. दबाव से बचने के लिए उन्होंने दोबारा शादी की, लेकिन दूसरे पति ने भी कर्ज चुकाने से इनकार कर दिया और छोड़कर चला गया. अब भी उन पर 2 लाख रुपये का कर्ज है.
पश्चिम बंगाल के पूर्व बर्दवान जिले की 48 वर्षीय कल्पना रॉय ने 2.5 लाख रुपये का कर्ज लिया था. उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से मांग की कि महिलाओं को मनरेगा कार्ड और रोजगार दिया जाए और कर्ज पर ब्याज दरें घटाई जाएं.
कल्पना ने बताया कि एक बार एजेंट जबरन उनके घर घुस आए. पूरा दिन वहीं रहे और उन्होंने उनके और उनके परिवार के साथ मारपीट की.
AIDWA और महिलाओं की मांगें
AIDWA ने सरकार और RBI के सामने 22 मांगें रखी हैं. इनमें शिकायत निवारण तंत्र और लोक अदालतों को तेज़ी से चलाने की व्यवस्था करना शामिल है. इसके अलावा, पब्लिक सेक्टर बैंकों से NBFCs-MFIs को फंड ट्रांसफर रोकना. हर पब्लिक सेक्टर बैंक शाखा में महिला सेल बनाना, कृषि गोल्ड सबवेंशन स्कीम को फिर से शुरू करना, कर्ज़ के बोझ की जड़ को खत्म करने के लिए सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों पर बजट खर्च बढ़ाने पर जोर दिया गया है.
उन्होंने एक केंद्र प्रायोजित माइक्रोफाइनेंस गारंटी स्कीम की भी मांग की. इसमें लोन पर अधिकतम ब्याज दर 4 प्रतिशत हो और बाकी सरकार दे.
धावले ने कहा, “यह मांग सही है क्योंकि सरकार 424 निजी कॉरपोरेट संस्थानों को 100 करोड़ रुपये से अधिक के लोन 5 प्रतिशत से कम ब्याज पर देती है. सरकार 16 लाख करोड़ रुपये से अधिक के कॉरपोरेट लोन भी माफ कर चुकी है. तो यह नहीं कहा जा सकता कि सरकार के पास महिलाओं के लोन की गारंटी के लिए फंड नहीं है.”

इसके साथ ही उन्होंने माइक्रोफाइनेंस फंड बनाने की मांग की. ताकि कर्ज़ की वजह से परेशान होकर आत्महत्या करने वाली महिलाओं के परिवारों को विशेष सहायता और मुआवज़ा दिया जा सके.
सुधार की मांग करते हुए AIDWA ने क्रेडिट के अधिकार को विकसित और सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाने की अपील की. इसके लिए महिला संगठनों, स्वयं सहायता समूहों और ट्रेड यूनियनों से व्यापक सलाह-मशविरा करने को कहा.
“अगर बैंक सम्मान से लोन देते हैं तो उसकी अदायगी भी सम्मान से मांगनी चाहिए. मैं कर्ज़ चुकाने से इनकार नहीं कर रही हूं. लेकिन एक बार इज़्ज़त चली गई तो उसे वापस कौन लौटाएगा?” आयशा नदाफ ने पूछा.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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