Thursday, 20 January, 2022
होमदेशBJP को समझने के लिए जनसंघ की विरासत और विचारधारा को जानना क्यों जरूरी है

BJP को समझने के लिए जनसंघ की विरासत और विचारधारा को जानना क्यों जरूरी है

स्वतंत्रता के बाद की भारतीय राजनीति में जनसंघ की स्थापना राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थी क्योंकि यह नेहरूवादी राजनीति के प्रतिमान को चुनौती देने और एक वैकल्पिक प्रतिमान प्रस्तुत करने का सबसे सबल प्रयास था.

Text Size:

21 अक्टूबर, 2021 को भारतीय जनसंघ की 70वीं स्थापना जयंती है, इसे याद करना इसलिए आवश्यक है कि मौजूदा भारतीय जनता पार्टी जिस वैचारिक व सांगठनिक विरासत और नए भारत की परिकल्पना को लेकर आगे बढ़ रही है उनके उद्गम का मूल स्त्रोत भारतीय जनसंघ (बीजेएस) है.

इसलिए भाजपा, उसकी सरकारों की नीतियों, कार्यक्रमों के पीछे क्या सोच है, उसे समझना हो तो जनसंघ की स्थापना और उसके बाद की उसकी यात्रा के संदर्भों को समझना महत्वपूर्ण है. कुल मिलाकर जनसंघ का उद्गम व उसकी यात्रा वर्तमान भाजपा के संगठनात्मक ढांचे और उसकी सरकारों और पार्टी का मार्गदर्शन करने वाले वैचारिक ढांचे को समझने में सहायक सिद्ध होती है.

स्वतंत्रता के बाद की भारतीय राजनीति में जनसंघ की स्थापना राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थी क्योंकि यह नेहरूवादी राजनीति के प्रतिमान को चुनौती देने और एक वैकल्पिक प्रतिमान प्रस्तुत करने का सबसे सबल प्रयास था. ध्यान रखिए कि वह एक ऐसा दौर था जब पंडित जवाहरलाल नेहरू और नेहरूवादी वैचारिक ढांचा भारतीय राजनीति के केंद्र में था. उस समय यह सोचना असंभव था कि कोई नेहरू और कांग्रेस को वैचारिक व सांगठनिक स्तर पर सफलतापूर्वक चुनौती दे सकता है.

लेकिन जनसंघ ने ऐसा किया. पहले जनसंघ के रूप में और फिर इसके नए अवतार ‘भाजपा’ के रूप में चुनौती देने का यह क्रम निरंतर चलता रहा. आज 70 साल बाद हालत यह है कि नेहरूवाद अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है तथा जनसंघ जिस विचारधारा को लेकर आगे बढ़ा था उसकी स्वीकार्यता कहीं अधिक है. भाजपा के तेज गति से देशव्यापी विस्तार का कारण इस विचारधारा की स्वीकार्यता ही है.

इन सब परिस्थितियों के कारण मौजूदा राजनीतिक संदर्भों को समझने के लिए भी जनसंघ की जीवन यात्रा का आकलन करना महत्वपूर्ण है क्योंकि जो नींव उसने रखी थी, उसी पर भाजपा, जो 1980 में स्थापित हुई- बाद में विकसित हुई और आखिरकार 2014 के बाद से देश में सबसे प्रमुख राजनीतिक ताकत बन गई.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

एक संक्षिप्त अवधि (1977-80) के लिए जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया था लेकिन बाद में 1980 में जनता पार्टी टूट गई और जनसंघ के नेताओं ने भाजपा के नाम से एक नया संगठन स्थापित किया. नेहरूवाद की जगह एक राष्ट्रीय वैकल्पिक प्रतिमान स्थापित करने की लड़ाई का अगला चरण भी इसके साथ ही आरंभ हुआ. संगठन को एक नया नाम मिल गया था लेकिन इसकी विचारधारा और संरचना जनसंघ के संगठनात्मक और वैचारिक ढांचे पर मजबूती से टिकी रही.


यह भी पढ़ें: पश्चिमी UP में कांग्रेस ने गंवाए प्रमुख जाट चेहरे, SP में शामिल होने को तैयार मलिक परिवार


जनसंघ की स्थापना

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष थे. इसके गठन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की प्रमुख भूमिका थी. गौरतलब है कि संघ को आरंभ से ही नेहरूवाद कभी स्वीकार नहीं था बल्कि संघ एक विशुद्ध भारतीय प्रतिमान की स्थापना के पक्ष में था. आरएसएस ने महसूस किया था कि 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद उस पर गलत तरीके से प्रतिबंध लगाया गया, ऐसे संकट के समय में संगठन का समर्थन करने के लिए शायद ही कोई राजनीतिक आवाज थी. जब उसके कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया, उस समय कोई राजनीतिक दल उनके पक्ष में खुलकर नहीं आया.

1949 में जब आरएसएस से प्रतिबंध हटा लिया गया था, तब संगठन के भीतर भविष्य के रोडमैप के बारे में गहन चर्चा हुई. संघ का एक वर्ग चाहता था कि वह सीधे राजनीति में आए. कई स्तरों पर चर्चा के बाद, दूसरे सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर उपाख्य ‘गुरूजी’ ने डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के एक ऐसे राजनीतिक दल की स्थापना के प्रयासों का समर्थन करने का फैसला किया जो राष्ट्रीय विचारधारा की राजनीति कर एक सार्वजनिक जीवन में भारतीय प्रतिमानों को स्थापित कर सके.

भारत और पाकिस्तान के बीच नेहरू-लियाकत समझौते के मद्देनजर डॉ मुखर्जी नेहरू के मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे चुके थे. मुखर्जी ने नेहरू पर बंगाली हिंदुओं के साथ विश्वासघात करने का आरोप लगाया था, जिन्हें पूर्वी पाकिस्तान में सांप्रदायिक हिंसा में निशाना बनाया जा रहा था.

जनसंघ की स्थापना संगठनात्मक दृष्टिकोण से भी एक अनूठा प्रयोग था. कोई अन्य भारतीय राजनीतिक दल इसे दोहराने में सक्षम नहीं है. आमतौर पर, राजनीतिक दल पहले अपनी राष्ट्रीय इकाई स्थापित करते हैं और फिर अपनी राज्य और जिला इकाइयों की स्थापना करते हैं. लेकिन जनसंघ के मामले में, राष्ट्रीय स्तर पर औपचारिक रूप से स्थापित होने से पहले ही राज्य स्तरीय इकाइयां स्थापित हो चुकी थीं. पंजाब, पेप्सू (पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ), दिल्ली आदि इकाईयों का गठन मई 1951 तक किया जा चुका था.

अगले छह महीनों में, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य भारत में भी प्रांतीय इकाईयों का गठन कर लिया गया था. जब अधिकतर प्रांतीय इकाईयों का गठन हो चुका था, उसके बाद जनसंघ को औपचारिक रूप से 21 अक्टूबर, 1951 को दिल्ली में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन में अखिल भारतीय राजनीतिक दल के रूप में स्थापित किया गया था.

जनसंघ की औपचारिक स्थापना से पहले, मुखर्जी ने 1951 की शुरुआत में नागपुर संघचालक बाबासाहेब घटाटे के घर पर गुरुजी, बालासाहेब देवरस और भाऊराव देवरस से मुलाकात की थी. यह बैठक महत्वपूर्ण थी क्योंकि आरएसएस ने न केवल जनसंघ को पूरी तरह से समर्थन देने का फैसला किया, बल्कि इसने अपने कुछ प्रचारकों (पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं) को जनसंघ के लिए संगठनात्मक काम के लिए भेजा. यह परंपरा भाजपा के गठन के साथ भी जारी रही और आरएसएस अपने पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को आज भी भाजपा में संगठनात्मक काम करने की दृष्टि से अपने यहां से दायित्वमुक्त कर उन्हें भाजपा में भेजता है जहां वे पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की तरह ही काम करते हैं.


यह भी पढ़ें: गेहूं और चावल पर ज्यादा फोकस करने से भारत में बढ़ा जल संकट: अर्थशास्त्री मिहिर शाह


पार्टी विचारधारा

अपने स्थापना सम्मेलन में जनसंघ ने अपने पहले घोषणापत्र में उन प्रमुख मुद्दों को रेखांकित किया जिनकी झलक हमें वर्तमान भाजपा सरकार की योजनाओं और नीतियों में स्पष्ट दिखती है. इनमें से कुछ प्रमुख मुद्दे थे- स्वदेशी को बढ़ावा देना, गोरक्षा सुनिश्चित करना, सत्ता का विकेंद्रीकरण, पाकिस्तान पर एक मजबूत नीति, कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाना, भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना आदि. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा था- नीतिगत निर्णय लेने के पश्चिमी ढांचे के साथ बंधे रहने की सोच को खत्म करना.

इसी घोषणापत्र में साफ कहा गया था कि तत्कालीन नेहरू सरकार की ‘अभारतीय’ सोच भारत की समस्याओं के निदान में बाधक बन रही है. नेहरू व उनकी कांग्रेस सरकार भारत को पश्चित की कार्बन कॉपी बनाने पर तुले हैं जो भारत के राष्ट्रीय हितों के लिए बिल्कुल अनुपयुक्त है. भारत का विकास पथ स्वदेश में विकसित भारतीय सोच के आधार पर होना चाहिए न कि पश्चिमी वैचारिक व नीतिगत ढांचे के प्रभाव में.

आज जिस वैचारिक ढांचे के आधार पर भाजपा का संगठन व सरकारें अपने कार्यक्रम व नीतियां तैयार करते हैं, उसका आधार जनसंघ की वही सोच है जिसका उल्लेख यहां किया गया है.

विशेष रूप से आर्थिक नीतियों की बात करें तो हमें जनसंघ के पार्टी दस्तावेजों के पहले खंड को देखना चाहिए. इसे 1973 में जारी किया गया था और इसकी प्रस्तावना संघ के प्रचारक, जनसंघ के अग्रणी नेता तथा बाद में भाजपा के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लिखी थी.

जनसंघ के आर्थिक दृष्टिकोण के बारे में उन्होंने कहा था, ‘जनसंघ के आर्थिक दृष्टिकोण के बारे में उन्होंने कहा कि आर्थिक मुद्दों पर जनसंघ का दृष्टिकोण शुरू से ही व्यावहारिक विचार पर आधारित रहा है. ये न केवल संपूर्ण राष्ट्रीयकरण बल्कि फ्री इंटरप्राइजेस को भी खारिज करता है और एक मिडिल कोर्स का समर्थन करता है. इसने रक्षा उद्योगों के राष्ट्रीयकरण की वकालत की लेकिन अन्य उद्योगों के संबंध में, एक दृष्टिकोण का सुझाव दिया जो राज्य विनियमन के तहत, ‘उपभोक्ताओं और उत्पादकों के हितों में समान रूप से विस्तार करने के लिए निजी उद्यम को प्रोत्साहित किया’. 1951 में जनसंघ के त्रि-आयामी दृष्टिकोण- उत्पादन में वृद्धि, वितरण में समानता और उपभोग में संयम- आज भी उतना ही मान्य है जितना कि तब था.’

(लेखक आरएसएस से जुड़े थिंक-टैंक विचार विनिमय केंद्र में शोध निदेशक हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


यह भी पढ़ें: गोवा में 2022 के चुनाव को लेकर गठबंधन पर बातचीत तेज, लेकिन कांग्रेस ‘बेपरवाह’ नजर आ रही है


 

share & View comments