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Saturday, 21 March, 2026
होमदेशदिल्ली HC ने हरदीप पुरी की बेटी को एपस्टीन से जोड़ने वाले ऑनलाइन कंटेंट को तुरंत हटाने का आदेश क्यों दिया

दिल्ली HC ने हरदीप पुरी की बेटी को एपस्टीन से जोड़ने वाले ऑनलाइन कंटेंट को तुरंत हटाने का आदेश क्यों दिया

न्यूयॉर्क में रहने वाली कॉरपोरेट प्रोफेशनल हिमायनी पुरी ने कहा कि ये पोस्ट बदनाम करने की ‘सिस्टमेटिक, कोऑर्डिनेटेड, जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण’ मुहिम का हिस्सा हैं.

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नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी की एक अदालत ने इस हफ्ते हस्तक्षेप करते हुए उस ऑनलाइन कंटेंट के प्रसार पर रोक लगाने का आदेश दिया, जिसमें दोषी ठहराए गए अपराधी जेफ्री एपस्टीन का नाम केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की बेटी से जोड़ा गया था. कोर्ट ने कहा कि उन्होंने कंटेंट के प्रकाशन पर रोक लगाने और उसे हटाने के लिए “prima-facie” (पहली नज़र में) मामला बना लिया है.

अंतरिम आदेश में जस्टिस मिनी पुष्कर्णा ने कहा कि सुविधा का संतुलन (balance of convenience) हिमायनी पुरी के पक्ष में है और अगर ऐसे पोस्ट नहीं रोके गए तो उन्हें अपूरणीय नुकसान होगा.

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि केस में चिन्हित खास पोस्ट, वीडियो और लेख अगली सुनवाई (अगस्त) तक हटा दिए जाएं. साथ ही कोर्ट ने प्रतिवादियों को “किसी भी तरीके से, सीधे या परोक्ष रूप से” इस कंटेंट को “प्रकाशित, दोबारा प्रकाशित, प्रसारित या फैलाने” से भी रोक दिया.

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश सिर्फ मौजूदा यूआरएल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बाद में सामने आने वाले समान या मिलते-जुलते कंटेंट पर भी लागू होगा. हाईकोर्ट ने प्लेटफॉर्म्स को भी निर्देश दिया कि अगर मूल प्रकाशक 24 घंटे के भीतर कंटेंट नहीं हटाते हैं, तो प्लेटफॉर्म खुद आगे बढ़कर उसे हटा दें.

यह केंद्रीय मंत्री के परिवार से जुड़ा पहला मानहानि विवाद नहीं है. 2024 में हरदीप सिंह पुरी की पत्नी लक्ष्मी पुरी ने तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता साकेत गोखले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था. 2021 में किए गए कुछ ट्वीट्स में संपत्ति से जुड़े लेन-देन में अनियमितता के आरोप लगाए गए थे.

उस मामले में कोर्ट ने ट्वीट्स को “झूठा” और “दुर्भावनापूर्ण” पाया था और कहा था कि इससे प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा. हाईकोर्ट ने तब गोखले को बिना शर्त माफी मांगने, पोस्ट हटाने और लक्ष्मी पुरी को 50 लाख रुपये हर्जाना देने का आदेश दिया था.

कोर्ट ने उस मामले में कहा था, “ये आपत्तिजनक ट्वीट अपने आप में मानहानिकारक हैं; वादी की प्रतिष्ठा को अनुचित कानूनी नुकसान हुआ है, जिसके लिए राहत जरूरी है.”

मौजूदा मामले में यह सिविल मुकदमा फरवरी 2026 में एपस्टीन से जुड़े ऑनलाइन दस्तावेजों के प्रसार के बाद दायर किया गया. पुरी ने कहा कि कई प्लेटफॉर्म्स पर पोस्ट के जरिए उन्हें और उनके परिवार को एपस्टीन से जोड़ने की कोशिश की गई, जिनमें वित्तीय अनियमितता, पेशेवर कदाचार और अवैध लेन-देन जैसे आरोप लगाए गए. उन्होंने कहा कि यह बदनाम करने की “सिस्टमेटिक, कोऑर्डिनेटेड, जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण मुहिम” है.

इन पोस्ट में दावा किया गया था कि पुरी का संबंध एक “दोषी अपराधी” से है, उनसे “कथित तौर पर” लगभग 8,400 करोड़ रुपये मिलने के आरोप लगाए गए, साथ ही नियामकीय उल्लंघन और अनैतिक कारोबारी गतिविधियों के संकेत दिए गए.

पुरी ने इन सभी आरोपों से इनकार किया और कोर्ट से कहा कि उन्होंने कभी एपस्टीन से मुलाकात या बातचीत नहीं की. उन्होंने दलील दी कि आरोप समयक्रम के हिसाब से भी संभव नहीं हैं, क्योंकि Realm Partners LLC से जुड़े दावे उस समय के बताए गए लेन-देन से पहले ही फंड जुटाने की गतिविधियां बंद कर चुका था और बाद में उसका संचालन भी बंद हो गया था.

उन्होंने कहा कि उन्हें सिर्फ इसलिए “सोची-समझी और प्रेरित तरीके से” निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि उनके पिता केंद्रीय मंत्री और पूर्व राजनयिक हैं. न्यूयॉर्क में रहने वाली पुरी ने कोर्ट से कहा कि उनकी पेशेवर प्रतिष्ठा उनकी सबसे “कीमती संपत्ति” है और ऐसे कंटेंट का लगातार प्रसार उन्हें “गंभीर और अपूरणीय नुकसान” पहुंचाएगा.

इन्हीं आधारों पर पुरी ने कंटेंट को वैश्विक स्तर पर हटाने की मांग की और 2019 के बाबा रामदेव मानहानि मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का हवाला दिया.

हालांकि, प्लेटफॉर्म्स की ओर से वकीलों ने कहा कि वैश्विक स्तर पर कंटेंट हटाने का मुद्दा फिलहाल हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के पास लंबित है और इस चरण में ऐसा आदेश नहीं दिया जाना चाहिए.

रामदेव मामले में एक मुद्दा यह भी है कि क्या भारतीय अदालतें मानहानिकारक कंटेंट को पूरी दुनिया से हटाने का आदेश दे सकती हैं या राहत सिर्फ भारत के भीतर जियो-ब्लॉकिंग तक सीमित होनी चाहिए.

यह मुद्दा अभी विचाराधीन है और तकनीकी प्लेटफॉर्म्स, जिनमें बड़े इंटरमीडियरी भी शामिल हैं, ने दलील दी है कि वैश्विक हटाने के आदेश से अंतरराष्ट्रीय कानूनी संतुलन प्रभावित हो सकता है और इससे भारतीय कानूनी मानकों को वैश्विक इंटरनेट पर लागू करने का जोखिम है.

चूंकि कंटेंट हटाने के आदेश के दायरे पर फैसला अभी बाकी है, इसलिए इस मामले में हाईकोर्ट ने वैश्विक हटाने का आदेश नहीं दिया, बल्कि सीमित राहत देते हुए “भारत के अधिकार क्षेत्र/भारतीय डोमेन के भीतर” कंटेंट हटाने का निर्देश दिया.

हाईकोर्ट ने कहा कि भारत के आईपी एड्रेस से अपलोड किया गया कंटेंट बंद किया जाए, जबकि विदेश से अपलोड किया गया कंटेंट भारत के भीतर ब्लॉक और डिसेबल किया जाए, ताकि भारत में यूजर्स उस कंटेंट को एक्सेस न कर सकें.

अक्षत जैन नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के अंतिम वर्ष के छात्र हैं और दिप्रिंट के साथ कंट्रीब्यूटर हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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