नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामों में विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए केंद्र सरकार ने ट्रांसजेंडर लोगों, पुरुषों के साथ यौन संबंध रखने वाले पुरुषों (एमएलएम) और महिला सेक्स वर्कर्स (एफएसडब्ल्यू) को रक्तदान से बाहर रखने की अपनी नीति का मजबूती से बचाव किया है.
सरकार का कहना है कि यह नियम भेदभाव नहीं है, बल्कि खून की सप्लाई को ट्रांसफ्यूजन से फैलने वाले संक्रमण (TTIs) जैसे एचआईवी और हेपेटाइटिस से सुरक्षित रखने के लिए ज़रूरी सुरक्षा उपाय हैं.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच इन याचिकाओं की सुनवाई कर रही है. गुरुवार को केंद्र ने अदालत को इसकी जानकारी दी. सुनवाई के दौरान सीजेआई ने संक्रमण के खतरे का ज़िक्र करते हुए कहा, “हमें एक अच्छा कारण बताइए कि हम इस पर कोई निर्देश क्यों दें. आखिरकार लाखों गरीब लोग हैं जो मुफ्त खून की सुविधा लेते हैं. वे निजी अस्पताल का खर्च नहीं उठा सकते.”
इस पर याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील जयंना कोठारी ने कहा, “मुख्य मुद्दा यह है कि जब भी कोई व्यक्ति खून दान करता है, तो उस खून की जांच की जाती है और उसके बाद ही उसे इस्तेमाल किया जाता है. हर रक्तदान के बाद एचआईवी टेस्ट किया जाता है. न्यूक्लिक एसिड टेस्टिंग (NAT) भी की जाती है.”
याचिकाकर्ता क्या चाहते हैं
ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट थंगजाम सांता सिंह की अगुवाई में याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से 2017 के “गाइडलाइंस फॉर ब्लड डोनर सिलेक्शन एंड ब्लड डोनर रेफरल” के क्लॉज 12 और 51 को रद्द करने की मांग की है.
ये गाइडलाइंस केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की नेशनल ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल और नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन ने बनाई थीं. क्लॉज 12 में ट्रांसजेंडर लोग, MSM और FSW को संक्रमण के “खतरे वाले समूह” में रखा गया है, जबकि क्लॉज 51 में उन्हें रक्तदान से “स्थायी रूप से रोकने” का प्रावधान है.
कोठारी ने कहा, “आज अगर कोई विवाहित विषमलैंगिक व्यक्ति खून देना चाहता है, तो उससे यह नहीं पूछा जाता कि आखिरी बार बिना सुरक्षा के यौन संबंध कब बनाए थे. जोखिम भरा व्यवहार असुरक्षित यौन संबंध है, मेरी पहचान नहीं. कोई विषमलैंगिक व्यक्ति भी जोखिम भरा व्यवहार कर सकता है. क्या ऐसे व्यक्ति का खून जोखिम भरा नहीं होगा?”
उन्होंने अदालत से यह भी कहा कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट रिकॉर्ड में रखी गई है, लेकिन समिति के तर्क सामने नहीं आए हैं.
2021 में दाखिल इस याचिका में कहा गया है कि ये क्लॉज असंवैधानिक हैं और संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करते हैं, क्योंकि यह लिंग और जेंडर पहचान के आधार पर भेदभाव करते हैं.
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रतिबंध तार्किक रूप से रक्त सुरक्षा के लक्ष्य से जुड़ा नहीं है क्योंकि दान किए गए हर खून की पहले ही TTIs के लिए जांच होती है और संभावित दाताओं से उनके यौन संबंधों के बारे में विस्तृत जानकारी भी ली जाती है.
पूरी तरह और स्थायी प्रतिबंध की जगह याचिकाकर्ता चाहते हैं कि सरकार व्यक्तिगत जोखिम का आकलन करने और अस्थायी रोक की व्यवस्था अपनाए. उनका कहना है कि इससे जोखिम कम किया जा सकता है और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के अधिकारों का सम्मान भी होगा.
रक्त प्राप्त करने वाले की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण अधिकार
सरकार की दलील का मुख्य आधार यह है कि खून पाने वाले व्यक्ति की सेहत किसी भी व्यक्ति की रक्तदान करने की इच्छा से ज्यादा महत्वपूर्ण है.
दिप्रिंट द्वारा देखे गए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) के शुरुआती हलफनामे में कहा गया है कि मजबूत ब्लड ट्रांसफ्यूजन सिस्टम “सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी जिम्मेदारी” है.
गुरुवार को अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अपनी टीम—वकील शिविका मेहरा, शगुन ठाकुर और केतन पॉल के साथ, अदालत में कहा कि विशेषज्ञ समिति ने जनहित में इस प्रतिबंध की जरूरत को दोबारा मजबूत किया है.
सरकार ने खास तौर पर कहा कि इस मामले में सुरक्षित खून पाने का अधिकार ज्यादा महत्वपूर्ण है. “खून पाने वाले व्यक्ति का सुरक्षित ब्लड ट्रांसफ्यूजन पाने का अधिकार किसी व्यक्ति के रक्तदान करने के अधिकार से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है.”
सरकार ने यह भी कहा कि यह मामला कार्यपालिका और मेडिकल विशेषज्ञों के दायरे में आता है और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे मामलों में संवैधानिक अदालतों को “विशेषज्ञों के फैसले पर भरोसा करना चाहिए.”
‘हाई-रिस्क’ समूहों के पीछे का विज्ञान
सरकार का मुख्य तर्क यह है कि यह प्रतिबंध कुछ खास आबादी समूहों में एचआईवी और अन्य संक्रमणों की अधिकता से जुड़े सांख्यिकीय और वैज्ञानिक आंकड़ों पर आधारित है.
हलफनामों में दिए गए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग की 2020-2021 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, ट्रांसजेंडर लोगों, MSM और FSW में HIV की दर सामान्य वयस्क आबादी की तुलना में “6 से 13 गुना ज्यादा” है.
मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद सरकार ने मौजूदा नीति पर फिर से विचार करने के लिए एक नई विशेषज्ञ समिति बनाई थी. इसमें सरकारी संस्थानों, एनजीओ और मेडिकल संगठनों के विशेषज्ञ शामिल थे.
अगस्त 2025 में दाखिल नवीनतम हलफनामे में, जिसे दिप्रिंट ने देखा—सरकार ने बताया कि समिति ने निष्कर्ष निकाला है कि “इस समय किसी बदलाव की ज़रूरत नहीं है.”
समिति ने दोहराया कि 2017 की गाइडलाइंस “राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शोध पर मजबूती से आधारित” हैं और इनमें ढील देने से “राष्ट्रीय रक्त आपूर्ति की सुरक्षा और विश्वसनीयता को गंभीर खतरा हो सकता है.”
सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 47 के तहत “सावधानी के सिद्धांत” का भी हवाला दिया और कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए संभावित जोखिमों को रोकना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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