Friday, 21 January, 2022
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क्या है ‘एकात्म मानव दर्शन’ की विचारधारा जो भाजपा और उसकी सरकारों की दिशा तय करती है

इस दर्शन को निरूपित करने वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय आरएसएस के प्रचारक होने के अलावा भाजपा के पूर्ववर्ती संगठन भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष भी थे.

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नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के संविधान का अनुच्छेद-3 स्पष्ट तौर पर कहता है कि ‘एकात्म मानव दर्शन’ ही पार्टी का मूल दर्शन है.

यह दर्शन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने प्रतिपादित किया गया था, जो भाजपा के पूर्ववर्ती संगठन भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष भी रहे थे.

‘एकात्म मानव दर्शन’ को पहली बार 1964 में एक दस्तावेजी स्वरूप में जनसंघ के ग्वालियर अधिवेशन के दौरान सामने रखा गया और अगले ही वर्ष पार्टी के विजयवाड़ा अधिवेशन में इसे विधिवत अपना लिया गया. उपाध्याय ने 22 से 25 अप्रैल 1965 तक चली चार दिवसीय व्याख्यान माला में इस दर्शन की बारीकियों को विस्तार से समझाया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस साल 11 फरवरी को उपाध्याय की 53वीं पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते कहा था, ‘गरीबों, वंचितों और हमारे गांवों की सेवा करने की उनकी प्रतिबद्धता हमें आज भी प्रेरित करती है.’

उन्होंने कहा था, ‘उपाध्यायजी के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे. यही नहीं, वे आने वाले समय में भी प्रासंगिक ही बने रहेंगे.’

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इस अवसर पर भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में अपनी सरकार के प्रयासों को दीनदयाल उपाध्याय की परिकल्पनाओं का ही नतीजा बताया.

आइये इसी संदर्भ में यह समझने की कोशिश करें कि आखिर ‘एकात्म मानव दर्शन’ के प्रमुख सिद्धांत हैं क्या, जिन्हें भाजपा और उसकी सरकारों का मार्गदर्शन करने वाला माना जाता है.

राष्ट्र की परिभाषा

जब कोई मानव समूह किसी लक्ष्य, किसी आदर्श, किसी मिशन के साथ रहता है और भूमि के किसी विशेष हिस्से के प्रति अपनी मातृभूमि का भाव रखता है तो यह एक राष्ट्र का निर्माण करता है. यदि दोनों में से किसी एक—किसी आदर्श और मातृभूमि के भाव—का अभाव हो तो कोई राष्ट्र नहीं बनता है.

शरीर में एक ‘स्व’ होता है, यही व्यक्ति का सार है; अगर यह शरीर का साथ छोड़ दे तो व्यक्ति को मृत मान लिया जाता है. इसी तरह किसी राष्ट्र के मामले में यह विचार, आदर्श या मौलिक सिद्धांत होते हैं जो उसकी आत्मा हैं…किसी भी राष्ट्र की एक आत्मा होती है. इसके लिए एक तकनीकी नाम भी है. जनसंघ के अपनाए ‘सिद्धांतों और नीतियों’ में इस नाम का उल्लेख चिति के रूप में किया गया है. (चिति एक संस्कृत शब्द है और व्यापक स्तर पर इसका आशय सार्वभौमिक चेतना से है. यही एकात्म मानव दर्शन का मूल है)

यदि किसी कर्म विशेष के गुण-दोष निर्धारित करने का कोई मापदंड है, तो वह चिति ही है, जो कुछ भी हमारे स्वभाव या चिति के अनुरूप होता है, वही स्वीकार्य होता है और संस्कृति का हिस्सा बन जाता है. इन्हीं चीजों को आगे बढ़ाना है.

जो कुछ भी चिति विरुद्ध होता है, उसे विकृत, अवांछनीय मानकर त्याग दिया जाता है और उससे बचना चाहिए. चिति ही वह कसौटी है जिस पर हर एक क्रिया, हर एक दृष्टिकोण को परखा जाता है, और यह निर्धारित किया जाता है कि यह स्वीकारने योग्य है भी या नहीं. चिति राष्ट्र की आत्मा है. इसी चिति की नींव पर राष्ट्र का निर्माण होता है और वह सशक्त और साहसी बनता है. और यह चिति ही किसी भी राष्ट्र के हर एक महापुरुष के कार्यों में परिलक्षित होती है.

राज्य की भूमिका पर

राज्य एक संस्था है और इसका कई संस्थाओं में एक महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन यह अन्य सबसे ऊपर नहीं है.

मौजूदा समय में दुनिया की तमाम समस्याओं का एक प्रमुख कारण यह है कि लगभग सभी लोग राज्य को समाज का पर्याय मान लेते हैं. कम से कम व्यवहारिक तौर पर तो वे राज्य को ही समाज का एकमात्र प्रतिनिधि मानते हैं.

अन्य संस्थाओं का प्रभाव काफी घटा है, जबकि राज्य इस कदर हावी हो चुका है कि राज्य में निहित सभी शक्तियां धीरे-धीरे केंद्रीकृत होती जा रही हैं. हमने कभी भी राज्य को राष्ट्र का एकमात्र प्रतिनिधि नहीं माना था.राज्य के विदेशियों के हाथों में जाने के बाद भी हमारा राष्ट्रीय जीवन निर्बाध रूप से चलता रहा था. राज्य सर्वोच्च नहीं है. तो फिर सवाल उठता है कि यदि मौलिक तौर पर राज्य का महत्व नहीं है तो वह क्या है जो निर्बाध रूप से महत्वपूर्ण है.

धर्म और एक राष्ट्र में इसकी भूमिका

राज्य को अस्तित्व में लाया गया राष्ट्र की रक्षा के लिए, और ऐसी स्थितियां उत्पन्न करने और बनाए रखने के लिए जिनमें राष्ट्र के आदर्शों को वास्तविकता में बदला जा सकता हो.

राष्ट्र के आदर्श चिति का निर्माण करते हैं, जो व्यक्ति की आत्मा के समान है. चिति को सही मायने में समझने के लिए थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है.

किसी राष्ट्र की चिति को व्यक्त करने और बनाए रखने में सहायक विधियों व विधानों को उस राष्ट्र का धर्म कहा जाता है. अत: धर्म सर्वोच्च है. धर्म वह तत्व है जिसमें राष्ट्र की आत्मा बसी होती है. यदि धर्म नष्ट हो जाता है, तो राष्ट्र नष्ट हो जाता है. जो कोई भी धर्म का त्याग करता है, वह देश के साथ विश्वासघात करता है.


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‘रिलीजन’ बनाम धर्म पर

रिलीजन का आशय है कि किसी पंथ या संप्रदाय से जुड़ा होना; इसका मतलब धर्म नहीं है. धर्म तो एक बेहद व्यापक अवधारणा है. यह जीवन के सभी पहलुओं से जुड़ा है. यह समाज का आधार है. इससे भी आगे जाकर यह पूरी दुनिया को जोड़े रखता है. जो धारण किया जाए, वही धर्म है. धर्म के मूल सिद्धांत सनातन और सर्वकालिक हैं. फिर भी, काल और परिस्थितियों के हिसाब से उन पर अमल का समय भिन्न हो सकता है.

धर्म की सर्वोच्चता पर

धर्म के लिए सबसे ज्यादा उपयुक्त अंग्रेजी शब्द ‘इननेट लॉ’ हो सकता है, हालांकि, यह भी धर्म को पूरी तरह परिभाषित नहीं करता है. चूंकि धर्म सर्वोच्च है, इसलिए राज्य के लिए हमारा आदर्श धर्मराज्य ही रहा है.

धर्मराज्य बनाम थियोक्रेटिक राज्य पर

धर्मराज्य मतों को मानने की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है, और यह थ्रियोक्रेटिक अर्थात किती मत विशोष द्वारा शासित राज्य से अलग है. धर्मराज्य व्यक्ति की शांति, खुशी और प्रगति के लिए धर्म की महत्ता स्वीकार करता है. इसलिए, यह राज्य की जिम्मेदारी है कि ऐसा वातावरण बनाए रखे जिसमें हर व्यक्ति अपनी पसंद के मत का पालन कर सके और शांति से रह सके. अपने मत का पालन करने की स्वतंत्रता के लिए अन्य मतों प्रति सहिष्णुता आवश्यक होती है.

आर्थिक विचार

उपाध्याय ने ऐसे आर्थिक सिद्धांतों को भी विस्तार से समझाया है, जिनका पालन करना किसी भी राज्य और समाज के लिए संतुलित और सतत आर्थिक विकास के लिहाज से उपयोगी साबित हो सकता है. उसके कुछ प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं–

रोजगार: पूर्ण रोजगार एक प्राथमिक विचार होना चाहिए… हमें सामान्य तौर पर ‘हर कामगार को भोजन मिलना चाहिए’ पर जोर देने के बजाये इस बात को अपनी अर्थव्यवस्था का आधार बनाना चाहिए कि ‘हर व्यक्ति को खाने के साथ काम भी मिलना चाहिए.’

पूंजीवाद और साम्यवाद: पूंजीवादी और साम्यवादी ये दोनों ही प्रणालियां ‘एकात्म मानव’, उसके सच्चे और पूर्ण व्यक्तित्व और उनकी आकांक्षाओं पर ध्यान देने में नाकाम रही हैं. एक की नजर में वह केवल एक स्वार्थी है जो पैसे के पीछे भागता रहता रहता है, उसके लिए केवल एक ही विधान है, जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा का विधान, दूसरे शब्दों में जंगलराज; जबकि दूसरे ने उसे सारी व्यवस्था में एक ऐसा कमजोर बेजान पहिया मान लिया है, जो कठोर नियमों से बंधा हुआ है, और जब तक निर्देशित न किया जाए, कुछ भी अच्छा कर पाने में अक्षम है. सत्ता का आर्थिक और राजनीतिक केंद्रीकरण दोनों में ही निहित है. इसलिए, दोनों का ही नतीजा मानव का अमानवीयकरण ही होता है.

उपाध्याय ने विशेष रूप से छह उद्देश्यों को रेखांकित किया जिनका भारतीय अर्थव्यवस्था को पालन करना चाहिए–

• प्रत्येक व्यक्ति के लिए कम से कम एक सामान्य जीवन स्तर और राष्ट्र की रक्षा के लिए पूरी तैयारी.

• इस सामान्य जीवन स्तर में और अधिक वृद्धि जिससे व्यक्ति विशेष और राष्ट्र को अपनी चिति के आधार पर विश्व की प्रगति में योगदान के सार्थक मायने मिलें.

• हर सक्षम नागरिक को सार्थक रोजगार प्रदान करना, जिससे उपरोक्त दोनों उद्देश्य वास्तव में हासिल किए जा सकें, और प्राकृतिक संसाधनों का बेतहाशा उपयोग और इनकी बर्बादी न हो.

• उत्पादन के विभिन्न साधनों की प्रकृति और उपलब्धता को ध्यान में रखकर भारतीय स्थितियों (भारतीय प्रौद्योगिकी) के अनुकूल मशीनों का विकास किया जाए.

• यह प्रणाली मानव—व्यक्ति विशेष—की मददगार हो, उसे खारिज करने वाली नहीं. यह सांस्कृतिक और अन्य जीवन मूल्यों की रक्षा करने वाली होनी चाहिए. यह एक ऐसी आवश्यकता है जिसे कोई बड़ा जोखिम उठाए बगैर अनदेखा नहीं किया जा सकता.

• राज्य, निजी या किसी भी अन्य रूप में विभिन्न उद्योगों का स्वामित्व, तथ्यात्मक और व्यावहारिक आधार पर तय किया जाए.

वह स्वदेशी और विकेंद्रीकरण दोनों के समर्थक थे और बात अगर आर्थिक विकास की हो तो केंद्रीकरण को इसकी प्रमुख बाधाओं में से एक मानते थे.

उन्होंने कहा था, ‘कुछ सालों में जाने-अनजाने ही सही केंद्रीकरण और एकाधिकार रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनते जा रहे हैं. योजनाकार इस धारणा के गुलाम बन चुके हैं कि केवल बड़े पैमाने पर और केंद्रीकृत उद्योग ही लाभदायक है, और इसलिए इसके दुष्प्रभावों की चिंता किए बगैर, या जानबूझकर किसी मजबूरी में वे उस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. स्वदेशीकरण का भी यही हाल है.’

‘स्वदेशी की अवधारणा को पुरानी और प्रतिक्रियावादी मानकर उसका मजाक उड़ाया जाता है. हम विदेशी सामान गर्व से इस्तेमाल करते हैं. हम सोच, प्रबंधन, पूंजी, उत्पादन के तरीके, प्रौद्योगिकी आदि से लेकर उपभोग के मानकों और स्वरूप तक हर चीज के लिए विदेशी सहायता पर अत्यधिक निर्भर हो गए हैं. यह रास्ता प्रगति और विकास की ओर नहीं ले जाता. हम अपनी खासियत भूल जाएंगे और मानसिक रूप से एक बार फिर गुलाम बन जाएंगे. स्वदेशी के सकारात्मक पहलू को हमारी अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए एक आधारशिला के तौर पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए.’

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(लेखक आरएसएस से जुड़े थिंक-टैंक विचार विनिमय केंद्र में शोध निदेशक हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.)


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