Saturday, 4 December, 2021
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क्या है SSC घोटाला? ममता सरकार के लिए ‘CBI’ फिर से एक ‘नया सिरदर्द’ बन गई है

पश्चिम बंगाल के स्कूलों में कर्मचारियों की नियुक्ति को लेकर हुआ एक कथित घोटाला ममता बनर्जी द्वारा राज्य से संबंधित मामलों में सीबीआई जांच के विरोध का ताजातरीन उदाहरण बन गया है.

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कोलकाता : कलकत्ता उच्च न्यायालय ने सरकारी माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में ग्रुप – डी के कर्मचारियों की भर्ती में कथित तौर पर हुई अनियमितताओं की केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने के आदेश पर बुधवार को रोक लगा दी.

यह तीन सप्ताह की अंतरिम राहत ममता बनर्जी सरकार के लिए एक छोटी सी जीत है, जो इस ‘घोटाले’ के कारण काफी राजनीतिक दवाब का सामना कर रही है.

अदालत ने कम-से-कम 25 कर्मियों की भर्ती के पीछे के ‘अदृश्य हाथ’ की जांच के लिए सोमवार को सीबीआई जांच का आदेश दिया था, जिनकी भर्ती इस तथ्य के बावजूद हुई थी कि स्कूल सेवा आयोग (एसएससी) ने उन्हें नियुक्त करने के लिए गठित पैनल को पहले ही भंग कर दिया था. इसके बाद ममता बनर्जी सरकार ने तुरंत एक खंडपीठ के समक्ष इस आदेश को चुनौती दी थी.

ममता ने पिछले कई सालों से पश्चिम बंगाल के मुद्दों में सीबीआई के हस्तक्षेप का विरोध किया है, जिसमें तथाकथित नारद स्टिंग ऑपरेशन या शारदा चिटफंड घोटाले से लेकर मवेशी और कोयले की तस्करी की जांच और विधानसभा चुनाव के बाद की हिंसा की जांच भी शामिल है.

साल 2018 में, ममता सरकार ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा एजेंसी का ‘दुरुपयोग’ किये जाने की संभावना का हवाला देते हुए, सीबीआई को राज्य में जांच करने के लिए ‘सामान्य सहमति’ (जेनेरल कंसेंट) वापस ले ली थी. केंद्र सरकार ने इसे चुनौती दी है और यह मामला इस साल की शुरुआत में पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा था.

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इसलिए स्कूल की नियुक्तियों पर हुआ यह ताजा विवाद और सीबीआई जांच की संभावना पश्चिम बंगाल सरकार के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन गयी है.

आखिर इस स्कूल ‘घोटाले’ में हुआ क्या है?

2016 में, पश्चिम बंगाल सरकार ने स्कूल सेवा आयोग (एसएससी) को सरकार द्वारा संचालित/सहायता प्राप्त स्कूलों के लिए 13,000 ग्रुप-डी कर्मचारियों की भर्ती के लिए एक अधिसूचना जारी की थी. बाद में, 2019 में, इन नियुक्तियों को करने वाले पैनल की समय सीमा समाप्त हो गई थी, लेकिन इसके बावजूद, पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (डब्ल्यूबीबीएसई) द्वारा कथित तौर पर कम से कम 25 व्यक्तियों को नियुक्त कर दिया गया था.

इस महीने के आरंभ में अदालत के समक्ष दायर एक याचिका के अनुसार, इन ‘अवैध’ नियुक्तियों ने व्यवस्था में भ्रष्टाचार का संकेत दिया.

दिप्रिंट ने इस मामले में याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता बिक्रम बनर्जी से संपर्क किया, लेकिन उन्होंने कहा कि वह इसके बारे में कोई जानकारी साझा नहीं कर सकते क्योंकि यह मामला अदालत के समक्ष विचाराधीन है. उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं और इस वजह से अपनी पहचान उजागर नहीं करना चाहते हैं.

कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वाराएसएससी और डब्ल्यूबीबीएसई से हलफनामे मांगे जाने के बाद इस मामले की सुनवाई की गयी थी. लेकिन इन दोनों संस्थाओं ने खुली अदालत में एक-दूसरे के विपरीत तथ्य पेश किये.


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एसएससी ने अपने हलफनामे में यह दावा किया कि उसने अपनी और से किसी कर्मचारी की नियुक्ति की सिफारिश नहीं की थी, जबकि डब्ल्यूबीएसएसई ने कहा कि उसे एक पेन ड्राइव पर डेटा प्राप्त हुआ था और इसी के अनुसार इन व्यक्तियों को विधिवत नियुक्त किया गया था. सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ताओं ने यह भी दावा किया कि एसएससी पैनल के कार्यकाल की अवधि समाप्त होने के बाद न केवल 25 बल्कि 500 से अधिक लोगों को नियुक्त किया गया था, और अब वे राज्य सरकार से वेतन प्राप्त कर रहे हैं.

सीबीआई जांच क्यों?

इस मामले में व्याप्त संदिग्ध परिस्थितियों और अंतर्विरोधों की वजह से उच्च न्यायालय को सीबीआई जांच का आदेश देना पड़ा,

अदालत में जज का कहना था, ‘मैंने पाया है कि इस मामले में उन शरारती तत्वों, जिनके द्वारा सिफारिशों के कुछ पत्र जारी किए गए थे और जिनके आधार बोर्ड ने अपनी कार्रवाई की थी, की पहचान करने के लिए सीबीआई जांच (इस स्तर पर कोई अन्य जांच नहीं) की आवश्यकता है.’ इस मामले को ‘गंभीर अवैधता और अनियमितता’ का संकेत देने वाला बताते हुए, अदालत ने यह भी कहा कि सीबीआई को इस बात पर भी गौर करना चाहिए क्या इन सिफारिश पत्रों जारी करने और उसके बाद हुई नियुक्तियों में ‘पैसे के किसी लेन देन के कोई सुराग हैं?’

इसके बाद ममता सरकार ने तत्काल इस आदेश को अदालत की खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी और बुधवार को इसे तीन सप्ताह के लिए अंतरिम राहत दी गई. एसएससी और डब्ल्यूबीएसएसई दोनों को नियुक्तियों के संबंध में सभी दस्तावेज एक सीलबंद लिफाफे में अदालत को सौंपने के लिए कहा गया है.

महाधिवक्ता एस.एन. मुखर्जी ने राज्य सरकार की ओर से पेश होते हुए दलील दी कि यह जांच अदालत द्वारा चुनी गई राज्य पुलिस की टीम द्वारा की जा सकती है, या फिर किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश के हवाले की जा सकती है. उन्होंने कहा, ‘सीबीआई को केवल बहुत गंभीर मामले दिए जाते हैं. अन्यथा, राज्य पुलिस का क्या उपयोग है?’

एकल पीठ के आदेश में कहा गया था कि जनता का विश्वास कायम रखने के लिए सीबीआई द्वारा जांच की जानी चाहिए क्योंकि पुलिस राज्य सरकार द्वारा नियंत्रित होती है.

विपक्ष की मिला सरकार पर हमले के लिए मसाला

तत्काल के लिए सीबीआई को भले ही मामले से दूर रखा गया हो, लेकिन विपक्ष लगातार तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधने में लगा हुआ है.

भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दिलीप घोष ने दिप्रिंट को बताया कि केवल सीबीआई ही निष्पक्ष जांच कर सकती है. उन्होंने कहा, ‘हम अदालत का सम्मान करते हैं लेकिन पश्चिम बंगाल के लोगों को इस राज्य के प्रशासन, इसकी पुलिस या सीआईडी पर किसी भी तरह की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच करने के प्रति कोई भरोसा नहीं है. इसलिए अदालत के पास हर बार मामलों को सीबीआई को सौंपने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है.’

पश्चिम बंगाल के शिक्षा मंत्री ब्रत्य बसु ने मीडिया को बताया कि जब मामला पहली बार सामने आया था तो वे शिक्षा मंत्रालय के प्रभार में नहीं थे, और इसलिए इसके विवरण पर टिप्पणी नहीं कर सकते. उन्होंने कहा कि इस मांमले में किसी भी गड़बड़ी की जांच अदालत के आदेश के अनुसार ही आगे बढ़ेगी.

अदालत सोमवार को फिर से मामले की सुनवाई करेगी.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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