Sunday, 3 July, 2022
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मोहन भागवत के यह कहने का ‘क्या मतलब’ है कि 10-15 साल में ‘अखंड भारत’ का सपना पूरा हो जाएगा

आरएसएस सदस्यों को अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, तिब्बत, भूटान, नेपाल और अक्साई चिन आदि को ‘अखंड भारत’ के नक्शे में दिखाने के लिए जाना जाता है.

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नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने पिछले माह यह कहकर एक सियासी भूचाल ला दिया था कि ‘अखंड भारत’ की कल्पना अगले 10-15 वर्षों में हकीकत में बदल सकती है.

भागवत ने हरिद्वार में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था, ‘हमारी गाड़ी चल पड़ी है, बिना ब्रेक की गाड़ी है, सिर्फ एक्सीलेरेटर है. जो रोकने के कोशिश करेंगे, वो मिट जाएंगे. जो आना चाहें, वो हमारे साथ आकर बैठे जाएं, गाड़ी रुकेगी नहीं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘‘अखंड भारत’ की कल्पना अगले 20-25 वर्षों में हकीकत बदल जाएगी, यदि हम मौजूदा गति से चलते हैं. लेकिन हम थोड़ा और प्रयास करें—जो हम निश्चित तौर पर करेंगे—तो यह समय घटकर आधा हो जाएगा और हम 10-15 सालों में ऐसा होते देख पाएंगे.’

उनके भाषण पर तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया हुई और तबसे आरएसएस पदाधिकारियों के लिए यह समझाना मुश्किल हो रहा है कि सरसंघचालक सांस्कृतिक स्थिति के बारे में बोल रहे था न कि भू-राजनीतिक संदर्भ में.

आखिर, ‘अखंड भारत’ क्या है?

विनायक दामोदर सावरकर ने 1937 में अहमदाबाद में आयोजित हिंदू महासभा के 19वें वार्षिक सत्र में इस विचार के बारे में बताया था.

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हिंदू महासभा के तत्कालीन अध्यक्ष सावरकर ने सत्र को बताया कि उनके लिए, ‘अखंड भारत’ या ‘संयुक्त’ या ‘अविभाज्य’ भारत ‘कश्मीर से रामेश्वरम तक, सिंध से (अब पाकिस्तान में) असम तक’ था.

आरएसएस के पदाधिकारियों का कहना है कि सावरकर का विचार जहां भू-राजनीतिक था, वहीं भागवत का आशय ‘भारत के नेतृत्व में पड़ोसी देशों के सांस्कृतिक एकीकरण से है.’

आरएसएस के सह सरकार्यवाह मनमोहन वैद्य ने कहा, ‘अखंड भारत’ का विचार भू-राजनीतिक नहीं बल्कि भू-सांस्कृतिक है.’

वैद्य ने कहा, ‘अंग्रेजों के कब्जे और फिर पूरे भूभाग को बांट देने से पहले सालों तक हम लोग एक साथ थे, सांस्कृतिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े थे क्योंकि हम सभी आध्यात्मिकता पर आधारित जीवन के बारे में समान दृष्टिकोण साझा करते थे.’

हालांकि, आरएसएस प्रमुख की तरफ से बताई गई समय-सीमा ने संघ में ही कई लोगों को हैरत में डाल दिया है.

‘अखंड भारत’ का विचार

आरएसएस के सदस्यों को ‘अखंड भारत’ का एक नक्शा अपने घरों और दफ्तरों में रखने के लिए जाना जाता है, जिसमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, तिब्बत, भूटान, नेपाल और अक्साई चिन आदि को एक इकाई के तौर पर दर्शाया गया है.

आरएसएस का साहित्य ‘अखंड भारत’ के विचारों से भरा पड़ा है. संघ विचारक और दक्षिणपंथी इतिहासकार देवेंद्र स्वरूप ने 2016 में अपनी एक किताब ‘अखंड भारत—संस्कृति ने जोड़ा राजनीति ने तोड़ा’ में भारत के व्यवस्थित भू-राजनीतिक विभाजन के पूरे कालक्रम के बारे में विस्तार से बताया है.

देवेंद्र स्वरूप हिंदू धर्म के सबसे पवित्र धार्मिक ग्रंथ माने जाने वाले 18 प्रुख पुराणों में से दो विष्णु पुराण और भागवत पुराण को संदर्भ देते हुए ये दावा करते हैं कि भारत में विभाजन-पूर्व भारतीय क्षेत्रों के अलावा श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, बाली (इंडोनेशिया), फिलीपींस और मलेशिया तक शामिल थे.

उसी किताब में, वे कहते हैं कि ‘भारत’ में 7वीं शताब्दी तक मध्य एशियाई क्षेत्र अफगानिस्तान, ताशकंद और समरकंद शामिल थे और यह तो इस्लामी आक्रमण के बाद इनका विभाजन शुरू हुआ.

आरएसएस सदस्य और इतिहासकार राधा कुमुद मुखर्जी ने 1945 में लखनऊ यूनिवर्सिटी में अखंड भारत सम्मेलन में भाषण के दौरान ‘अखंड भारत’ पर अपने विचार साझा किए.

उन्होंने कहा, ‘एक प्रार्थना में इसका जिक्र सिंधु से कावेरी तक, गंगा और यमुना से गोदावरी और नर्मदा तक सात पवित्र नदियों की भूमि के रूप में किया गया है, जिनका पवित्र जल पूजा से पहले स्नान करने से सामूहिक पवित्रता प्रदान करता है.’

उन्होंने कहा, ‘इसी तरह की एक प्रार्थना में दक्षिण भारतीय विंध्य की सीमा से पार उत्तर में अपने भाइयों के साथ एकजुट हो जाते हैं, जो उनके साझा देश का निर्माण करते हैं. काबुल (कुभा), कूमाल (गोमती), कुरम (क्रुमु) और स्वात (सुवस्तु) के जल भी पवित्र हैं जिनके तट पर ऋग्वेद की ऋचाएं गाई जाती थीं.’

काबुल मुख्य नदी है जो पूर्वी अफगानिस्तान और पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत से होकर बहती है और फिर पाकिस्तान में सिंधु नदी में मिल जाती है.

कूमाल एक नदी है जो पूर्वी अफगानिस्तान में सरवंडी के पास खुम्बूर खुले घार से निकलती है (घार पश्तो में पहाड़ या रेंज को कहते हैं जो अफगानिस्तान की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है) और सिंधु नदी में मिलने से पहले डोमंडी के पास पश्चिमी पाकिस्तान में प्रवेश करती है. डोमंडी पाकिस्तान और अफगानिस्तान में एक नदी भी है. स्वात और कुरम नदियों का उद्गम स्थल भी अफगानिस्तान में है और ये पाकिस्तान से होकर बहती हैं.


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‘एक संघ’

आरएसएस पदाधिकारियों का दावा है कि ‘अखंड भारत’ भारत के सभी पड़ोसियों का एक संघ है, जिसका अगुआ भारत है.

वैद्य ने दिप्रिंट को बताया, ‘हमारे पड़ोसी देशों की सुरक्षा, समृद्धि, सुख और शांति भारत के साथ जुड़ी है क्योंकि ये देश केवल पड़ोसी ही नहीं हैं बल्कि एक व्यक्ति के तौर पर भारतवर्ष का हिस्सा थे. हमें लगता है कि भारत को इनकी साझी सभा का स्थान बनने और बतौर सहायक अपनी भूमिका की अहमियत को समझने के लिए आगे आना होगा.’

आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने कहा कि मोदी सरकार को पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे संकटग्रस्त पड़ोसी देशों को चीन की कठपुतली बनने से रोकने के लिए उनका समर्थन करने में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए.

आरएसएस के पदाधिकारियों के मुताबिक, यह कभी भी भू-राजनीतिक सीमा नहीं थी—यह देश की विदेश नीतियों, अंतरराष्ट्रीय सीमा मुद्दों और भारत के नेतृत्व में सभी पड़ोसी देशों के शांतिपूर्ण और ‘सांस्कृतिक’ सम्मिलन के भविष्य के बारे में है.’

आरएसएस के वरिष्ठ सदस्यों के मुताबिक, पंजाब और पश्चिम बंगाल के अलावा—जिन राज्यों में गैर-भाजपा सरकारें हैं—सभी सीमावर्ती राज्य, जम्मू और कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश समेत, ‘अखंड भारत’ के इस विचार पर एक साथ हैं.

आरएसएस, जिससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जुड़े हैं, खुद को भाजपा का ‘वैचारिक गुरु’ कहता है.

आरएसएस के वरिष्ठ सदस्यों ने कहा कि भारत ने पहले ही विदेश नीति में बड़े बदलाव देखे हैं, और आगे भी बहुत कुछ होने वाला है।

दिल्ली में संघ के एक पदाधिकारी ने कहा, ‘अखंड भारत’ को हकीकत में बदलने की दिशा में काम किया जा रहा है.

उन्होंने कहा, ‘हमने अपने स्तर पर शोध किया है और हम जानते हैं कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में लोग भारत जैसे लोकतंत्र में रहना चाहते हैं. हमें पता चला कि जब महामारी के दौरान रामायण का पुन: प्रसारण किया गया, तो कम से कम 30 प्रतिशत फैन मेल पाकिस्तान से आए थे. ये तो बस छोटे-छोटे उदाहरण हैं.’

‘बदलता राजनीतिक परिदृश्य’

आरएसएस की एक केंद्रीय कार्यकारी समिति के सदस्य ने दिप्रिंट को बताया कि देश में बदलते राजनीतिक माहौल से इस विचार को हकीकत में तब्दील करने में मदद मिलेगी. सदस्य ने कहा कि परिवर्तन भारत की विदेश नीति में भी परिलक्षित होता है.

उन्होंने कहा, ‘विदेश नीति में बड़े बदलाव देखे जा सकते हैं. 2014 में पद संभालने के बाद से पीएम मोदी सभी पड़ोसी देशों की यात्रा कर रहे हैं. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है.’

उन्होंने कहा, ‘हम यह नहीं कह रहे कि ये सभी देश अचानक भारत के राजनीतिक मानचित्र में शामिल हो जाएंगे, लेकिन यह एक शुरुआत भर है. हम निश्चित तौर पर जल्द ही एक सांस्कृतिक एकीकरण करेंगे जिससे भारत की अगुआई में सभी देशों का एक संघ बन जाएगा.’

आरएसएस का मानना है कि मुस्लिम, यहां तक कि भारत के पड़ोस में रहने वाले भी, हमलावर ताकतों के आने से पहले ‘मूलत: हिंदू थे.’

संघ के एक पदाधिकारी ने कहा, ‘भारत हमेशा एक एकीकृत भूमि रहा है. अफगानिस्तान, पाकिस्तान से तिब्बत, श्रीलंका और बांग्लादेश तक, हम सब एक साथ थे और मूलत: हिंदू थे. हमारे पड़ोसी देशों में रहने वाले मुसलमान भी यह जानते हैं. वे धार्मिक नहीं लेकिन संस्कृति रूप से हिंदू थे. बदलाव कृत्रिम है, जो पश्चिमी ताकतों और आक्रमणकारियों द्वारा उन पर थोपा गया है.’

इस पदाधिकारी ने कहा, मोहन भागवत हमेशा ‘भविष्यदृष्टा’ रहे हैं.

उन्होंने कहा, ‘वह हमसे कहते थे कि हम अपने जीवनकाल में राम मंदिर बनता देखेंगे. और हम अपने ऐसा होते देख भी रहे हैं. हमने कभी नहीं सोचा था कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हट जाएगा. लेकिन यह भी किया गया है. वास्तव में, यह अखंड भारत की जमीन तैयार करने की दिशा में पहला कदम है.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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