गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी ए.के. शर्मा, जिन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का विकल्प चुना है | चित्रण, दिप्रिंट
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नई दिल्ली: दो दशक से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के क़रीबी सहायक रहे, शीर्ष आईएएस अधिकारी अरविंद कुमार शर्मा की, समय से पहले स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति से हो सकता है सीनियर सिविल सर्वेंट्स को थोड़ी हैरानी हुई हो, लेकिन मामले के जानकार लोग अपेक्षा कर रहे हैं कि सिविल सेवा से बाहर रहकर शर्मा सरकार में एक ज़्यादा बड़ी भूमिका निभा सकते हैं.

1988 बैच के आईएएस अधिकारी शर्मा, जिनका ताल्लुक़ उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ से है, मोदी के साथ तब से जुड़े हैं, जब वो 2001 में पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे. लेकिन सोमवार को मोदी ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया.

शर्मा, पीके मिश्रा के साथ, जो अब पीएम के प्रमुख सचिव हैं, 2001 में गुजरात सीएमओ में आए थे, जब मोदी ने प्रदेश का कार्यभार संभाला था. उस समय मिश्रा मोदी के प्रमुख सचिव थे, जबकि शर्मा उनके सचिव हुआ करते थे. शर्मा तब तक सीएमओ में रहे, जब तक मोदी 2014 में राष्ट्रीय स्तर पर नहीं चले गए. इसके बाद वो भी पीएमओ में आ गए.

गुजरात काडर के एक आईएएस अधिकारी के अनुसार, जो फिलहाल केंद्र सरकार में हैं, और जो अपनी पहचान छिपाना चाहते थे, शर्मा गुजरात के उन चंद अधिकारियों में थे, जो मोदी के साथ उस समय मौजूद थे, जब वो तब के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के समक्ष, सरकार बनाने का दावा पेश करने दिल्ली आए थे.

अधिकारी ने कहा, ‘नृपेंद्र मिश्रा के साथ, शर्मा उन शुरुआती अधिकारियों में थे, जिन्हें 2014 में पीएमओ के लिए चुना गया था’. उन्होंने आगे कहा, ‘अपेक्षा की जा रही है कि उन्हें आईएएस के बाहर, सरकार में कोई बड़ी भूमिका मिलेगी. उसका सही नेचर समय रहते पता चल जाएगा’.

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दिप्रिंट से बात करने वाले, कम से कम तीन अन्य वरिष्ठ अधिकारी, नाम न बताने की शर्त पर इस बात से सहमत थे कि आईएएस से शर्मा के अचानक इस्तीफे का मतलब ये नहीं है कि सरकार में उनकी पारी ख़त्म हो रही है.

मोदी प्रशासन में प्रमुख पदों पर नियुक्त हुए, गुजरात काडर के अधिकारियों में शामिल हैं पीडी वाघेला (1986 बैच), अध्यक्ष, भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई); जीसी मुर्मू (1985 बैच), नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) प्रमुख, जो इससे पहले जम्मू-कश्मीर के पहले उप-राज्यपाल थे; पीके पुजारी,1981 बैच के एक रिटायर्ड अधिकारी, जो अब केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग (सीईआरसी) के प्रमुख हैं; और रीटा तेवतिया (1981 बैच की ही), अध्यक्ष, भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई).

दिप्रिंट ने फोन कॉल्स और लिखित संदेश के ज़रिए, टिप्पणी के लिए शर्मा से संपर्क साधने की कोशिश की, लेकिन इस रिपोर्ट के छपने तक उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला था.


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गुजरात में मोदी के ख़ास आदमी

शर्मा की छवि एक ख़ामोश और लो प्रोफाइल अधिकारी की थी, लेकिन उनका प्रभाव बहुत था. गुजरात में अपने कार्यकाल के दौरान, वो गुजरात इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड (जीआईडीबी) के सीईओ पद पर भी रहे, जहां रहकर उन्हें एक इन्फ्रास्ट्क्चर एक्सपर्ट के तौर पर ख्याति मिली.

गुजरात काडर के एक और अधिकारी ने, जो राज्य में सेवारत हैं, कहा, ‘गुजरात में वो इंडस्ट्री के सीधे संपर्क में रहते थे. 2003 में शुरू हुईं वाइब्रेंट गुजरात समिट्स आयोजित करने में, उनकी भूमिका जगज़ाहिर है’.

वाइब्रेंट गुजरात द्विवार्षिक इनवेस्टर समिट है, जिसने राज्य में विदेशी निवेश लाने में, एक अहम भूमिका निभाई.

अधिकारियों का ये भी कहना है कि 2008 में शर्मा ने टाटा नैनो प्लांट को पश्चिम बंगाल के सिंगूर से गुजरात के सानंद लाने में, अहम भूमिका निभाई थी.

गुजरात स्थित अधिकारी ने कहा, ‘उस समय प्लांट को गुजरात लाने में उनकी एक ख़ास भूमिका थी, क्योंकि कई दूसरे सूबे भी इसके लिए  कोशिश कर रहे थे’. उन्होंने आगे कहा, ‘जगह की तलाश से लेकर, तमाम दूसरी बारीकियों तक, सब उन्हीं का काम था’.

शर्मा ने, जो मोदी के सीएम कार्यकाल में नियमित रूप से, विदेशी हस्तियों के संपर्क में रहते थे, 2014 में तब की अमेरिकी राजदूत नैंसी पॉवेल को, गांधीनगर लाने में भी अपनी भूमिका निभाई. ये मीटिंग इस मायने में अहम थी कि 2014 से पहले दस साल तक, मोदी के साथ अमेरिकी सरकार का व्यवहार बहुत रूखा था.

CMO से PMO तक

पिछले छह सालों में, शर्मा ने केंद्र सरकार में बहुत तेज़ी के साथ तरक़्क़ी की सीढ़ियां चढ़ी हैं. 2014 में वो बतौर संयुक्त सचिव पीएमओ में शामिल हुए थे और 2017 में उन्हें अतिरिक्त सचिव के तौर पर तरक़्क़ी दे दी गई. पीएमओ में रहते हुए शर्मा ने अपनी गुजरात वाली भूमिका को ही दोहराया और प्रमुख इन्फ्रास्ट्रक्चर तथा निवेश परियोजनाओं को हैण्डल किया. अधिकारियों ने बताया कि वो अक्सर, मंत्रियों और उद्योग के सीधे संपर्क में रहते थे.

इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े एक मंत्रालय में तैनात एक अधिकारी ने कहा, ‘योजनाओं को तेज़ गति से आगे बढ़ाने के लिए, वो अक्सर मंत्रियों को सीधे फोन कर लेते थे. वो ‘प्रगति’ (सक्रिय शासन संचालन और समयबद्ध क्रियान्‍वयन) प्लेटफॉर्म शुरू किए जाने की योजना से भी बहुत नज़दीकी से जुड़े थे’.

इस अधिकारी ने कहा, ‘ऐसा विरले ही होता है कि संयुक्त सचिव स्तर का कोई अधिकारी मंत्रियों को सीधे कॉल कर ले, लेकिन ये वो समय था जब पीएमओ, उस नीतिगत पक्षाघात के बाद, चीज़ों को हिलाने की कोशिश कर रहा था, जिसे पिछली सरकार से जोड़कर देखा जाता था’.

कोविड-19 का प्रकोप फैलने के बाद ही, शर्मा को पीएमओ से बाहर भेजा गया और सचिव- स्तर के अधिकारी के रूप में प्रोन्नत करके, मई 2020 में उन्हें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (एमएसएमई) का महत्वपूर्ण प्रभार दिया गया, जिसके कुछ सप्ताह के भीतर ही मोदी सरकार ने महामारी के बाद एमएसएमई क्षेत्र के लिए, बहुत से सुधारों की घोषणा की.

नितिन गडकरी की अगुवाई में इस मंत्रालय को, महामारी से उत्पन्न लॉकडाउन के बाद की स्थिति में भारत की अर्थव्यवस्था को उबारने में बहुत महत्वपूर्ण समझा जा रहा है.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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