चेन्नई, 18 जनवरी (भाषा) तमिल फिल्मों के सुपरस्टार विजय 25 से 30 साल पहले एक दिन अप्रत्याशित रूप से साइकिल से एक रिहायशी इलाके की तंग गली से गुजरे और देखते ही देखते उनके इर्द-गिर्द भारी भीड़ जुट गई, जिससे एक साधारण पल भव्य नजारे में तब्दील हो गया।
कुछ दिन बाद, वह एक फिल्म समारोह के मंच पर सुनने में साधारण, लेकिन गहरे अर्थ वाली कहानियां सुनाते नजर आते हैं, जिनमें सत्ता में बैठे लोगों के लिए तीखे संदेश छिपे होते हैं। विजय के हर शब्द पर तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई देती है, जिससे दर्शकों के साथ उनके गहरे भावनात्मक जुड़ाव की झलक सामने आती है।
हालांकि, उस समय किसी ने इस बात की कल्पना भी नहीं की होगी कि सौम्य, शर्मीले और सरल स्वभाव वाले विजय एक दिन न सिर्फ खुद का राजनीतिक दल बनाएंगे और मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पालेंगे।
विजय अभिनीत ‘पूवे उनक्कगा’ का निर्देशन करने वाले विक्रमन ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘उस समय भी मुझे पूरा भरोसा था कि वह आगे चलकर फिल्म उद्योग पर राज करेगा। मुझे पता था कि उसमें कुछ खास है, जो लोगों को उसका दीवाना बना देगा।’’
‘घिल्ली’ और ‘मधुरेय’ के संवाद लेखक तथा ‘अजहगिया तमिल मगन’ और ‘बैरावा’ के निर्देशक भरतन भी विक्रमन की बात से इत्तफाक रखते हैं।
‘पूवे उनक्कगा’ विजय के करियर की पहली सुपरहिट फिल्म साबित हुई। बाद में उन्होंने भावनाओं, पारिवारिक विषयों, हास्य, उच्च-स्तरीय एक्शन और हिट गीतों के सदियों से आजमाए एवं परखे गए फॉर्मूले के सहारे खुद को एक मेगास्टार के रूप में स्थापित किया।
विजय के परिवार ने उनकी तीसरी ही फिल्म ‘रसिगन’ (1994) के प्रचार में उन्हें ‘इलैया थलपति’ (युवा कमांडर) के रूप में पेश करने का फैसला किया, जो उनके आत्मविश्वास के साथ-साथ ब्रांडिंग के महत्व की उनकी समझ को भी दर्शाता है। यह तमगा अगले एक दशक से अधिक समय में उनके चित्रण के लिए और भी प्रासंगिक हो गया, क्योंकि वह निर्विवाद रूप से ‘‘थलपति’’ बनकर उभरे।
तो क्या अब 51 वर्षीय चंद्रशेखर जोसेफ विजय ‘थलपति’ (कमांडर) से आगे बढ़कर खुद को ‘थलाइवन’ (नेता) के रूप में स्थापित कर पाएंगे?
हालांकि, इसका कोई निश्चित जवाब नहीं है, लेकिन इतना तो साफ है कि विजय को आसानी से हतोत्साहित नहीं किया जा सकता। उन्होंने शुरू से ही बहुत सूझ-बूझ दिखाई और अपने करियर की रूपरेखा भविष्य के राजनीतिक लक्ष्य के अनुरूप तैयार की।
जब ‘विजय मक्कल इयक्कम’ (वीएमआई) के बैनर तले एकजुट विजय के प्रशंसकों ने 2021 में उनकी तस्वीरों का इस्तेमाल कर स्थानीय निकाय चुनावों में जीत दर्ज की, तो लोग चौंक गए और सियासी दुनिया में अभिनेता के पदार्पण की नींव तैयार हुई। वीएमआई के कई पदाधिकारी आज विजय की तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) में अहम पदों पर हैं।
कई साल पहले, जब विजय ने सार्वजनिक समारोहों में कहानियां सुनाना शुरू किया, जो कि एक दिग्गज राजनीतिक हस्ती, दिवंगत मुख्यमंत्री जे जयललिता की जगजाहिर खूबी थी, तो कई लोगों ने सोचा कि वह अपनी क्षमता से कहीं अधिक लक्ष्य और महत्वाकांक्षा पाल रहे हैं।
धीरे-धीरे विजय ने दिवंगत एम करुणानिधि सहित कई अन्य बड़ी राजनीतिक हस्तियों की तरह अपने प्रशंसकों और समर्थकों को संबोधित करने के लिए एक खास वाक्यांश का इस्तेमाल शुरू किया, ताकि उनके साथ गहरा जुड़ाव कायम कर सकें।
‘‘एन नेनजिल कुडियिरुक्कुम…नानबा, नानबी (दोस्तो, आप मेरे दिल में रहते हैं)’’, अपने प्रशंसकों और समर्थकों को संबोधित करने के लिए विजय का पसंदीदा वाक्यांश है। जयललिता सहित कुछ अन्य कद्दावर नेताओं की तरह ही विजय ने भी मीडिया को शायद ही कभी साक्षात्कार दिए हैं और वह हमेशा से ही सार्वजनिक मंचों पर कम बोलते आए हैं।
जब 2013 में विजय की फिल्म ‘थलाइवा’ की टैगलाइन ‘नेतृत्व के लिए पैदा हुआ’ जारी की गई थी, तो उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का पहला, स्पष्ट संकेत मिला था, लेकिन पुख्ता निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त कारण नहीं थे।
हालांकि, ‘थलाइवा’ की रिलीज से दो साल पहले वह दिल्ली में अन्ना हजारे के अनशन स्थल पर पहुंचे थे और उनके प्रति समर्थन जताया था, जिससे उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को लेकर अटकलें शुरू हो गई थीं।
बहरहाल, ‘थलाइवा’ उम्मीदों के अनुसार अपनी टैगलाइन के कारण विवादों में घिर गई और तमिलनाडु में फिल्म की रिलीज दो हफ्ते के लिए टाल दी गई। यह फिल्म सिनेमाघरों का मुंह तभी देख पाई, जब इसकी टैगलाइन हटाई गई। उस समय तमिलनाडु में ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (अन्नाद्रमुक) की सरकार थी।
विजय 2014 में प्रदर्शित ‘कत्थी’ में जब किसानों के सामने पेश आने वाली चुनौतियों पर बात करते दिखे, तो उनके प्रशंसकों के लिए यह एक मसीहा के आगमन जैसा था। जैसे-जैसे विजय की लोकप्रियता बढ़ती गई, उनकी फिल्मों में एक गहरा राजनीतिक संदेश झलकने लगा।
एटली कुमार के निर्देशन में बनी विजय की ‘मर्सल’ (2017) ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया, क्योंकि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की आलोचना करने वाले एक संवाद पर भाजपा नेताओं ने कड़ी आपत्ति जताई। पार्टी नेता एच राजा ने विजय के ईसाई धर्म पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करते हुए उन पर ‘‘घृणा अभियान’’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।
साल 2018 में प्रदर्शित विजय की ‘सरकार’ ने चुनावी राजनीति और चुनावी धोखाधड़ी पर ध्यान केंद्रित किया, जिससे अभिनेता की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के बारे में अटकलें और तेज हो गईं। उसी साल थूथुकुडी में पुलिस गोलीबारी से जुड़ी घटना के बाद, विजय ने पीड़ितों के परिवारों से मुलाकात की और उन्हें एक-एक लाख रुपये का मुआवजा देने की पेशकश की।
विजय 1984 में प्रदर्शित ‘वेत्री’ में पहली बार एक बाल कलाकार के रूप में रुपहले पर्दे पर नजर आए थे। विजयकांत के अभिनय से सजी इस फिल्म का निर्देशन विजय के पिता एसए चंद्रशेखर ने किया था। उन्होंने 1992 में रिलीज ‘नालइया थीरपू’ में अपने करियर का पहला लीड किरदार निभाया था। उस समय वह 18 साल के थे। हालांकि, यह फिल्म टिकट खिड़की पर औंधे मुंह गिरी थी।
इसके बाद, विजय को 1993 में प्रदर्शित ‘सेंदूरपांडी’ में अभिनेता विजयकांत के छोटे भाई के किरदार में साइन किया गया। विजयकांत की लोकप्रियता ने फिल्म की सफलता में अहम भूमिका निभाई, जो सामंती शोषण के खिलाफ ग्रामीणों के प्रतिरोध की कहानी बयां करती थी।
विजय के पास करिश्माई व्यक्तित्व और दृढ़ विश्वास दोनों है; फिर भी पर्दे पर दिखाए गए नायक को वास्तविक दुनिया में नेतृत्व संभालने में सक्षम व्यक्ति के रूप में साबित करना एक अलग ही चुनौती है। जैसा कि उनकी अपनी कहानी से संकेत मिलता है कि राजनीति और चुनावों के कठिन रास्तों पर चलने के लिए एक ‘थलपति’ को भी ‘सेंदूरपांडी’ की जरूरत हो सकती है, जो अवसर, मार्गदर्शन और निर्णायक कार्रवाई का एक दुर्लभ संगम है।
भाषा पारुल नेत्रपाल
नेत्रपाल
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