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Sunday, 21 July, 2024
होमदेश'स्थिति सामान्य दिखाने की कोशिश’: 3 दशकों के बाद श्रीनगर में मुहर्रम जुलूस की अनुमति क्यों दी गई?

‘स्थिति सामान्य दिखाने की कोशिश’: 3 दशकों के बाद श्रीनगर में मुहर्रम जुलूस की अनुमति क्यों दी गई?

5 सप्ताह के विचार-विमर्श और सुरक्षा स्थिति को देखने के बाद, समुदाय के नेताओं के आश्वासन और कई शर्तों के साथ श्रीनगर में शांतिपूर्ण ढंग से कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति दी गई.

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नई दिल्ली: तीन दशक से अधिक समय के बाद जम्मू और कश्मीर (J&K) के अधिकारियों ने पांच सप्ताह तक कई दौर की मीटिंग, बातचीत और विचार-विमर्श करने के बाद गुरुवार को श्रीनगर में गुरु बाजार से डलगेट तक मुहर्रम जुलूस निकालने की अनुमति दे दी थी. सुरक्षा प्रतिष्ठान के सूत्रों ने इसके बारे में दिप्रिंट को बताया.

एक सूत्र ने कहा कि सुबह 6 बजे से 8 बजे के बीच आयोजित होने वाले जुलूस की इजाजत देने के पीछे का उद्देश्य दुनिया को यह दिखाना था कि “कश्मीर घाटी में स्थिरता और शांति लौट आई है”.

सूत्र ने कहा, “हालांकि, यह एक बड़ा जोखिम था लेकिन हमने किया.”

उन्होंने कहा, “हर साल एक झूठी कहानी फैलाई जाती थी कि कश्मीरियों को मुहर्रम मनाने की अनुमति नहीं है. लेकिन सिर्फ बड़ा जुलूस निकालने की अनुमति नहीं थी, लोग हर साल मुहर्रम मनाते तो थे ही. लेकिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया में जो बात चली वो ये कि लोगों को रोका जा रहा है.”

सूत्र ने कहा, “हम इस कहानी को खत्म करना चाहते थे और दुनिया को दिखाना चाहते थे कि घाटी में स्थिति सामान्य हो चुकी है और बिना किसी हिंसा के एक बड़ा जुलूस निकल सकता है.”

5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 को हटाने के बाद गुरुवार को पहली बार था, जब जम्मू-कश्मीर में लगभग 30,000 लोगों की इतनी बड़ी सभा की अनुमति दी गई थी, जिसमें मुख्य रूप से इस्लाम के शिया संप्रदाय के शोक मनाने वाले शामिल थे.

गुरु बाजार से डलगेट मार्ग के माध्यम से मुहर्रम के 8वें और 10वें दिन दो प्रमुख जुलूसों पर 1980 के दशक के अंत में तत्कालीन जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा लोगों को कथित रूप से उकसाने और “संवेदनशील कानून व्यवस्था की स्थिति” के कारण प्रतिबंध लगा दिया गया था.

सूत्र के अनुसार, सुरक्षा स्थिति का मूल्यांकन के बाद यह महसूस किया गया- जिसमें घाटी में विदेशी आतंकवादियों की मौजूदगी और उनके आंदोलन पर खुफिया जानकारी एकत्र करना शामिल था- कि जुलूस की अनुमति दी जा सकती है.

सूत्र ने कहा, “अगर इतना बड़ा आयोजन बिना एक भी पत्थर फेंके या एक भी राष्ट्र-विरोधी नारे के आयोजित किया जा सकता है, तो यह अपने आप में बताता है कि यहां के लोग शांति में विश्वास करते हैं और घाटी में स्थिरता लौट आई है.”

उन्होंने आगे कहा, “यह सच है कि ऐसा करने के लिए पुलिस और अन्य बलों की बड़े पैमाने पर तैनाती की गई थी, लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि अलगाववादियों और आतंकवादियों ने घाटी और उसके लोगों पर नियंत्रण खो दिया है. एक भी आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट) का झंडा, जो जुलूसों में आम तौर पर देखा जाता था, गुरुवार को जुलूस में नहीं देखा गया.”

एक अन्य सूत्र ने दिप्रिंट को बताया कि सरकार इस कहानी को भी झुठलाना चाहती थी कि हर साल अमरनाथ यात्रा के लिए अनुमति दी जाती है तो मुहर्रम जुलूस के लिए क्यों नहीं.


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‘कई शर्तों के साथ इजाजत’

दूसरे सूत्र के अनुसार, शिया नेताओं ने हर साल मुहर्रम जुलूस निकालने की अनुमति के लिए जम्मू-कश्मीर में पुलिस और प्रशासन से संपर्क किया था, लेकिन सुरक्षा चिंताओं के कारण उन्हें अनुमति नहीं दी गई.

सूत्र ने कहा कि हमेशा यह आशंका रहती थी कि जुलूस पर “आतंकवादी और अलगाववादी तत्वों” का कब्जा हो जाएगा. पहले भी आतंकवादी और अलगाववादी अक्सर “इन जुलूसों पर कब्जा कर लेते थे और उनका इस्तेमाल भारत विरोधी बातें फैलाने के लिए करते थे.” 

सूत्र ने आगे कहा, “वे अधिकारियों और सुरक्षाबलों की गलत छवि लोगों के सामने पेश करते हैं और लोगों से उनके खिलाफ भड़काते हैं. जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता यासीन मलिक अक्सर इन जुलूसों में लोगों के सामने भड़काऊ भाषण देते थे.”

लेकिन इस बार, सुरक्षा मूल्यांकन और कई शर्तें तय करने के बाद जुलूस निकालने की अनुमति दी गई. 

सूत्र ने कहा, “हम सभी शिया नेताओं के साथ कई बार बैठे और हमें आश्वासन दिया गया कि किसी भी राष्ट्र-विरोधी गतिविधि के लिए कोई जगह नहीं होगी.”

इन शर्तों में शामिल था: कोई भी “राष्ट्र-विरोधी, सत्ता-विरोधी भाषण, नारेबाज़ी या प्रचार में शामिल नहीं होगा और कोई भी गतिविधि किसी भी तरह से सांप्रदायिक सद्भाव, धार्मिक, जातीय, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय भावनाओं को प्रभावित नहीं करनी चाहिए.” 

इसके अलावा, यह निर्देश दिया गया कि जुलूस के दौरान कोई भी गतिविधि “राज्य की सुरक्षा और संप्रभुता के लिए हानिकारक नहीं होनी चाहिए और किसी भी राष्ट्रीय प्रतीक या प्रतीक का अनादर नहीं करना चाहिए”.

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, “हमने यह स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें उत्तेजक नारे, टेक्स्ट, आतंकी संगठनों की तस्वीरें या राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों प्रतिबंधित संगठनों के लोगो वाला कोई झंडा नहीं फहराना चाहिए.”

अधिकारी ने कहा, “हमने उनसे कहा कि उन्हें सरकारी या सार्वजनिक संपत्ति को कोई नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए.”

पुलिस के अनुसार, यह सुनिश्चित करने के लिए कि कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो जाए, पांच सप्ताह तक कई बैठकें की गईं.

जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा एक आधिकारिक बयान भी जारी किया गया था जिसमें कहा गया था कि जुलूस की अनुमति देने का निर्णय शिया समुदाय और सभी समूहों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ गुरु बाजार की स्थानीय समिति के आश्वासन के बाद लिया गया था कि कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से आयोजित किया जाएगा.

बयान में कहा गया है, “सभी सुरक्षा व्यवस्थाएं की जाएंगी और लोगों, विशेष रूप से शिया समुदाय के सदस्यों को सूचित किया जाता है कि किसी को भी गुरु से निकाले जाने वाले जुलूस को छोड़कर मार्ग पर व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से कोई अन्य जुलूस निकालने की अनुमति नहीं दी जाएगी. आदेशों का उल्लंघन करने वाले किसी भी व्यक्ति से कानून के अनुसार बहुत सख्ती से निपटा जाएगा.”

(संपादन: ऋषभ राज)

(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़नें के लिए यहां क्लिक करें)


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